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स्वदेशी और स्त्री शिक्षा की प्रणेता : दुर्गाबाई देशमुख

दुर्गाबाई देशमुख एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थीं जिन्होंने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के संघर्ष में जेल की सजा भुगती और स्वदेशी की चेतना जगाने के लिए कन्या पाठशाला आरंभ की। उनका जीवन अंग्रेजों के उस कुप्रचार का खंडन है जिसमें कहा जाता है कि अंग्रेजों के आने के पहले भारत में स्त्री शिक्षा नहीं थी। सल्तनतकाल में बदलाव जरूर आए, लेकिन कई महापुरुषों ने निजी स्तर पर परंपराएँ बनाए रखीं। इसी परंपरा में लोकमाता अहिल्याबाई ने शिक्षा पाई और उसी धारा से दुर्गाबाई देशमुख ने भी शिक्षा ग्रहण की।

दुर्गाबाई देशमुख का जन्म 15 जुलाई 1909 को आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा क्षेत्र के अंतर्गत राजामुंद्री में हुआ था। उनके पिता रामाराव भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। जब वे दस वर्ष की थीं, तब पिता का निधन हो गया। उनकी माता कृष्णावेनम्मा भी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी थीं और कांग्रेस की सचिव बनीं। कृष्णावेनम्मा स्वदेशी का प्रचार करती थीं और बालिका दुर्गा उनके साथ घर-घर जाती थीं।

उनके परिवार में शिक्षा का वातावरण था। माता अंग्रेजी के साथ संस्कृत और तेलुगू भाषा जानती थीं। दुर्गाबाई देशमुख ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही प्राप्त की। उनकी माँ, कृष्णावेनम्मा, उन्हें संस्कृत, तेलुगू और हिंदी सिखाती थीं। अंग्रेजी भाषा की शिक्षा के लिए उन्होंने स्वयं प्रयास किया। माँ की प्रेरणा से दुर्गाबाई ने आसपास की बालिकाओं को पढ़ाने का कार्य किया और स्वदेशी एवं स्वभाषा आधारित लड़कियों की पाठशाला आरंभ की। गांधीजी ने उनके इस कार्य की सार्वजनिक प्रशंसा की और अनुकरणीय बताया।

दुर्गाबाई ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। 1930 में आरंभ हुए नमक सत्याग्रह में 25 मई 1930 को गिरफ्तार हुईं और एक वर्ष की सजा हुई। जेल से लौटकर पुनः सक्रिय हुईं और फिर गिरफ्तार कर ली गईं। इस बार उन्हें तीन वर्ष का कारावास हुआ। दुर्गाबाई ने जेल में अंग्रेजी सीखी। जेल से लौटकर उन्होंने बीए पास किया और वकालत पढ़ने मद्रास चली गईं।

मद्रास विश्वविद्यालय से पहले एम.ए. और फिर वकालत पास की। वे इतनी मेधावी थीं कि प्रत्येक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और पदक प्राप्त किए। 1942 में उन्होंने वकालत आरंभ की और हत्या के मुक़दमे में बहस करने वाली भारत की पहली महिला वकील बनीं।

1946 में दुर्गाबाई संविधान परिषद् की सदस्य बनीं। दुर्गाबाई ने आंध्र महिला सभा की स्थापना की, जो महिलाओं और बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए काम करती थी। स्वतंत्रता के बाद 1948 में उन्होंने आंध्र एजुकेशन सोसायटी की स्थापना की, जो स्थानीय बच्चों को तेलुगू एवं स्थानीय शिक्षा संचालन के लिए थी।

दुर्गाबाई ने महिला शिक्षा को प्राथमिकता देने के लिए सरकार को कई सुझाव दिए, जिनमें सह-शिक्षा का सुधार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में महिला शिक्षा के लिए अतिरिक्त बजट और लड़कियों के लिए निशुल्क शिक्षा के प्रावधान शामिल थे।

1952 में उनका विवाह तत्कालीन वित्तमंत्री चिंतामणि देशमुख से हुआ। दुर्गाबाई देशमुख महिलाओं से संबंधित कई संस्थाओं की सदस्य रहीं। योजना आयोग द्वारा प्रकाशित ‘भारत समाज सेवा विश्वकोश’ उन्हीं की देखरेख में तैयार हुआ। 1953 में वे केंद्रीय ‘सोशल वेलफेयर बोर्ड’ की पहली अध्यक्ष बनीं।

स्वतंत्रता के बाद दुर्गाबाई का पूरा ध्यान स्वदेशी और स्त्री शिक्षा पर रहा। उन्होंने सरकार से स्त्री शिक्षा को प्राथमिकता देने और केंद्र एवं राज्यों में पृथक शिक्षा विभाग बनाने का सुझाव दिया था। उन्होंने सह-शिक्षा के स्तर को व्यवस्थित करने, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में स्त्री शिक्षा के लिए अतिरिक्त बजट राशि, और लड़कियों के लिए निशुल्क शिक्षा का प्रावधान करने का भी सुझाव दिया।

1962 में उन्होंने गरीबों की सेवा के लिए एक नर्सिंग होम स्थापित किया, जो अब दुर्गाबाई देशमुख हॉस्पिटल के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। अस्वस्थता के चलते 9 मई 1981 को श्रीकाकुलम जिले के नरसनपेटा में उनका निधन हुआ। उनकी स्मृति में विशाखापट्टनम स्थित आंध्र विश्वविद्यालय ने अपने महिला अध्ययन विभाग का नाम ‘डॉ. दुर्गाबाई देशमुख महिला अध्ययन केंद्र’ रखा है।

उनके सम्मान में कई पुरस्कार और संस्थाएँ स्थापित की गई हैं, जो महिला सशक्तिकरण और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। डॉ. दुर्गाबाई देशमुख का जीवन और कार्य भारतीय समाज में महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के महत्व को स्थापित करने में मील का पत्थर साबित हुआ। उनका समर्पण और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

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