गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: जज और कोर्ट स्टाफ के लिए एआई के उपयोग पर सख्त रोक
गुजरात हाई कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस्तेमाल को लेकर सख्त नीति जारी की है। इस नई नीति के तहत जजों और कोर्ट स्टाफ को आदेश लिखने, फैसले तैयार करने या किसी भी तरह के न्यायिक निर्णय में एआई टूल्स के उपयोग से प्रतिबंधित कर दिया गया है।
अदालत द्वारा जारी “न्यायिक और न्यायालय प्रशासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग” संबंधी इस नीति में साफ कहा गया है कि एआई का इस्तेमाल किसी भी प्रकार के निर्णय, न्यायिक तर्क, आदेश लेखन, सजा या जमानत पर विचार जैसे मामलों में नहीं किया जा सकता।
नीति का दायरा और आधार
यह नीति संविधान के अनुच्छेद 225 और 227 के तहत बनाई गई है और इसे अनुच्छेद 21 में निहित निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जोड़ा गया है। यह नियम हाई कोर्ट के साथ-साथ जिला न्यायपालिका, न्यायिक अधिकारियों, कोर्ट स्टाफ, विधि सहायक, इंटर्न और पैरालीगल वालंटियर्स सभी पर लागू होगा।
एआई उपयोग पर सख्त पाबंदी
नई व्यवस्था के अनुसार, एआई का उपयोग किसी भी मामले में तथ्य या कानून तय करने, साक्ष्यों को छांटने, उनकी विश्वसनीयता आंकने, गवाहियों का सार बनाने या किसी भी प्रकार के न्यायिक मूल्यांकन के लिए नहीं किया जा सकेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही एआई द्वारा तैयार सामग्री को बाद में जज देख लें, फिर भी उसका उपयोग निर्णय प्रक्रिया में स्वीकार्य नहीं होगा।
सीमित क्षेत्रों में ही अनुमति
हालांकि, कुछ सहायक कार्यों में एआई के उपयोग की अनुमति दी गई है। इसमें कानूनी शोध, पुराने फैसलों की खोज, उदाहरण (precedents) पहचानना और कानून की व्याख्या जैसे प्रारंभिक कार्य शामिल हैं, लेकिन इसके लिए मानवीय जांच और पुष्टि अनिवार्य होगी।
इसके अलावा प्रशासनिक कार्यों जैसे आईटी से जुड़े काम, आंतरिक प्रशिक्षण के लिए प्रारूप तैयार करना, नोटिस या सर्कुलर बनाना आदि में भी एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है। ड्राफ्ट की भाषा और प्रस्तुति सुधारने में भी एआई मदद ले सकता है, लेकिन अंतिम कानूनी तर्क पूरी तरह जज का ही होना चाहिए।
जिम्मेदारी तय, गलती पर कार्रवाई
नीति के अनुसार, एआई से तैयार किसी भी सामग्री पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति की पूरी जिम्मेदारी होगी। किसी भी त्रुटि, चूक या गलत जानकारी के लिए संबंधित अधिकारी या जज जवाबदेह होंगे। एआई का इस्तेमाल गलती के बचाव के रूप में नहीं किया जा सकेगा।
संवेदनशील जानकारी पर भी रोक
अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सार्वजनिक एआई टूल में केस से जुड़ी गोपनीय जानकारी, पक्षकारों के नाम-पते, गवाहों का विवरण, निजी या संवेदनशील डेटा (जैसे स्वास्थ्य, वित्तीय या जाति संबंधी जानकारी) दर्ज करना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई
इस नीति के उल्लंघन को कदाचार माना जाएगा और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 और भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत कानूनी कार्रवाई भी संभव है।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक आदेश और फैसलों की जिम्मेदारी पूरी तरह जज की होती है और इसे किसी भी स्थिति में एआई के साथ साझा या स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।

