जस्टिस यशवंत वर्मा ने महाभियोग प्रक्रिया से हटने का किया ऐलान, जांच पर उठाए सवाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपने के बाद उनके खिलाफ चल रही महाभियोग (इम्पीचमेंट) प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने न्यायाधीश जांच समिति को भेजे गए पत्र में प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
जस्टिस वर्मा ने अपने विस्तृत पत्र में आरोप लगाया कि जांच के दौरान उन्हें उचित अवसर और न्यायसंगत प्रक्रिया नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि बिना ठोस आधार के ही उनके ऊपर आरोपों का बोझ डाल दिया गया और उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए मजबूर किया गया।
आग की घटना से शुरू हुआ विवाद
यह पूरा मामला मार्च 2025 में उनके सरकारी आवास पर लगी आग के बाद सामने आया था। उस दौरान फायर ब्रिगेड को मौके से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिली थी, जिसका वीडियो भी सामने आया। इस घटना के बाद जस्टिस वर्मा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, हालांकि उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे साजिश बताया।
जांच प्रक्रिया पर सवाल
जस्टिस वर्मा ने अपने पत्र में कहा कि कई अहम सबूत उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए और गवाहों की गवाही उनके सामने नहीं हुई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई ऐसे गवाहों को हटा दिया गया, जिनकी गवाही उनके पक्ष में जा सकती थी।
उन्होंने कहा कि जांच में न तो पर्याप्त सबूत पेश किए गए और न ही ऐसा कोई आधार तैयार किया गया जिससे प्रथम दृष्टया मामला साबित होता हो। उनके अनुसार, इस तरह की कार्यवाही में आरोप साबित करने का मानक आपराधिक मामलों की तरह ‘संदेह से परे’ होना चाहिए, जो इस मामले में पूरा नहीं हुआ।
सीजेआई के निर्देश के बाद बढ़ी कार्रवाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आंतरिक जांच शुरू कराई थी। जांच रिपोर्ट के आधार पर जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने का विकल्प दिया गया था। उनके इनकार के बाद मामला राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया।
बाद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जांच के लिए एक समिति गठित की थी, जो आरोपों की पड़ताल कर रही थी।
‘निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिली’
जस्टिस वर्मा ने कहा कि पूरे मामले में उनकी छवि को सार्वजनिक रूप से नुकसान पहुंचाया गया और उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अवसर नहीं मिला। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में इस प्रक्रिया का हिस्सा बने रहना संस्थान और उनके लिए उचित नहीं है।
उन्होंने अंत में कहा कि वे भारी मन से इस प्रक्रिया से हट रहे हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में इस पूरे प्रकरण को निष्पक्ष नजरिए से देखा जाएगा।
इस घटनाक्रम ने न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

