जब एक युवा ने साम्राज्य को चुनौती दी : हेमू कालाणी
भारतीय स्वाधीनता संग्राम असंख्य बलिदानों का इतिहास है। हजारों-लाखों जीवन की आहुति के बाद भारत में स्वतंत्रता का सूर्य उदित हो सका। ऐसे ही एक अमर बलिदानी हेमू कालाणी हैं। संभवतः उनका जन्म ही स्वाधीनता संग्राम के लिये हुआ था। वे बाल्यावस्था में ही, केवल सात वर्ष की आयु से, हाथ में तिरंगा लेकर प्रभात फेरियों में शामिल होने लगे थे। स्वतंत्रता संघर्ष का नशा कुछ ऐसा चढ़ा कि जीवन के बलिदान के बाद ही शांत हो सका।
क्रांतिकारी हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को सिंध प्रांत के सुक्कुर में हुआ था। यह क्षेत्र अब पाकिस्तान में है। उनका परिवार आर्यसमाज से जुड़ा हुआ था। पिता पेसूमलजी की सक्रिय भागीदारी आर्यसमाज के प्रत्येक आयोजनों में रहती थी। इस कारण परिवार में स्वत्व, स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र-जागरण का भाव गहराई से विद्यमान था। संयोग से बलिदानी हेमू कालाणी का जन्म ठीक उसी दिन हुआ था, जिस दिन इतिहास प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी।
उनके पिता पेसूमल कलाणी व्यवसायी थे और माता जेठी बाई धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के लिये समर्पित थीं। पंजाब और सिंध का यह क्षेत्र तीन परंपराओं से विशेष रूप से जाग्रत था। एक ओर आर्यसमाज के सांस्कृतिक अभियान, दूसरी ओर क्रांतिकारियों के आंदोलन और तीसरी ओर गांधी जी के स्वदेशी आह्वान का प्रभाव था। उस क्षेत्र का बच्चा-बच्चा स्वदेशी और राष्ट्र-जागरण के रंग में रंग रहा था। गांव-गांव में प्रभात फेरियां निकलने लगी थीं। जब हेमू केवल सात वर्ष के थे, तब उन्होंने हाथ में तिरंगा लेकर प्रभात फेरियों में भाग लेना आरंभ कर दिया था। स्वदेशी का यह भाव, जो उनके बचपन में पनपा, अंतिम श्वास तक यथावत रहा।
किशोर अवस्था में वे क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रति आकर्षित हुए और क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए। वे टोली बनाकर दोनों दिशाओं में एक साथ काम करने लगे। अंग्रेजों से भारत को स्वतंत्र कराने के जलसे-जुलूसों में भी भाग लेते और क्रांतिकारी गतिविधियों में भी सक्रिय रहते। सामाजिक जागृति के लिये अपने क्षेत्र में आयोजित प्रत्येक प्रदर्शन में वे भाग लेने लगे। पढ़ाई में वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। इसके साथ ही खेल-कूद, तैराकी और दौड़ स्पर्धाओं में भी सक्रिय रहते थे। विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में वे कई बार पुरस्कृत हुए।
समय की यात्रा आगे बढ़ी और वर्ष 1942 आया। तब वे मात्र उन्नीस वर्ष के थे। पूरे देश में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हो गया। गांधी जी ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने का आह्वान किया और भारतीयों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। यद्यपि आंदोलन की पूर्व बेला में गांधी जी सहित कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेता बंदी बना लिये गए थे, फिर भी आंदोलन रुक न सका। यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त बन गया। पूरा देश मानो आंदोलन से जुड़ गया। जो जहां था, वहीं से आंदोलन में शामिल हो गया।
युवा हेमू कालाणी भी अपने मित्रों की एक टोली बनाकर आंदोलन में कूद पड़े। वे जिस संगठन के माध्यम से क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे, उसका नाम ‘स्वराज सेना’ था। सिंध प्रांत के आंदोलन में इस संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इसी संगठन के आह्वान पर हेमू ने ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ के नारे के साथ पूरे सिंध में स्वदेशी अभियान छेड़ दिया। वे विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने के आह्वान की सभाएं कर नौजवानों को जाग्रत कर रहे थे।
इसी दौरान क्रांतिकारियों को जानकारी मिली कि बलूचिस्तान में चल रहे आंदोलन को कुचलने के लिये अंग्रेज सैनिकों, हथियारों और बारूद से भरी एक रेलगाड़ी सिंध के रोहिणी स्टेशन और सुक्कुर शहर से होकर बलूचिस्तान के क्वेटा नगर जाएगी। यह समाचार सुनकर संगठन ने इस रेलगाड़ी को रोकने का दायित्व उन्नीस वर्षीय छात्र हेमू कालाणी और उनकी टोली को सौंपा।
23 अक्टूबर 1942 की वह रात थी। क्रांतिकारी हेमू कालाणी ने अपने साथ दो सहयोगी, नंद और किशन, को लिया। तीनों ने पहले से रेलगाड़ी के मार्ग का अध्ययन कर लिया था। वे रेल मार्ग पर पहुंचे। हेमू कालाणी ने रिंच और हथौड़े की सहायता से रेल की पटरियों की फिशप्लेटों को उखाड़ना आरंभ कर दिया। अन्य दोनों साथी निगरानी के लिये तैनात थे। रात के सन्नाटे में हथौड़े की आवाजें दूर तक जा रही थीं। यह आवाज गश्त कर रहे सिपाहियों ने भी सुनी और वे दौड़ते हुए वहां पहुंचे।
सिपाहियों को देखकर निगरानी में लगे नंद और किशन अंधेरे का लाभ उठाकर भाग गए, किंतु हेमू कालाणी पकड़े गए। उन्हें क्रूरतम शारीरिक यातनाएं दी गईं। सिपाहियों ने दो लोगों को भागते देखा था, जिनमें एक हेमू कालाणी थे और दूसरा नंद किशन। दोनों को बंदी बना लिया गया। कठोर यातनाएं देकर उनसे अन्य साथियों के नाम पूछे गए, पर वे यातनाओं से टूटे नहीं और अपने किसी भी साथी का नाम नहीं बताया।
सुक्कुर की मार्शल लॉ कोर्ट में उन पर मुकदमा चला। उन पर देशद्रोह का अभियोग लगाया गया और कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस निर्णय के अनुमोदन के लिये मामला सिंध प्रांत के हैदराबाद स्थित सेना मुख्यालय के प्रमुख अधिकारी कर्नल रिचर्डसन के पास भेजा गया। ब्रिटिश काल में मार्शल लॉ कोर्ट के आदेश पर अंतिम निर्णय सेना के वरिष्ठ अधिकारी ही लेते थे। कर्नल रिचर्डसन ने हेमू कालाणी को ब्रिटिश राज के लिये खतरनाक शत्रु घोषित किया और आजीवन कारावास की सजा को फांसी में बदल दिया।
अंततः 21 जनवरी 1943 को प्रातः सात बजकर 55 मिनट पर क्रांतिकारी हेमू कालाणी को फांसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु मात्र उन्नीस वर्ष थी। वे पूरे सिंध में नौजवानों के आदर्श बन चुके थे। उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया गया तथा देश के विभिन्न नगरों में उनके नाम पर सड़कों और कॉलोनियों के नाम रखे गए।

