सिद्धांतनिष्ठ पत्रकारिता का स्वर्णिम अध्याय गुरुदेव काश्यप चौबे

गुरुदेव काश्यप चौबे का जन्म 15 अगस्त 1935 को रायगढ़ में हुआ। हाई स्कूल तक की शिक्षा उन्होंने रायगढ़ में ही प्राप्त की। प्रारंभ से ही अध्ययनशील और गंभीर स्वभाव के रहे गुरुदेव आगे चलकर छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता और साहित्य जगत में एक विशिष्ट पहचान बने।
उनका संपादकीय लेखन मौलिक हुआ करता था। ताज़ा घटनाक्रमों पर वे तार्किक और निष्पक्ष ढंग से लिखा करते थे। चाहे राजनीतिक घटनाक्रम हो, प्रादेशिक समस्याएँ हों या राष्ट्रीय मुद्दे, उनके संपादकीय जनचर्चा का विषय बन जाते थे। कई बार उनके उद्धरण विभिन्न मंचों और प्रसंगों में प्रस्तुत किए जाते थे।
पत्रकारिता के क्षेत्र में 1952 से 1974 तक उनका साधना क्षेत्र रायपुर रहा। कलकत्ता और बिलासपुर में कार्य करने के बाद वे रायगढ़ में स्थायी रूप से संपादकीय उत्तरदायित्व निभाते रहे। उन्होंने ‘दैनिक महाकौशल’ के संपादकीय विभाग में अपनी सेवाएँ दीं। लगभग 1974 के आसपास बिलासपुर संभाग से निकलने वाली प्रथम ‘दैनिक बिलासपुर टाइम्स’ के अलावा ‘लोकस्वर’ और ‘प्रजापति’ का भी संपादन किया। इसके बाद 1981 में उन्होंने अपने गृह नगर रायगढ़ से ‘दैनिक रायगढ़ संदेश’ का प्रकाशन आरंभ किया।
प्रदेश की ताज़ा घटनाओं से लेकर रायगढ़ से दिल्ली तक के मुद्दों पर वे संपादकीय लिखा करते थे। उनकी भाषा सहज, गहरी और प्रभावपूर्ण होती थी। जहाँ संकेत पर्याप्त होते थे, वहाँ उनकी शैली व्यंग्यात्मक रूप ले लेती थी। इतिहास और संस्कृति पर उन्होंने संपादकीय लिखा हो, ऐसा कम ही स्मरण होता है। उनकी टिप्पणियाँ मुख्यतः राजनीतिक और समसामयिक विषयों पर केंद्रित रहती थीं। यदि वे किसी बड़े महानगर में कार्यरत होते, तो संभवतः उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक चर्चित होता।
संसाधनों के अभाव के बावजूद उन्होंने महानगरों के बड़े अखबारों में काम करने के अवसर छोड़कर रायगढ़ में ही अखबार प्रकाशन का मार्ग चुना। निरंतर संघर्ष करते हुए उन्होंने ‘रायगढ़ संदेश’ को शिखर तक पहुँचाया। यह अत्यंत दुःख का विषय है कि उनके नहीं रहने पर ‘रायगढ़ संदेश’ को उसी सुदृढ़ता से आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं रहा।
उनके सहकर्मियों में वरिष्ठ पत्रकार रमेश अग्रवाल, अनिल रतेरिया, अनिल पांडे, महेश शर्मा, यशवंत ठाकुर, अनिल सोनी और बसंत राघव प्रमुख रहे।
व्यक्तिगत जीवन में वे कम बाहर निकलते थे। रायगढ़ संदेश कार्यालय की ऊपरी मंजिल पर सुदर्शना आंटी, देबू और बहन हर्षा के साथ रहते थे। हार्ट की बाईपास सर्जरी के बाद चिकित्सकीय कारणों से उन्हें कुछ समय के लिए टहलने बाहर जाना पड़ता था। वे कम बोलते थे और अत्यंत गंभीर स्वभाव के थे। लोग उनसे चर्चा करने में संकोच करते थे। किंतु आनंदी सहाय शुक्ल उनसे बेझिझक संवाद कर लेते थे और उन्हें बोलने के लिए प्रेरित कर देते थे।
कभी-कभार मन हुआ तो वे इप्टा, ललित कला केंद्र या मधुरिमा की गोष्ठियों में पहुँच जाते थे। एक बार वे मेरे जन्मदिन पर भी घर आए थे। उनकी एक कविता की पंक्ति थी, “बूढ़ापे में लड़की का चाय लेकर आना भी एक बसंत है।” वे बसंत की ऐसी मानवीय और सूक्ष्म परिभाषाएँ रचते थे। उनके अनुसार, कँपकँपाते हाथों से किसी बेटे का सहारा बनना भी बसंत है। उनकी कविताओं में जीवन के साधारण क्षणों की असाधारण व्याख्या मिलती है।
वे केवल संपादक और पत्रकार ही नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुरुदेव का अंग्रेज़ी भाषा पर भी उतना ही अधिकार था जितना हिंदी पर। ‘धूप का एक दिन’, ‘अभिशप्त उत्कल’, ‘मीठे कनेर का दरख्त’ और ‘नैवेद्य’ उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। ‘धूप का एक दिन’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद से सम्मानित किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने चर्चित उपन्यासकार ब्लादीमीर नोबोकोव के प्रसिद्ध उपन्यास ‘लौलिता’ का प्रथम हिंदी अनुवाद भी किया।
छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के पुरोधा और वरिष्ठ साहित्यकार गुरुदेव काश्यप चौबे का निधन 11 अगस्त 2016 को रायगढ़ के ओपी जिंदल अस्पताल में हुआ। वे 82 वर्ष के थे। उन्होंने लगभग 35 वर्षों तक अपनी लेखनी से समाज को प्रभावित किया। वे श्रमजीवी पत्रकार संघ के संस्थापक अध्यक्ष भी रहे।
आज का समय पत्रकारिता के लिए चुनौतीपूर्ण है। फेक न्यूज, फ्रॉड न्यूज, एडिटेड न्यूज और टीआरपी की होड़ ने पत्रकारिता की मूल आत्मा को आहत किया है। रिपोर्टर का दायित्व केवल समाचार देना नहीं, बल्कि सत्ता को आईना दिखाना और जनता की आवाज को ईमानदारी से प्रस्तुत करना है। मीडिया जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करती है। समाचार पत्र यदि चाहें तो सत्ता की जड़ों को हिला सकते हैं, किंतु दुर्भाग्य से आज अनेक पत्रकार और संपादक सत्ता या किसी विशेष विचारधारा के गुणगान में व्यस्त दिखाई देते हैं। ब्लैकमेलिंग और आर्थिक लाभ की प्रवृत्तियाँ भी बढ़ी हैं। निष्पक्षता, ईमानदारी और साहस जैसे मूल्य दुर्लभ होते जा रहे हैं।
ऐसे समय में गुरुदेव काश्यप चौबे जैसे व्यक्तित्व अपवाद की तरह याद आते हैं। वे सिद्धांतवादी, ईमानदार और निष्ठावान संपादक थे। उनके पास विरासत में देने के लिए पुरानी प्रिंटिंग मशीन, कुछ पुस्तकें और पैतृक मकान के अलावा कुछ नहीं था। उन्होंने अपने पेशे को कभी कलंकित नहीं होने दिया। निष्पक्षता और निडरता उनकी पहचान थी।
समाचारों की प्रूफरीडिंग के बाद भी वे स्वयं एक-एक शब्द ध्यान से पढ़ते थे, तब जाकर सामग्री छपने के लिए भेजी जाती थी। भाषा के प्रति ऐसी सजगता और अनुशासन आज विरल है। गुरुदेव काश्यप चौबे की स्मृति पत्रकारिता के उस स्वर्ण अध्याय की याद दिलाती है, जहाँ सिद्धांत ही सबसे बड़ी पूँजी हुआ करते थे।
