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छत्तीसगढ़ की संस्कृति और पारिस्थितिकी का जीवंत सेतु छिंद का वृक्ष

आचार्य ललित मुनि
आचार्य ललित मुनि

छत्तीसगढ़ की वन संपदा को यदि एक जीवित संस्कृति कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहां के जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, वे जीवन के संरक्षक हैं। इन्हीं वनों में छिंद का वृक्ष एक विशेष स्थान रखता है। फीनिक्स सिल्वेस्ट्रिस नाम से पहचाना जाने वाला यह वृक्ष स्थानीय बोली में छिंद या जंगली खजूर कहलाता है। यह बस्तर और समूचे दक्षिण छत्तीसगढ़ के परिदृश्य का स्वाभाविक अंग है। इसकी उपस्थिति केवल वनस्पति सूची में दर्ज एक नाम नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।

छिंद का वृक्ष देखने में साधारण प्रतीत हो सकता है, परंतु उसकी भूमिका असाधारण है। दस से सोलह मीटर तक ऊंचा उठता इसका खुरदुरा तना और पंखे जैसे फैले पत्ते दूर से ही पहचान बना लेते हैं। इसके फल रंग बदलते हुए परिपक्व होते हैं और पक्षियों व छोटे जीवों का भोजन बनते हैं। बस्तर के जंगलों में यह वृक्ष अक्सर नदी किनारों, खेतों की मेड़ों और झाड़ीदार इलाकों में उगता दिखाई देता है। यह सूखे को सहन करने वाला वृक्ष है, इसलिए कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। यही क्षमता इसे पारिस्थितिक तंत्र में स्थायित्व का स्तंभ बनाती है।

पारिस्थितिक दृष्टि से छिंद बहुस्तरीय योगदान देता है। इसकी जड़ें मिट्टी को पकड़कर रखती हैं, जिससे वर्षा के दौरान कटाव कम होता है। बस्तर जैसे क्षेत्र, जहां ढलानदार भूभाग और मौसमी वर्षा होती है, वहां यह वृक्ष मिट्टी संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नदी किनारों और जलस्रोतों के आसपास इसकी उपस्थिति भू स्थिरीकरण में सहायक होती है। जब मिट्टी सुरक्षित रहती है तो वनस्पति और जीव दोनों सुरक्षित रहते हैं। इस प्रकार छिंद एक अदृश्य प्रहरी की तरह पर्यावरण की रक्षा करता है।

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इस वृक्ष के फूल मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीटों को आकर्षित करते हैं। यह स्थानीय परागण चक्र को सक्रिय रखता है। इसके फल पक्षियों, चमगादड़ों और छोटे स्तनधारियों का भोजन हैं। ये जीव बीजों को दूर दूर तक फैलाते हैं, जिससे प्राकृतिक पुनर्जनन होता है। इस तरह छिंद केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि खाद्य श्रृंखला का सक्रिय घटक है। उसकी उपस्थिति जैव विविधता को जीवित और संतुलित रखती है।

बस्तर की संस्कृति में छिंद की भूमिका और भी गहरी है। यहां का जनजातीय जीवन प्रकृति के साथ सहजीवन की परंपरा पर आधारित है। गोंड, मुरिया, धुरवा, पारधी और बैगा जैसे समुदायों के लिए जंगल देवता के समान है। छिंद का वृक्ष उनके दैनिक जीवन, उत्सवों और मांगलिक कार्यों में शामिल है। विवाह के अवसर पर छिंद पत्तों से बनाया गया मौर केवल सजावट नहीं होता, वह पवित्रता और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। हल्दी रस्म में दूल्हा और दुल्हन के सिर पर छिंद पत्तों से बना मुकुट पहनाया जाता है। यह प्रकृति की कृपा और नए जीवन की शुरुआत का संकेत है।

मुरिया समाज में हल्दी के समय छिंद की कोमल पत्तियों से महूण तैयार किया जाता है। इसे पहनना मंगलकारी माना जाता है। पारधी समुदाय में मौर बनाने की कला पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। पत्तों को सुखाकर, हल्दी में रंगकर और सजाकर तैयार किया जाता है। यह प्रक्रिया केवल शिल्प नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। गैर जनजातीय ग्रामीण समाज भी इसी परंपरा का पालन करता है, जिससे सांस्कृतिक एकता का स्वरूप उभरता है।

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छिंद पत्तों का उपयोग जन्म संस्कारों में भी देखा जाता है। नवजात शिशु के लिए पत्तों से बने छोटे खिलौने शुभ माने जाते हैं। यह विश्वास है कि प्रकृति से जुड़ा जीवन सुरक्षित और समृद्ध होता है। कुछ क्षेत्रों में रक्षा बंधन जैसे पर्व पर भी छिंद पत्तों से राखी बनाई जाने लगी है। यह भाई बहन के संबंध को प्रकृति के संरक्षण से जोड़ने का प्रतीक है। इस प्रकार छिंद बस्तर की लोक संस्कृति का अटूट हिस्सा है।

इतिहास भी इसकी उपस्थिति की पुष्टि करता है। एर्राकोट के शिलालेख में छिंदक नागवंश का उल्लेख इस वृक्ष की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करता है। जब किसी राजवंश की पहचान एक वृक्ष से जुड़ती है तो यह केवल संयोग नहीं होता। वह वृक्ष उस भूभाग की पहचान और शक्ति का प्रतीक बन जाता है। बस्तर की धरती पर छिंद ने यही भूमिका निभाई है।

आज आर्थिक परिप्रेक्ष्य में भी छिंद की भूमिका नए रूप में उभर रही है। इसके रस से बनने वाला गुड़ ग्रामीणों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है। दंतेवाड़ा जिले में प्रशासन ने प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं ताकि रस निकासी वैज्ञानिक ढंग से हो और वृक्ष सुरक्षित रहें। पहले गहरे चीरे लगाने से वृक्ष जल्दी सूख जाते थे। अब नियंत्रित विधि अपनाकर लंबे समय तक उत्पादन संभव है। यह संरक्षण और आजीविका का संतुलित मॉडल है।

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छिंद गुड़ का स्वाद विशिष्ट है और उसके औषधीय गुण भी माने जाते हैं। स्थानीय बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है। यदि इसे संगठित ढंग से विपणन और ब्रांडिंग मिले तो यह बस्तर की पहचान बन सकता है। इससे ग्रामीणों को अतिरिक्त आय मिलेगी और पलायन में कमी आएगी। महत्वपूर्ण यह है कि इस प्रक्रिया में भारी निवेश की आवश्यकता नहीं है। परिवार आधारित श्रम से ही उत्पादन संभव है।

छिंद के माध्यम से एक व्यापक संदेश उभरता है। यह वृक्ष सिखाता है कि प्रकृति का संरक्षण और आर्थिक विकास विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। यदि स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टि से जोड़ा जाए तो संसाधन लंबे समय तक टिकाऊ बने रहते हैं। बस्तर में छिंद इसी संतुलन का प्रतीक है।

बस्तर की संस्कृति में जंगल केवल संसाधन नहीं, रिश्तेदार है। वहां पेड़ों को नाम दिया जाता है और उनसे संवाद किया जाता है। छिंद उसी संवाद का हिस्सा है। उसकी छाया में उत्सव मनाए जाते हैं। उसके पत्तों से मांगलिक प्रतीक बनते हैं। उसके रस से मिठास तैयार होती है। उसकी जड़ें मिट्टी को थामती हैं और उसकी शाखाएं पक्षियों को आश्रय देती हैं।

इस प्रकार छिंद का वृक्ष बस्तर के पारिस्थितिक तंत्र का केंद्रीय तत्व है और उसकी सांस्कृतिक आत्मा का भी हिस्सा है। वह धरती, जल, जीव और मानव के बीच एक जीवंत सेतु है। यदि इस वृक्ष को समझा और संवारा जाए तो यह आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की समृद्धि, स्थायित्व और सांस्कृतिक पहचान का सशक्त आधार बन सकता है।