इंद्रावती टाइगर रिजर्व बना गिद्ध संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल, तकनीक और सामुदायिक सहभागिता से नई मिसाल
रायपुर, 1 जनवरी 2026/ छत्तीसगढ़ का इंद्रावती टाइगर रिजर्व गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में देशभर के लिए एक नया और प्रभावी उदाहरण बनकर उभरा है। मध्य भारत के सबसे स्वच्छ नदी–वन पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल यह रिजर्व अब केवल बाघों और जंगली भैंसों का ही नहीं, बल्कि विलुप्तप्राय गिद्धों के संरक्षण का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में इंद्रावती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (Vulture Safe Zones) विकसित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य गिद्धों की घटती आबादी को बचाना और बढ़ाना है, क्योंकि गिद्ध पर्यावरण के प्राकृतिक ‘सफाईकर्मी’ होते हैं और इनके अभाव में संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
गिद्धों के अस्तित्व पर जहरीली पशु-चिकित्सकीय दवाएँ (NSAID), असुरक्षित शव निपटान और मानवीय हस्तक्षेप जैसे गंभीर खतरे बने हुए हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए इंद्रावती टाइगर रिजर्व में उपग्रह (सैटेलाइट) टेलीमेट्री आधारित निगरानी कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है।
अब तक प्राप्त आंकड़ों से पता चला है कि गिद्ध लगभग 10,000 वर्ग किलोमीटर के विस्तृत क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं और घने जंगलों तथा मानव बस्तियों के बीच निरंतर आवाजाही करते हैं। छत्तीसगढ़ में यह अपनी तरह का पहला प्रयास है, जिसमें उच्च-रिज़ॉल्यूशन गिद्ध गतिविधि डेटा का उपयोग संरक्षण रणनीतियाँ तय करने के लिए किया जा रहा है।
वर्ष 2022 से 2025 के बीच गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ दर्ज की गई हैं। राज्य में पहली बार दो गिद्धों की सैटेलाइट ट्रैकिंग के माध्यम से 18,000 से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले GPS डेटा पॉइंट्स प्राप्त किए गए हैं। इससे वन्यजीव प्रबंधन को एक नई वैज्ञानिक दिशा मिली है। इस उपलब्धि में क्षेत्रीय जीवविज्ञानी सूरज कुमार के नेतृत्व में गठित “गिद्ध मित्र दल” की अहम भूमिका रही है। यह स्वयंसेवी दल घोंसलों की निगरानी, शवों के सुरक्षित प्रबंधन और स्थानीय समुदायों को संरक्षण गतिविधियों से जोड़ने का कार्य कर रहा है। इसी सामुदायिक सहयोग का परिणाम है कि “गुड्डा सारी गुट्टा” जैसे दुर्गम क्षेत्रों में पहली बार निर्बाध गिद्ध प्रजनन दर्ज किया गया है।
संरक्षण प्रयासों के तहत उप-निदेशक संदीप बलागा के पर्यवेक्षण में “वुल्चर रेस्टोरेंट” की स्थापना भी की गई है। ये नियंत्रित भोजन स्थल हैं, जहाँ केवल पशु-चिकित्सकीय परीक्षण के बाद NSAID-मुक्त शव उपलब्ध कराए जाते हैं। इससे गिद्धों को सुरक्षित भोजन मिल रहा है। साथ ही ये स्थल सामुदायिक शिक्षा केंद्र के रूप में भी कार्य कर रहे हैं, जहाँ स्कूलों और स्थानीय युवाओं को पारिस्थितिकी तंत्र में गिद्धों की भूमिका के बारे में जागरूक किया जा रहा है।
भविष्य की रणनीति के तहत कार्यक्रम के तीसरे चरण का नेतृत्व भी उप-निदेशक संदीप बलागा करेंगे। इस चरण में तीन अतिरिक्त गिद्धों की सैटेलाइट टैगिंग, 50 से अधिक जन-जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन, पंचायतों की भागीदारी से 100 किलोमीटर क्षेत्र में “गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र” की स्थापना तथा छत्तीसगढ़ की पहली गिद्ध पुनर्वास कार्ययोजना के प्रकाशन का लक्ष्य रखा गया है।
तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक सहभागिता को एक सूत्र में पिरोते हुए इंद्रावती टाइगर रिजर्व यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि दूरदर्शी नेतृत्व में जंगल और स्थानीय समाज साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।
