फीस के विवाद में केस रोकना ‘गंभीर दुराचार’: केरल हाईकोर्ट, वकीलों पर 50 हजार का जुर्माना
केरल हाईकोर्ट ने वकालत पेशे की गरिमा को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि फीस न मिलने के कारण किसी केस को रोकना “हानिकारक और अनुचित आचरण” है। अदालत ने इस मामले में दो वकीलों पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वकील का काम अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करना है, न कि मुकदमे पर नियंत्रण या मालिकाना हक जताना। उन्होंने कहा कि ऐसे आचरण से कानूनी पेशे की गरिमा को नुकसान पहुंचता है।
10 महीने तक रुकी रही राशि
अदालत ने पाया कि संबंधित वकीलों ने अपने मुवक्किल को मिलने वाली डिक्री राशि के भुगतान को करीब 10 महीने तक रोके रखा। कोर्ट ने इसे बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि इस तरह का व्यवहार न्याय व्यवस्था के लिए नुकसानदेह है।
फीस विवाद बना वजह
मामले में सामने आया कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक पुराने केस में वकील और मुवक्किल के बीच फीस को लेकर विवाद हो गया था। आरोप है कि पहले ही बड़ी राशि लेने के बाद अतिरिक्त रकम की मांग की गई और भुगतान न होने पर कार्यवाही को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया गया।
कोर्ट का सख्त रुख
हाईकोर्ट ने साफ किया कि किसी भी वकील को यह अधिकार नहीं है कि वह फीस के विवाद के चलते न्यायिक प्रक्रिया को रोक दे। यदि फीस बकाया है, तो उसके लिए अलग कानूनी रास्ते उपलब्ध हैं, लेकिन केस को बाधित करना पूरी तरह गलत है।
अदालत ने यह भी कहा कि वकील को किसी मुकदमे में स्थायी रूप से बने रहने का अधिकार नहीं है। यदि मुवक्किल किसी अन्य वकील को नियुक्त करना चाहता है, तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
वकालत पेशे की गरिमा पर जोर
कोर्ट ने कहा कि वकील और मुवक्किल के बीच संबंध विश्वास पर आधारित होता है और इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। यदि कोई वकील अपने मुवक्किल के हितों के खिलाफ काम करता है, तो यह पेशे की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
अदालत ने संबंधित वकीलों को निर्देश दिया है कि वे छह सप्ताह के भीतर यह जुर्माना केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को जमा करें।
कोर्ट की इस टिप्पणी को वकालत पेशे में नैतिकता और जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।

