नववर्ष 2026 और छत्तीसगढ़ की तीन विलक्षण विभूतियाँ

(ब्लॉगर एवं पत्रकार )
आज अंतरराष्ट्रीय नववर्ष 2026 का पहला दिन है। आप सभी को नए वर्ष की हार्दिक बधाई और बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
आज पहली जनवरी को छत्तीसगढ़ की तीन विलक्षण प्रतिभाओं की जीवन-यात्रा को याद करने का भी दिन है। हमारी स्मृतियों के क्षितिज पर तीनों जगमगाते सितारे आज भले ही इस भौतिक संसार में नहीं हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की चमक आज भी अपनी रोशनी बिखेर रही है। आज तीनों का जन्मदिन है। तीनों प्रतिभाओं को विनम्र नमन।
ये हैं — संघर्षों की आग और आँच में तपे साहित्यकार नारायण लाल परमार, सत्तर के दशक में अपनी ओजस्वी कविताओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के नायक बनकर उभरे संत कवि पवन दीवान, और पत्रकारिता के माध्यम से देश और समाज को अपनी मूल्यवान सेवाएँ देने वाले चन्दूलाल चन्द्राकर।
आइए, इन तीनों विभूतियों की ज़िंदगी के यादगार सफ़र पर डालते हैं एक नज़र —
नारायण लाल परमार
वरिष्ठ साहित्यकार नारायण लाल परमार का जन्म 1 जनवरी 1927 को गुजरात के अंजार (कच्छ) में हुआ था। लेकिन आगे चलकर छत्तीसगढ़ की धरती से उनका नाता कुछ ऐसा जुड़ा कि जीवन पर्यंत उनकी पहचान हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं के श्रेष्ठतम कवि और लेखक के रूप में बनी रही। वह छत्तीसगढ़ के ही होकर रह गए।
उन्होंने धमतरी जैसे छोटे कस्बाई शहर में रहकर अपनी सुदीर्घ साहित्य-साधना से छत्तीसगढ़ को साहित्य के राष्ट्रीय क्षितिज पर गौरवपूर्ण पहचान दिलाई। उनका निधन 27 अप्रैल 2003 को गृह नगर धमतरी (छत्तीसगढ़) में हुआ।
वे बचपन में परिवार के साथ गुजरात से छत्तीसगढ़ आ गए थे। प्रारंभिक और मिडिल स्कूल तक शिक्षा गरियाबंद में हुई। आर्थिक कठिनाइयों के कारण पढ़ाई छूट गई थी। एक इमारती लकड़ी कंपनी में आठ रुपए मासिक वेतन पर नौकरी की। फिर कुछ समय तक टाइम कीपर रहे। जबलपुर में एक तेल मिल में मुनीम के रूप में भी कार्य किया।
इसके बाद सेंट्रल प्रोविंस डिफेंस बटालियन में सैनिक के रूप में भर्ती हुए। डेढ़ साल बाद बटालियन भंग होने पर रायपुर वापस आ गए। गरियाबंद के पास ग्राम पांडुका के मिडिल स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्ति मिली। फिर बागबाहरा में अध्यापक रहे।
स्वाध्याय से बी.ए. और एम.ए. किया। वर्ष 1966 में धमतरी कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए। इसी कॉलेज में पदोन्नत होकर हिन्दी विभागाध्यक्ष बने और वहीं से सेवा-निवृत्त हुए।
परमार जी की साहित्यिक उपलब्धियाँ अत्यंत व्यापक हैं। उन्होंने वर्षों तक हिन्दी और छत्तीसगढ़ी, दोनों भाषाओं में साहित्य-सृजन किया। कविता, कहानी, उपन्यास और नाट्य विधाओं में उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुईं। आंचलिक और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में बड़ी संख्या में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहीं। समय-समय पर आकाशवाणी से भी रचनाओं का प्रसारण हुआ।
उनकी छोटी-बड़ी लगभग चालीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
प्रमुख कृतियाँ —
उपन्यास: प्यार की लाज, छलना, पूजामयी।
कहानी संग्रह: अमर नर्तकी, अटकलों के बीच।
काव्य संग्रह: काँवर भर धूप, रोशनी का घोषणा पत्र, खोखले शब्दों के ख़िलाफ़, सब कुछ निस्पंद है, कस्तूरी यादें, विस्मय का वृन्दावन।
छत्तीसगढ़ी नाट्य साहित्य में प्रमुख एकांकी: लेड़गा सरपंच, अनमोल मोती, ठग विद्या, घुरवा ला बनाव सोन्ना, हिम्मत ला झन हारो, छींक परगे, मतवार।
छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह: सुरुज नइ मरय।
छत्तीसगढ़ी एकांकी संग्रह: मतवार अउ दूसर एकांकी।
बाल साहित्य के अंतर्गत: पानी आगे, पन्द्रह अगस्त, छत्तीसगढ़ की लोककथाएँ, चरित्र बोध की कहानियाँ, बचपन की बांसुरी, पंचतंत्र का अनुवाद – चार मित्र।
सहयोगी काव्य संग्रह नए स्वर (लेखक सहकारी संघ, रायपुर) अप्रैल 1956 में प्रकाशित हुआ था। यह छत्तीसगढ़ के छह युवा कवियों का संयुक्त संकलन था। इसमें परमार जी सहित हरि ठाकुर, गुरुदेव चौबे काश्यप, सतीश चन्द्र चौबे, ललित मोहन श्रीवास्तव और देवीप्रसाद वर्मा ‘बच्चू जांजगीरी’ की रचनाएँ शामिल थीं।
यद्यपि इस संग्रह में परमार जी की जन्म-तिथि 31 दिसम्बर 1927 अंकित है, पर उनके अधिकांश प्रकाशनों में जन्म-दिन 1 जनवरी 1927 ही दर्ज है। बहरहाल, उन्हें जन्मदिन पर विनम्र नमन।
पवन दीवान
पवन दीवान संत कवि के नाम से लोकप्रिय हुए। उनका जन्म 1 जनवरी 1945 को महानदी के किनारे तीर्थ क्षेत्र राजिम के पास ग्राम किरवई में हुआ था।
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन को उनकी हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं ने नई ऊर्जा दी। उनकी हिन्दी कविताओं का संग्रह अम्बर का आशीष वर्ष 2011 में प्रकाशित हुआ, जिसका विमोचन उनके जन्मदिन पर 1 जनवरी 2011 को राजिम स्थित संस्कृत आश्रम में हुआ था। उस अवसर पर मुझे भी उपस्थित होने का सौभाग्य मिला।
उनका कविता-संग्रह मेरा हर स्वर उसका पूजन भी अत्यंत चर्चित और प्रशंसित रहा। लोकप्रिय कवि होने के साथ-साथ वे एक लोकप्रिय भागवत कथावाचक और प्रवचनकर्ता भी थे। देश के आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्हें स्वामी अमृतानंद सरस्वती के नाम से भी जाना जाता था।
वे राजिम से विधायक निर्वाचित होकर वर्ष 1977–79 तक मध्यप्रदेश सरकार में जेल मंत्री रहे। महासमुंद लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी निर्वाचित हुए। ब्रेन हेमरेज के कारण 3 मार्च 2016 को गुड़गांव के एक निजी अस्पताल में उनका निधन हुआ।
परमार जी और दीवान जी, दोनों ने अपनी लेखनी से भारतीय साहित्य जगत में छत्तीसगढ़ को नई पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई। साहित्य आकाश के इन दोनों सितारों ने कवि-सम्मेलनों के मंचों को वर्षों तक आलोकित किया।
चन्दूलाल चन्द्राकर
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के लिए गठित सर्वदलीय मंच के अध्यक्ष रहे चन्दूलाल चन्द्राकर भारत के प्रसिद्ध पत्रकार और राजनीतिज्ञ थे। उनका जन्म 1 जनवरी 1921 को छत्तीसगढ़ के ग्राम निपानी (जिला दुर्ग) में हुआ था।
उन्होंने स्नातक शिक्षा रॉबर्टसन कॉलेज, जबलपुर से प्राप्त की। वर्ष 1945 में नई दिल्ली में पत्रकारिता से जुड़े। अपनी प्रतिभा के बल पर राष्ट्रीय दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक बने।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान विदेशी युद्धभूमि से की गई जीवंत रिपोर्टिंग ने उन्हें विशेष ख्याति दिलाई। उन्होंने नौ बार ओलंपिक खेलों और तीन बार एशियाई खेलों की रिपोर्टिंग की।
वर्ष 1970 में वे पहली बार छत्तीसगढ़ के दुर्ग क्षेत्र से लोकसभा के सांसद चुने गए। उन्होंने पाँच बार सांसद के रूप में लोकसभा में दुर्ग क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1980 से 1982 तक वे केंद्रीय पर्यटन और नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री रहे तथा वर्ष 1985–86 में केंद्रीय कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री का दायित्व संभाला।
इसके पूर्व, वर्ष 1964 से 1970 तक उन्होंने भारत सरकार के प्रिंटिंग प्रेस कर्मचारी संघ के अध्यक्ष पद का भी निर्वहन किया। उनका निधन 2 फरवरी 1995 को हुआ।
