मध्य पूर्व युद्ध का असर: कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के पार, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ी चिंता
अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हमलों के बाद मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमत रविवार को 30 प्रतिशत से अधिक उछलकर एक समय 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार इतना ऊंचा स्तर है।
हालांकि बाद में कीमतों में कुछ नरमी आई और यह करीब 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। रिपोर्टों के मुताबिक जी-7 देशों के वित्त मंत्री अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के साथ समन्वय कर पेट्रोलियम भंडार जारी करने की संभावना पर चर्चा कर सकते हैं, जिसके बाद बाजार में कुछ राहत देखने को मिली।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल कीमतों में आई इस तेजी को अस्थायी बताते हुए कहा कि ईरान के परमाणु खतरे को खत्म करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कीमतें तेजी से नीचे आ जाएंगी। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि वैश्विक सुरक्षा और शांति के लिए यह छोटी कीमत है।
वहीं अमेरिका के ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने भी पेट्रोल और ऊर्जा की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी को अस्थायी करार दिया। उनका कहना है कि बाजार में यह उतार-चढ़ाव लंबे समय तक नहीं रहेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर संयुक्त हमले शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है।
इस बीच ईरान ने जवाबी कार्रवाई के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही पर प्रभाव डाला है। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा नियंत्रित करता है। इस कारण कई देशों को तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।
उधर इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे ओपेक के बड़े तेल उत्पादक देशों ने भी उत्पादन में कटौती की है, क्योंकि समुद्री मार्ग बाधित होने के कारण तेल की ढुलाई प्रभावित हो रही है।
क्षेत्र में ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों की घटनाओं ने भी आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। खाड़ी क्षेत्र के कतर, सऊदी अरब और कुवैत में स्थित ऊर्जा ढांचे पर हमलों के लिए भी ईरान को जिम्मेदार ठहराया गया है।
इसी बीच शनिवार को इज़राइल ने पहली बार ईरान के तेल ढांचे को निशाना बनाते हुए हवाई हमले किए। ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार इन हमलों में तेहरान और अल्बोर्ज प्रांत में स्थित तेल भंडारण केंद्रों और उत्पाद हस्तांतरण सुविधाओं को नुकसान पहुंचा।
इसके बाद ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका और इज़राइल अपनी कार्रवाई जारी रखते हैं तो पूरे क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि हालात बिगड़ने पर तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
तेल कीमतों में उछाल का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी दिखाई दिया। एशिया के प्रमुख बाजारों में सोमवार को तेज गिरावट दर्ज की गई। जापान का निक्केई सूचकांक 5 प्रतिशत से अधिक गिरकर बंद हुआ, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी सूचकांक करीब 6 प्रतिशत नीचे आ गया। हांगकांग के हैंगसेंग सूचकांक में भी गिरावट दर्ज की गई।
यूरोपीय बाजारों में भी कारोबार की शुरुआत कमजोरी के साथ हुई। लंदन का एफटीएसई और जर्मनी का डैक्स सूचकांक क्रमशः करीब 2 और 3 प्रतिशत तक नीचे रहा। वहीं अमेरिका के वायदा बाजारों में भी गिरावट देखने को मिली।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इसका असर वैश्विक महंगाई और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार तेल की कीमतों में लगातार 10 प्रतिशत की वृद्धि होने पर महंगाई दर में लगभग 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी और वैश्विक आर्थिक वृद्धि में करीब 0.15 प्रतिशत की कमी आ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव जल्दी कम हो जाता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था तेजी से संभल सकती है, लेकिन अगर ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान लंबे समय तक जारी रहा तो दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर इसका दबाव बढ़ सकता है।

