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भगतसिंह के प्रेरणास्रोत और गदर क्रांति के अग्रदूत

अमर बलिदानी करतार सिंह सराबा क्राँतिकारियों के आदर्श थे। सुप्रसिद्ध सरदार भगतसिंह भी उन्हें अपना गुरु और प्रेरणास्रोत मानते थे। उन्नीस वर्ष की आयु में जब करतार फाँसी पर चढ़ाया गया, तब उन्होंने कहा था कि मुझे गर्व है कि मैं अपने पूर्वजों की परंपरा के अनुरूप मातृभूमि के लिए प्राण दे रहा हूँ।

ऐसे अमर बलिदानी क्राँतिकारी करतार सिंह सराबा का जन्म 24 मई 1896 को लुधियाना जिले के ग्राम सराभा में हुआ था। इनके पिता श्री मंगल सिंह गाँव के एक संपन्न और प्रतिष्ठित किसान थे। माता साहिब कौर धार्मिक विचारों की महिला थीं और गुरुद्वारे से जुड़ी थीं। करतार सिंह अभी केवल पाँच वर्ष के थे कि उनके माता-पिता दोनों का देहांत हो गया था। उनका पालन-पोषण उनके दादाजी ने किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा खालसा स्कूल, लुधियाना में हुई थी। उनके चाचा उड़ीसा में रहते थे। आगे की पढ़ाई के लिए चाचा के पास गये। चाचा ने उन्हें पढ़ने के लिए सान फ्रान्सिस्को भेज दिया। तब उनकी आयु केवल चौदह वर्ष थी। उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए प्रवेश लिया।

कैलिफोर्निया में वातावरण अलग था। वहाँ अंग्रेज और अन्य गोरे यूरोपियन्स लोग भारतीयों सहित सभी काले रंग के नागरिकों को हेय दृष्टि से देखते थे। भारतीयों को दास कहा जाता था। चलते-फिरते अपमान हो जाना सामान्य बात थी। इस भाव के प्रति भारतीय छात्रों में रोष था, लेकिन खुलकर विरोध न हो पा रहा था। इस वातावरण ने करतार सिंह के विचारों की दिशा बदल दी। वे पढ़कर उच्च पद पाने की बजाय भारतीयों की प्रतिष्ठा और आत्म-सम्मान रक्षा के उपायों पर विचार करने लगे।

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सान फ्रान्सिस्को में उन्हें इस विचार के अन्य छात्र भी मिले। इन सब छात्रों का एक समूह बन गया, जिनके मन में देशप्रेम था। भारतीय छात्र अक्सर अपनी समस्याओं पर चर्चा करते और एक-दूसरे से अपने दुख साझा करते थे। कनाडा और अमेरिका के प्रशांत तटों पर बसने वाले भारतीय आप्रवासियों का एक समूह बन गया, जिसने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति का संकल्प लिया। इन सभी भारतीयों का मनोभाव “करो या मरो” की सीमा तक दृढ़ हो गया।

करतार सिंह अपनी कार्यशैली से बहुत शीघ्र इस राष्ट्रप्रेमी समूह के अग्रणी सदस्य युवा बन गये। सान फ्रान्सिस्को में इस जागृति अभियान के साथ सशस्त्र क्राँति की तैयारियाँ भी आरंभ हुईं। अपनी सक्रियता के साथ उनका संपर्क लाला हरदयाल जी से हो गया। करतार सिंह उनके मार्गदर्शन में आगे बढ़े। लाला हरदयाल जी गदर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे। 1913 में उन्होंने सोहन सिंह भकना, पंडित कांशी राम, हरनाम सिंह टुंडीलाट आदि के साथ मिलकर गदर पार्टी की स्थापना की थी। गदर पार्टी सशस्त्र संघर्ष के द्वारा अंग्रेजों से भारत की मुक्ति का अभियान चला रही थी। इस संगठन का मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को में ही था।

लालाजी के माध्यम से करतार सिंह इससे जुड़ गये। पोर्टलैण्ड में हुए गदर पार्टी के सम्मेलन में भी करतार सिंह शामिल हुए। वहाँ ‘युगान्तर आश्रम’ की स्थापना में करतार सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण थी। क्राँति के लिए साप्ताहिक समाचार पत्र ‘गदर’ का प्रकाशन आरंभ हुआ। करतार सिंह ने अपने घर से पढ़ाई के लिए आये 200 पौंड इस समाचार पत्र प्रकाशन के लिए लाला जी को दे दिये। इस पत्र में अन्य सामग्री के साथ भारत में हुई 1857 की क्रांति की भी प्रेरक सामग्री होती थी, जिससे नौजवानों में नई ऊर्जा का संचार होता।

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उन्हीं दिनों प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो गया। तब करतार सिंह भारत आ गये। जनवरी 1914 में समाचार पत्र ‘गदर’ का गुरुमुखी संस्करण आरंभ हुआ। लाला हरदयाल जी इसके संपादक और करतार सिंह उपसंपादक बने। आगे चलकर ‘गदर’ का उर्दू संस्करण भी आरंभ हुआ। इस संस्करण के संपादक करतार सिंह बने। अपने इस जन जागरण अभियान के साथ युवाओं की सशस्त्र संघर्ष तेज करने की भी योजना बनी। इसके लिए बंगाल गये और रासबिहारी बोस तथा शचीन्द्रनाथ सान्याल सहित अन्य क्राँतिकारियों से भी भेंट की। 21 फरवरी 1915 को पूरे देश में एक साथ क्राँति करने की योजना बनी।

करतार सिंह को पंजाब में क्राँति का दायित्व मिला। उन्होंने कई धार्मिक स्थानों की यात्रा करके युवकों को जोड़ा। इसके साथ फिरोजपुर, रावलपिंडी और लाहौर की सैन्य छावनियों के सेना के सिपाहियों से भी संपर्क करके क्राँति से जोड़ने की योजना बनी। रेल तथा डाक व्यवस्था को भंग करने की भी योजना बनाई। पंजाब में क्राँति की इन गतिविधियों का केन्द्र लाहौर बनाया गया। वहाँ लाहौर छावनी के शस्त्रागार का चौकीदार भी क्राँति से जुड़ गया और योजना पूर्वक सौ रिवाल्वर एवं अन्य सामग्री जुटा ली गई। धन और शस्त्र जुटाने का अभियान चल ही रहा था कि कृपाल सिंह नामक एक पुलिस कर्मचारी ने विश्वासघात कर दिया। उसने ब्रिटिश अधिकारियों को सूचित कर दिया।

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शस्त्रागार से शस्त्र गायब होने से अंग्रेज अधिकारियों में खलबली मच गई थी। इस सूचना से पुलिस और सेना ने धरपकड़ आरंभ कर दी। करतार सिंह अपने कुछ साथियों के साथ लाहौर से निकल गये, लेकिन सरगोधा में गिरफ्तार कर लिये गये। पूरे पंजाब में धरपकड़ आरंभ हुई और कुल 60 युवा क्राँतिकारी बंदी बना लिए गये। इतिहास में इन गिरफ्तारियों का “पहले लाहौर षड्यंत्र केस” के रूप में उल्लेख है।

करतार सिंह ने अपने साथियों को बचाने के लिए सारी जिम्मेदारी स्वयं पर ले ली। न्यायाधीश ने उन्हें अपना बयान बदलने और माफी माँगने को कहा ताकि सजा कम दी जा सके, लेकिन करतार सिंह ने जो कहा, उससे न्यायधीश ने फाँसी की सजा सुना दी। उन्होंने कहा था—”मुझे दुख है कि मैं क्राँति को सफल न बना सका।” एक बार उन्होंने जेल से भागने का भी प्रयास किया, लेकिन सफल न हो सके।

अंततः 16 नवम्बर 1915 को करतार सिंह सराबा और उनके छह साथियों—विष्णु गणेश पिंगले, हरनाम सिंह, बख्शीश सिंह, जगत सिंह, सुरेन सिंह एवं सुरेन्द्र सिंह—को लाहौर के केन्द्रीय कारागार में फाँसी दे दी गई।