जगतग्राम का अश्वमेध और हिमालय में गूंजती वैदिक परंपरा

सुबह की पहली किरणें बर्फ से ढकी चोटियों को जब सुनहरा बना देती हैं और यमुना की धारा चट्टानों से टकराकर एक गूंजती हुई लय रचती है, तब कल्पना कीजिए कि उसी पवित्र धरती पर सत्रह सौ वर्ष पहले एक असाधारण दृश्य घटित हो रहा है। नदी के किनारे विस्तृत समतल भूमि पर एक भव्य राजसभा सजी है। चारों ओर ब्राह्मण, पुरोहित और योद्धा गंभीर मुद्रा में खड़े हैं। मध्य में एक श्वेत अश्व है, जिसके माथे पर काला चिह्न उसे विशिष्ट बनाता है, और उस पर वैदिक मंत्रों के बीच पवित्र जल से अभिषेक किया जा रहा है। वातावरण में श्रद्धा है, उत्साह है, और साथ ही एक ऐतिहासिक निर्णय का भार भी है। सिंहासन पर विराजमान राजा शीलवर्मन अपने राज्य, अपनी परंपरा और अपनी प्रतिष्ठा के बारे में गहन विचार में डूबे हैं, क्योंकि वे एक ऐसे यज्ञ का आरंभ करने जा रहे हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सत्ता, संस्कृति और सामूहिक स्मृति का उद्घोष है।
यह स्थान है जगतग्राम, जो आज उत्तराखंड के देहरादून जनपद में स्थित है, परंतु उस समय यह हिमालयी संस्कृति और वैदिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। आज जब पुरातत्वविद वहां की मिट्टी को सावधानी से हटाते हैं और प्राचीन ईंटों, वेदियों तथा जले हुए अवशेषों को सामने लाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो इतिहास स्वयं परत दर परत खुल रहा हो। हर ईंट पर अंकित ब्राह्मी लिपि का अक्षर, हर वेदी की संरचना, उस कालखंड की एक सजीव झलक प्रस्तुत करती है। यह केवल शीलवर्मन की कथा नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता के उस आत्मविश्वास की कहानी है, जिसने पर्वतों से लेकर मैदानों तक अपनी सांस्कृतिक धारा को प्रवाहित किया।

अश्वमेध यज्ञ की जड़ें वैदिक काल में बहुत गहराई तक फैली हुई हैं, जब समाज धीरे धीरे संगठित हो रहा था और राजसत्ता को एक वैधानिक तथा धार्मिक आधार देने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। ऋग्वेद और यजुर्वेद में इसके मंत्र मिलते हैं, जबकि शतपथ ब्राह्मण में इसके विस्तृत विधान का उल्लेख है। वहां घोड़े को सूर्य का प्रतीक माना गया है, क्योंकि जैसे सूर्य आकाश में स्वतंत्र रूप से विचरण करता है और समस्त जगत को प्रकाश देता है, वैसे ही अश्व उस राजा की सार्वभौमिकता और उसकी गतिशील शक्ति का प्रतिनिधि बनता है। इस यज्ञ के माध्यम से राजा स्वयं को ब्रह्मांडीय व्यवस्था के साथ जोड़ता था और यह घोषित करता था कि उसकी सत्ता केवल बल पर नहीं, बल्कि धर्म और ऋत पर आधारित है।
अश्वमेध की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और दीर्घकालिक होती थी। एक विशेष रूप से चयनित, दोषरहित और बलवान अश्व को एक वर्ष के लिए मुक्त किया जाता था। उसके साथ सैकड़ों योद्धा चलते थे, जो उसकी रक्षा करते थे, किंतु उसे रोकते नहीं थे। वह जहां जहां जाता, वहां यह संदेश पहुंचता कि यह घोड़ा जिस राजा का है, वह अपनी प्रभुता की घोषणा कर रहा है। यदि किसी अन्य शासक को यह स्वीकार्य नहीं होता, तो वह घोड़े को रोकता और युद्ध होता। यदि घोड़ा निर्बाध लौट आता, तो यह उस राजा की स्वीकृत सार्वभौमिकता का प्रतीक माना जाता। इस प्रकार यह यज्ञ राजनीतिक विस्तार, सैन्य शक्ति और कूटनीतिक संतुलन का अनोखा संगम था।
महाभारत में अश्वमेधिक पर्व इस यज्ञ की एक अत्यंत मार्मिक छवि प्रस्तुत करता है। कुरुक्षेत्र के विनाशकारी युद्ध के बाद युधिष्ठिर आत्मग्लानि से भरे हुए थे और उन्हें लगता था कि राजसत्ता का भार उनके लिए एक बोझ बन गया है। तब श्रीकृष्ण और महर्षि व्यास के मार्गदर्शन में अश्वमेध का आयोजन हुआ, जिससे न केवल राजकीय अधिकार की पुनर्स्थापना हुई, बल्कि समाज में शांति और संतुलन स्थापित करने का प्रयास भी किया गया। अर्जुन घोड़े की रक्षा करते हुए अनेक प्रदेशों में गए, और अंततः यज्ञ की पूर्णाहुति ने एक नए आरंभ का संकेत दिया। इसी प्रकार रामायण में राजा दशरथ द्वारा संपन्न अश्वमेध का वर्णन है, जिसके माध्यम से उन्होंने संतान प्राप्ति की कामना की और कथा के अनुसार उसी के फलस्वरूप राम और उनके भ्राताओं का जन्म हुआ। इन प्रसंगों में अश्वमेध केवल राजकीय कर्मकांड नहीं, बल्कि लोककल्याण और धर्म की प्रतिष्ठा का माध्यम बनकर उभरता है।

इतिहास के प्रवाह में यह यज्ञ कई बार राजनीतिक प्रतीक के रूप में पुनर्जीवित हुआ। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में पुष्यमित्र शुंग द्वारा इसका आयोजन ब्राह्मण परंपरा के पुनर्स्थापन का संकेत माना गया। गुप्त काल में समुद्रगुप्त ने अपने अश्वमेध को स्वर्ण मुद्राओं पर अंकित करवाया, जिनमें बंधा हुआ अश्व और यज्ञ की पूर्णता का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है। यह केवल धार्मिक अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि साम्राज्य की शक्ति और वैधता की सार्वजनिक घोषणा थी। दक्षिण भारत के कुछ राजवंशों ने भी वैदिक अनुष्ठानों का संरक्षण किया, जिससे स्पष्ट होता है कि अश्वमेध की परंपरा समय और भूगोल की सीमाओं को पार करती हुई व्यापक प्रभाव रखती थी।
हिमालयी क्षेत्र में इस परंपरा का प्रवेश और विकास विशेष रूप से रोचक है। प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित कुनिंद वंश को आयुधजीवी गण कहा गया है, जो हिमाचल और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सक्रिय थे। उनके सिक्कों पर अंकित नाम और प्रतीक इस बात के प्रमाण हैं कि यहां संगठित राजनीतिक संरचनाएं विद्यमान थीं। बाद के काल में शैल वंशों के उदय के साथ यह परंपरा और सुदृढ़ हुई, और शीलवर्मन इसी सांस्कृतिक तथा राजनीतिक धारा के प्रतिनिधि माने जाते हैं। कलसी क्षेत्र में अशोक का शिलालेख पहले से ही इस भूभाग को ऐतिहासिक महत्व प्रदान करता है, और जगतग्राम की वेदियां उस परंपरा की एक नई परत जोड़ती हैं।
बीसवीं शताब्दी के मध्य में जब जगतग्राम में उत्खनन हुआ, तो गरुड़ के आकार की तीन वेदियां प्राप्त हुईं, जिन्हें श्येनचिति कहा जाता है। ईंटों पर ब्राह्मी लिपि में शीलवर्मन का उल्लेख इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था कि यहां अश्वमेध संपन्न हुआ था। चौथी वेदी के संकेत ने शोधकर्ताओं की जिज्ञासा और बढ़ा दी। हाल के वर्षों में पुनः आरंभ हुई खुदाई ने इस संभावना को और प्रबल किया है कि शीलवर्मन ने एक से अधिक बार यह यज्ञ कराया। यदि यह प्रमाणित होता है, तो यह हिमालयी क्षेत्र को वैदिक अनुष्ठानों के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित कर देगा।
![]()
समय के साथ समाज में नैतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। बौद्ध और जैन परंपराओं ने पशु बलि पर प्रश्न उठाए, जिसके परिणामस्वरूप अश्वमेध जैसे अनुष्ठान धीरे धीरे कम होते गए। उन्नीसवीं शताब्दी में दयानंद सरस्वती ने इसकी प्रतीकात्मक व्याख्या करते हुए इसे आंतरिक साधना और ऊर्जा के सम्मान के रूप में देखा। आधुनिक काल में भी कुछ संगठनों ने इसे सात्विक और अहिंसक रूप में पुनर्परिभाषित करने का प्रयास किया। यह परिवर्तन दर्शाता है कि भारतीय परंपरा स्थिर नहीं रही, बल्कि समय के साथ संवाद करती हुई विकसित होती रही है।
आज जब हम जगतग्राम की भूमि पर खड़े होकर उन वेदियों के अवशेष देखते हैं, तो यह केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं लगता, बल्कि एक जीवित स्मृति स्थल प्रतीत होता है। वहां की मिट्टी में इतिहास की गूंज है, जो हमें अपने अतीत से जुड़ने का अवसर देती है। उत्तराखंड को प्रायः देवभूमि कहा जाता है, परंतु यह केवल मंदिरों की भूमि नहीं है, बल्कि वैदिक यज्ञों और सांस्कृतिक प्रयोगों की भी भूमि रही है। शीलवर्मन का अश्वमेध इस तथ्य का सशक्त प्रमाण है कि हिमालय केवल तप और ध्यान का केंद्र नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का भी प्रतीक रहा है।
अश्वमेध की कथा अंततः मानव की महत्वाकांक्षा, आस्था और सामूहिक चेतना की कथा है। यह हमें स्मरण कराती है कि शक्ति का अर्थ केवल विजय नहीं, बल्कि व्यवस्था और संतुलन की स्थापना भी है। शीलवर्मन का यज्ञ भले ही इतिहास की धुंध में विलीन हो गया हो, पर उसकी प्रतिध्वनि आज भी उन पहाड़ियों में सुनी जा सकती है, जहां यमुना की धारा निरंतर बहती है। इतिहास मिट्टी में दबा नहीं रहता, वह प्रतीक्षा करता है कि कोई उसे समझे, संरक्षित करे और उससे सीख लेकर भविष्य की दिशा निर्धारित करे। जगतग्राम की वेदियां उसी जीवंत इतिहास की साक्षी हैं, जो हमें अतीत से जोड़ते हुए वर्तमान को समृद्ध और भविष्य को प्रेरित करती हैं।
