विकलांगता प्रमाण पत्र पर हाईकोर्ट का अहम फैसला, जांच का अधिकार केवल मेडिकल बोर्ड को
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विकलांगता प्रमाण पत्रों की वैधता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसे प्रमाण पत्रों की जांच और सत्यापन का अधिकार केवल सक्षम चिकित्सा बोर्ड के पास है, न कि किसी राजस्व अधिकारी के पास।
जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकल पीठ ने एक शिक्षक की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि एसडीएम जैसे प्रशासनिक अधिकारियों के पास चिकित्सा विशेषज्ञता नहीं होती, इसलिए वे किसी मेडिकल प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित नहीं कर सकते।
क्या है मामला?
यह मामला महासमुंद जिले के लखन बिहारी पटेल से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2010 में विकलांग श्रेणी के तहत सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त किया गया था। उस समय जिला चिकित्सा बोर्ड ने उन्हें श्रवण बाधित होने का प्रमाण पत्र जारी किया था।
बाद में पारिवारिक विवाद के चलते उनके भाई ने शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि यह प्रमाण पत्र फर्जी है। इसके आधार पर कलेक्टर ने एसडीएम को जांच के निर्देश दिए।
एसडीएम की कार्रवाई पर सवाल
जांच के बाद एसडीएम ने 2020 में प्रमाण पत्र को अमान्य करार देते हुए धोखाधड़ी की आशंका जताई और आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की। हालांकि, कोर्ट में यह सामने आया कि इस निष्कर्ष के लिए 2018 की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था, जो मूल प्रमाण पत्र के कई साल बाद की थी।
अदालत ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि समय के साथ किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति में बदलाव आ सकता है, इससे पुराने प्रमाण पत्र को फर्जी नहीं माना जा सकता।
कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन
कोर्ट ने अपने फैसले में विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 का हवाला देते हुए कहा कि प्रमाण पत्र की जांच के लिए स्पष्ट वैधानिक प्रक्रिया तय है। इस प्रक्रिया को नजरअंदाज करना अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है।
साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने एसडीएम के आदेश और आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश को रद्द कर दिया है। साथ ही, संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया गया है कि याचिकाकर्ता का मूल प्रमाण पत्र तुरंत लौटाया जाए।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन चाहे तो तय कानूनी प्रक्रिया के तहत सक्षम चिकित्सा बोर्ड से प्रमाण पत्र का पुनः परीक्षण करा सकता है।
इस फैसले को विकलांगता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्टता बनी रहेगी।

