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छत्तीसगढ़ का रंगमंचीय साहित्य अतीत से वर्तमान तक : रविवारीय विशेष

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

इसमें दो राय नहीं कि नाटक भी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है। यह रंगमंचीय साहित्य मानव हृदय की भावनाओं को प्रकट करने का एक प्रभावी माध्यम है। साहित्यकारों ने नाटक को दृश्य-काव्य माना है। आज के युग में रंगमंच के साथ ही हम सिनेमा को भी दृश्य काव्य मान सकते हैं। किसी भी विषय पर नाटक लिखना कोई साधारण बात नहीं है। कहानी के पात्रों की भावनाओं को महसूस कर उनके संवादों को लिखना और कहानी को विभिन्न पड़ावों से होते हुए समापन तक पहुँचाना एक कुशल नाट्य लेखक के ही वश की बात होती है। रंगमंचीय अथवा नाट्य साहित्य की दृष्टि से भी छत्तीसगढ़ का साहित्य संसार अत्यंत समृद्ध है। यहाँ के रंगमंचीय साहित्य की यात्रा अतीत से वर्तमान तक निरंतर जारी है।

कलिकाल : पहला छत्तीसगढ़ी नाटक


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और समाज सुधारक पंडित सुन्दरलाल शर्मा स्वयं एक अच्छे नाट्य लेखक थे। उनका जन्म 21 दिसम्बर 1881 को राजिम में हुआ था। उन्होंने अपनी युवावस्था में कई नाटकों की भी रचना की। उनके लिखे नाटकों में भक्त प्रह्लाद, पार्वती परिणय, सीता परिणय और विक्रम शशिकला शामिल हैं। साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक के अनुसार वर्ष 1905 में प्रकाशित पंडित लोचन प्रसाद पांडेय के ‘कलिकाल’ को छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक माना जा सकता है, जिसकी भाषा में ओड़िशा से लगे रायगढ़ बेल्ट में प्रचलित लरिया बोली की छाप मिलती है। पंडित लोचन प्रसाद पांडेय रायगढ़ के पास ग्राम बालपुर के निवासी थे, लेकिन जिला मुख्यालय रायगढ़ उनका कर्मक्षेत्र रहा।

लोक नाटकों की सुदीर्घ परम्परा


उत्तर में सरगुजा, दक्षिण में बस्तर और इधर मध्यवर्ती छत्तीसगढ़ में लोक नाटकों के मंचन की एक सुदीर्घ परम्परा है। यहाँ इन नाटकों के लिए रंगमंच खुले आसमान के नीचे सादगीपूर्ण लोक शैली में भी तैयार हो जाता है। लेकिन अब नये ज़माने के अनुरूप मंच व्यवस्था बिजली की जगमगाहट और आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ बेहतर होने लगी है। आधुनिक प्रेक्षागृह तो यहाँ ज्यादा नहीं हैं, लेकिन जो भी हैं, उनमें आधुनिकता का पुट लिए नाटक भी समय-समय पर मंचित होते रहते हैं। राज्य की सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं को देश और दुनिया के सामने प्रस्तुत करने में सरगुजा, बस्तर सहित सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के नाट्य साहित्य और रंगमंचीय कलाकारों ने भी सराहनीय योगदान दिया है।

सीताबेंगिरा और जोगीमाड़ा


सरगुजा अंचल में उदयपुर के पास रामगढ़ की पहाड़ियों में मौर्यकालीन भित्तिचित्रों और ब्राम्ही लिपि के शिलालेखों के साथ सीताबेंगिरा और जोगीमाड़ा नामक दो गुफाएँ हैं। इनमें से सीधी दीवारों तथा गोलाकार प्रवेश द्वार वाली सीताबेंगिरा की गुफा को कुछ विद्वानों ने देश की, कुछ ने एशिया की और कुछ विद्वानों ने दुनिया की प्राचीनतम नाट्यशाला के रूप में चिन्हांकित किया है। लेकिन नाट्यशाला थी भी या नहीं, इसे लेकर कोई सर्वमान्य मत नहीं है।

अम्बिकापुर निवासी वरिष्ठ लेखक और फिल्मकार श्रीश मिश्रा नहीं मानते कि इस प्राचीन गुफा में कोई नाट्यशाला थी। उन्होंने पैंतीस वर्षों के गहन अध्ययन के बाद वर्ष 2024 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘सन्दर्भ रामगढ़’ में कुछ तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। श्रीश मिश्रा ने अपनी इस पुस्तक के पृष्ठ 88 में लिखा है— “मात्र नाट्यशाला कह देना पर्याप्त नहीं हो सकता। मैंने नाट्यशास्त्र का अध्ययन किया और पाया कि नाट्यशास्त्र में वर्णित एक भी गुण सीताबेंगिरा में नहीं मिलते। मेरी दृष्टि में यह गुफा नाट्यशाला नहीं हो सकती।” उन्होंने अपने इस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए कुछ विद्वानों के प्रमुख तथ्यों का भी उल्लेख किया है।

इनमें से एक तथ्य उनके अनुसार यह भी है कि सरगुजा रियासत के तत्कालीन पारसी दीवान डी. डी. डाडी मास्टर की वर्ष 1921 में प्रकाशित ‘हिस्ट्री ऑफ सरगुजा स्टेट’ पुस्तक में भी कहीं भी सीताबेंगिरा को नाट्यशाला नहीं कहा गया है। इसका उल्लेख गुफा के रूप में ही किया गया है। श्रीश जी लिखते हैं कि नाट्यशास्त्र में प्रवेश और निर्गम द्वार की अवधारणा है। इस गुफा में निर्गम द्वार तो है ही नहीं। इसके केन्द्रीय कक्ष में इतना स्थान ही नहीं है कि चार-छह लोग खड़े होकर मंचन कर सकें। केन्द्रीय कक्ष की ऊँचाई छह फीट और अगल-बगल के कक्षों की ऊँचाई 5 से 5.5 फीट है। इस ऊँचाई में लम्बा व्यक्ति ठीक से खड़ा ही नहीं हो सकता, तो मंचन क्या करेगा? दर्शकों के बैठने का स्थान कहीं नहीं दिखता। एक और महत्वपूर्ण तथ्य श्रीश जी ने दिया है। उनके अनुसार सीताबेंगिरा में उत्कीर्ण ब्राम्ही लिपि भी नाट्यशाला होना प्रमाणित नहीं करती।

गुफा के बाहर होता रहा होगा नाट्य मंचन


इन ऐतिहासिक गुफाओं का उल्लेख सुप्रसिद्ध लेखक और ब्लॉगर, ललित शर्मा ( आचार्य ललित मुनि) की वर्ष 2012 में प्रकाशित पुस्तक ‘सरगुजा का रामगढ़’ में भी है। ललित जी ने चर्चा के दौरान मुझसे कहा कि सीता बेंगिरा गुफा के भीतर भले ही नाट्य मंचन संभव नहीं था, लेकिन उसके सामने खुली जगह पर तो मंचन किया जाता रहा होगा। उनका अनुमान है कि गुफा का उपयोग कलाकारों के मेकअप रूम के रूप में होता था।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार जोगीमाड़ा के शिलालेख में देवदासी सुतनुका और रूपदक्ष (मेकअप मेन) देवीदीन के प्रेम संबंधों का उल्लेख है। लेकिन अपनी पुस्तक ‘सन्दर्भ रामगढ़’ में लेखक श्रीश मिश्रा इसे नहीं मानते। उन्होंने पुस्तक के पृष्ठ 113 से 115 में इसका विश्लेषण किया है। जोगीमाड़ा गुफा की बायीं दीवार के निचले हिस्से में उत्कीर्ण ब्राम्ही लिपि की पाँच पंक्तियों के शिलालेख का अध्ययन करने के बाद उनका कहना है कि इसमें ‘सुतनुका’ नहीं, बल्कि ‘शुतनुक’ शब्द अंकित है। लेखक के अनुसार ‘सुतनुका’ शब्द स्त्रीलिंग है, जबकि ‘शुतनुक’ पुल्लिंग।

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पुरातत्वविदों के अनुसार दोनों गुफाएँ ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी शताब्दी की हैं।

महाकवि कालिदास के ‘मेघदूतम्’ की रचना भूमि


यह भी मान्यता है कि महाकवि कालिदास ने इसी पर्वत पर अपने कालजयी संस्कृत महाकाव्य ‘मेघदूतम्’ की रचना की थी। इसे ‘सन्दर्भ रामगढ़’ के लेखक श्रीश मिश्र भी स्वीकारते हैं। राज्य शासन द्वारा हर साल आषाढ़ महीने के प्रथम दिवस पर मेघदूतम् और उसके रचनाकार की याद में वहाँ रामगढ़ महोत्सव का आयोजन किया जाता है। डॉ. लालचंद ज्योति की पुस्तक ‘परिचय के दर्पण में सम्पूर्ण सरगुजा’ के अनुसार रामगढ़ की इन गुफाओं को प्रकाश में लाने का श्रेय विदेशी विद्वान कर्नल अउसले (वर्ष 1848) और डॉ. ब्लॉश (वर्ष 1904) को है।

नाचा और गम्मत की अपनी रंगत


छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास की पृष्ठभूमि में यहाँ का सहज-सरल ग्रामीण जन-जीवन गहराई से रचा-बसा है। प्रदेश की ग्राम्य-संस्कृति में लोक नाटकों का प्रारंभ से ही बड़ा महत्व रहा है, जिनके ज़्यादातर लेखक गुमनाम रहते आए हैं। ज़्यादा नहीं, सिर्फ एक शताब्दी के रंगमंचीय इतिहास को देखें तो पता चलता है कि छत्तीसगढ़ में नाट्य लेखन और मंचन का सिलसिला अनवरत चल रहा है। मध्यवर्ती छत्तीसगढ़ में एक ज़माने में खड़े साज का नाचा भी काफी लोकप्रिय हुआ करता था, जो आज लगभग विलुप्तप्राय है। उन दिनों बिजली नहीं होती थी, इसलिए खड़े साज के नाचा का मंचन मशाल की रोशनी में होता था। लोग इसे ‘मसलहा नाचा’ भी कहते थे। मशाल से मसलहा। इसमें पारम्परिक वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल होता था।

नाचा छत्तीसगढ़ी लोक नाटकों के मंच की एक लोकप्रिय विधा है। इसमें गीत-संगीत के साथ नृत्य का प्रदर्शन नर्तकी के वेश में पुरुषों द्वारा किया जाता है। यह नर्तकी ‘परी’ कहलाती है। नाचा के साथ ‘गम्मत’ का होना भी अनिवार्य होता है। नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि ‘गम्मत’ से आशय गम अथवा दुःख नहीं करने से है। इसलिए गम्मतों में हास्य का पुट अधिक होता है, लेकिन इसमें किसी एक विषय को लेकर नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं। ये विषय दहेज, बाल-विवाह, छुआछूत आदि कई गंभीर सामाजिक समस्याओं पर भी केन्द्रित होते हैं। इनमें परम्परागत रूप से स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष ही निभाते हैं। शिक्षा के प्रसार से अब तो रंगमंचों में महिलाएँ भी उत्साह के साथ आगे आ रही हैं और अपनी प्रतिभा का अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। आधुनिक युग की चकाचौंध में नाचा और गम्मत का प्रचलन वर्तमान में भले ही कम हो गया हो, लेकिन नये ज़माने के ध्वनि विस्तारक उपकरणों, नये-नये वाद्य यंत्रों, बिजली की बेहतरीन रोशनियों और मनमोहक मंच सज्जा के साथ उनकी अनोखी रंगत आज देखते ही बनती है।

छत्तीसगढ़ी नाचा के पितामह : दाऊ दुलार सिंह मंदराजी


छत्तीसगढ़ी भाषा में मध्यवर्ती छत्तीसगढ़ की इस नाट्य परम्परा को दाऊ दुलार सिंह मंदराजी ने आगे खूब संवारा और तत्कालीन समय के नये परिवेश के अनुरूप विकसित किया। उन्हें छत्तीसगढ़ी ‘नाचा’ का पितामह भी माना जाता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इस प्रदर्शनकारी लोक कला के विकास में दाऊ दुलार सिंह मंदराजी के महत्वपूर्ण योगदान को ध्यान में रखकर उनके नाम पर एक विशेष सम्मान की भी स्थापना की है, जो हर साल राज्य स्थापना दिवस (राज्योत्सव) के मौके पर एक चयनित व्यक्ति को दिया जाता है। दाऊ मंदराजी का जन्म 1 अप्रैल 1910 को हुआ था। राजनांदगांव के नज़दीक ग्राम रवेली उनका जन्म स्थान है। दाऊ जी का निधन 1984 में हुआ। उन्होंने आज से करीब 94 साल पहले वर्ष 1927 के आस-पास ग्रामीण कलाकारों को संगठित कर एक ‘नाचा पार्टी’ का गठन किया। देखते ही देखते यह नाचा मंडली रवेली के नाचा के नाम से प्रसिद्ध हो गई। जगह-जगह उनकी नाचा मंडली को मंचन के लिए आमंत्रण मिलने लगा।

चंदैनी गोंदा विभिन्न भाषा-भाषियों का संगम


जब दाऊ जी से यह पूछा गया कि आपने संस्था के लिए विभिन्न भाषा-भाषी कलाकार चुने हैं, साथ ही कार्यक्रम प्रारंभ होने के पहले आपने विभिन्न प्रान्तों के लोकगीत प्रस्तुत किए हैं, ऐसा क्यों? इस पर उनका कहना था— “भावनात्मक एकता भी हमारे उद्देश्यों में से एक है। इसलिए चंदैनी गोंदा विभिन्न भाषा-भाषियों का संगम है। लोकगीत भारत के जिस अंचल के हों, उनमें जो लोकतत्व हैं, उन्हें किसी भी भारतीय लोकगीत में देखा जा सकता है।” एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था कि चंदैनी गोंदा दर्शकों को विशुद्ध ग्राम-बोध प्रदान करता है। ग्राम बोध इसलिए भी, क्योंकि इसमें आज के एक भारतीय गाँव के खेतिहर जीवन की व्यथा-कथा है।

दाऊ रामचन्द्र देशमुख का यह साक्षात्कार ‘चंदैनी गोंदा’ की 1976 में प्रकाशित स्मारिका में भी शामिल है।

छत्तीसगढ़ी नाचा का क्रमिक विकास


इसी स्मारिका में ‘छत्तीसगढ़ी नाचा का क्रमिक विकास—गंगोत्री से त्रिवेणी तक’ शीर्षक से प्रकाशित अपने एक आलेख में दाऊ रामचन्द्र देशमुख ने ‘नाचा’ के इतिहास और उसकी विकास यात्रा को सुरुचिपूर्ण शैली में काफी विस्तार से प्रस्तुत किया है। उनके इस आलेख से पता चलता है कि वह न सिर्फ एक कला पारखी थे, बल्कि उनके हृदय में एक संवेदनशील और सहृदय साहित्यकार भी था, जिसका दिल एक दिन कुछ भाजी मांगने आयी डरी-सहमी, बीमार, भूखी और दीवारों में दुबकी चाँद बी नामक बालिका को देखकर दहल उठा और जिसे लगा जैसे यही छत्तीसगढ़ हो—दीन, दुर्बल, बीमार और सहमा हुआ। दाऊ रामचन्द्र देशमुख के शब्दों में— “लगा कि इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए, इसके लिए कुछ करना ही है, कुछ न करना कायरता होगी।” दाऊ जी फिर उसी आवेग में कलाकारों और छत्तीसगढ़ी गीतकारों की खोज के लिए एक कठिन यात्रा में निकल पड़े। उन्हीं के शब्दों में— “विद्वानों से विचार-विनिमय, सुन्दर और साहित्यिक गीतों का संकलन, प्रचलित लोकगीतों और लोकधुनों के टेप पर टेप होते चले जाते संग्रह। उनमें सुमधुर गीतों और धुनों का चयन, साहित्यिक गीतों का समावेश। गायक, वादक, नर्तक कलाकारों की खोज में इधर-उधर भटकने की फिर वही नियति। लेकिन श्रम व्यर्थ नहीं गया।”

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मनुष्यों का महासागर और मंत्रमुग्ध दर्शक


चंदैनी गोंदा के प्रथम मंचन के साक्षी बने धमतरी के वरिष्ठ साहित्यकार नारायण लाल परमार और त्रिभुवन पाण्डेय ने संयुक्त आलेख में लिखा है— “मनुष्यों का महासागर, सघन अमराई, रोशनी से झिलमिलाता चंदैनी गोंदा का मंच। पीछे चाँद और सितारों से जड़ा आसमान। मंत्रमुग्ध दर्शक। रात दस बजे से सुबह सात बजे तक अपलक निहारती आँखें। गये तो अलग-अलग पचास हजार लोग थे, लेकिन लौटते समय सब एक कैसे हो गये? एक सुबह इतनी सार्थक और नई कैसे हो गयी? बघेरा में 7 नवम्बर 1971 को जिस अभिनव सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत हुई, वह धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ अंचल के लोकजीवन की प्रामाणिक कथा बन गयी। महानदी की तरह विराट इस सांस्कृतिक जलधारा का स्पर्श छत्तीसगढ़ को उस समय मिला, जब उसके होंठों पर तृषा की विकराल छाया थी और उसके आत्मगौरव की जमीन पर दरारें पड़ चुकी थीं। इस पूरे दृश्य के पीछे एक चाँद बी है—छत्तीसगढ़ की चाँद बी, महाराष्ट्र और उड़ीसा की चाँद बी, गुजरात और बंगाल की चाँद बी, भारतवर्ष की चाँद बी। माँ की गोद और पिता के स्नेह से वंचित चाँद बी, रोग और भूख से जर्जर चाँद बी। एक दिन इसी चाँद बी की आहत पुकार ‘चंदैनी गोंदा’ के सर्जक के भीतर उतरती चली गयी थी। कितने आहत आर्तनाद और विवश आवाज़ों के बीच ‘चंदैनी गोंदा’ का जन्म हुआ, यह स्वयं में एक महाकाव्य का विषय है। चाँद बी आज निराधार नहीं है। उसकी पीड़ा इस अंचल की सबसे जीवंत घटना बन चुकी है और हजारों चाँद बी का दर्द लाखों लोगों के भीतर एक नई बेचैनी के रूप में ढल चुका है। छत्तीसगढ़ और चंदैनी गोंदा दो अलग-अलग सम्बोधनों की सीमा लांघकर एक-दूसरे में आत्मसात हो गए।”

चंदैनी गोंदा में छत्तीसगढ़ी गीतकार


दाऊ रामचन्द्र देशमुख ने ‘चंदैनी गोंदा’ में छत्तीसगढ़ के अनेक लोकप्रिय कवियों की रचनाओं को शामिल किया। इस नाट्य मंच के गीतकार रहे— भिलाई नगर के रविशंकर शुक्ल, दुर्ग के कोदूराम दलित, राजनांदगांव के रामरतन सारथी, रायपुर के प्यारेलाल गुप्त, बिलासपुर के द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, धमतरी के नारायण लाल परमार और भगवती सेन, रायपुर के हेमनाथ यदु, राजिम के पवन दीवान, दुर्ग के मुकुंद कौशल, चतुर्भुज देवांगन ‘देव’ और रामकैलाश तिवारी, बिलासपुर के विनय कुमार पाठक और केदार दुबे, तथा खरसिया के रामेश्वर वैष्णव। इन सबके अलावा लक्ष्मण मस्तुरिया के दस गीत भी ‘चंदैनी गोंदा’ में शामिल हैं। स्वर्गीय खुमान साव चंदैनी गोंदा के संगीत निर्देशक थे। भैयालाल हेड़ाऊ, केदार यादव, साधना यादव और लक्ष्मण मस्तुरिया सहित कई गायक-गायिकाओं ने अपनी मधुर आवाज़ से इन गीतों को सजाया। चंदैनी गोंदा के मंचीय प्रदर्शनों में इन कवियों के गीत काफी लोकप्रिय हुए।

सोनहा बिहान और लोकरंग


दुर्ग के ही दाऊ महासिंह चन्द्राकर ने ‘सोनहा बिहान’ नामक संस्था बनाई। इस संस्था ने भी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को प्रसिद्धि की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा इस संस्था के कुशल मंच संचालक और उद्घोषक थे। ग्राम अर्जुन्दा (जिला-दुर्ग) के दीपक चंद्राकर की संस्था ‘लोकरंग’ की भी अपनी शानदार रंगत है। इन सांस्कृतिक संस्थाओं ने छत्तीसगढ़ी गीतों और नाटकों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को जनता के बीच बड़ी गहराई से रेखांकित किया। बाद के वर्षों में और भी कई प्रतिभावान लोगों ने कवियों, कहानीकारों और कलाकारों को संगठित कर कई रंगमंचीय संस्थाओं का गठन किया। निश्चित रूप से इन संस्थाओं ने अपनी नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से आंचलिक लोक साहित्य और लोक-कलाकारों को प्रोत्साहित करते हुए आगे लाने का सराहनीय कार्य किया।

पंडवानी : महाभारत का छत्तीसगढ़ी नाट्य रूपांतर


छत्तीसगढ़ के पारम्परिक लोक साहित्य और यहाँ की लोक संस्कृति में पंडवानी गायन का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। पंडवानी से आशय पांडवों की कथा से है, जिसमें महाभारत के अनेक प्रसंग स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं। रागी और साजिंदों के अलावा सिर्फ एक ही कलाकार द्वारा भाव-भंगिमा के साथ छत्तीसगढ़ी में पंडवानी गाकर महाभारत की कथा सुनाई जाती है। मेरे विचार से अगर हम इसे वेदव्यास के संस्कृत महाकाव्य ‘महाभारत’ का एकल अभिनय पर आधारित छत्तीसगढ़ी नाट्य रूपांतर कहें, तो शायद गलत नहीं होगा।

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पंडवानी की दो शैलियाँ प्रचलित हैं— (1) कापालिक और (2) वेदमती। कापालिक शैली में मंचीय हाव-भाव के साथ खड़े होकर गायन होता है, जबकि वेदमती शैली में वीरासन पर बैठकर प्रस्तुति दी जाती है। पंडवानी की कापालिक शैली में पहले पुरुषों द्वारा गायन होता था।

पदम् पुरस्कारों से सम्मानित तीजन बाई


तीजनबाई पहली महिला हैं, जिन्होंने करीब पाँच दशक पहले कापालिक शैली के पंडवानी गायन में आकर सबको चौंका दिया। तब वे महज 13 साल की थीं। देश और दुनिया में छत्तीसगढ़ के पंडवानी की पहचान बनाने में तीजनबाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दुर्ग जिले के ग्राम गनियारी निवासी तीजनबाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को हुआ था। वह छत्तीसगढ़ सहित देश-विदेश में पंडवानी की प्रस्तुति दे चुकी हैं। उन्हें पंडवानी गायन के माध्यम से कला और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से, वर्ष 1988 में पद्मश्री, वर्ष 2003 में पद्मभूषण और वर्ष 2019 में पद्मविभूषण अलंकरण से सम्मानित किया जा चुका है।

शिखर सम्मान से नवाजे गए झाडूराम देवांगन


वेदमती शैली के सुप्रसिद्ध पंडवानी गायक झाडूराम देवांगन, पूनाराम निषाद और रेवाराम साहू ने भी देश-विदेश में अपनी प्रस्तुतियाँ देकर राज्य का नाम रोशन किया है। पंडवानी गुरु झाडूराम देवांगन का जन्म दुर्ग जिले के भिलाई नगर के पास ग्राम बासीन में वर्ष 1927 में हुआ था। तत्कालीन संयुक्त मध्यप्रदेश की सरकार ने प्रदर्शनकारी कलाओं की श्रेणी में वर्ष 1983-84 में उन्हें शिखर सम्मान से नवाजा था। लगभग 19 वर्ष पहले उनका निधन हुआ।

पंडवानी के पुरोधा नारायण प्रसाद वर्मा


बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के ग्राम झीपन निवासी नारायण प्रसाद वर्मा को भी पंडवानी का पुरोधा माना जाता है। सुशील भोले के अनुसार नारायण प्रसाद वर्मा के जन्म और निधन की प्रामाणिक तिथियाँ वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि वर्ष 1971 में जब उनका देहावसान हुआ, उस वक्त वह लगभग 80 वर्ष के थे।

पद्मश्री और तुलसी सम्मान प्राप्त पूना राम निषाद


पंडवानी के प्रसिद्ध कलाकार पूनाराम निषाद का जन्म 16 नवम्बर 1939 को दुर्ग जिले में हुआ था। उनका निधन 11 फरवरी 2017 को अम्बेडकर अस्पताल रायपुर में हुआ। उन्हें वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया गया था। इसके पहले उन्हें तत्कालीन संयुक्त मध्यप्रदेश में राज्य शासन द्वारा वर्ष 1990-91 में तुलसी सम्मान से विभूषित किया गया। उन्होंने मात्र 12 साल की उम्र में पंडवानी गायन शुरू कर दिया था। उन्हें पंडवानी का पितामह माना जाता है। पंडवानी को और भी अधिक लोकप्रिय बनाने में तीजनबाई सहित इन सभी कलाकारों की ऐतिहासिक भूमिका है। पंडवानी गायन की इन दोनों शैलियों में नयी पीढ़ी के कई प्रतिभावान महिला और पुरुष कलाकार समय-समय पर विभिन्न आयोजनों में अपनी बेहतरीन प्रस्तुतियाँ दे रहे हैं।

हबीब तनवीर से छत्तीसगढ़ी रंगमंच को मिली अंतर्राष्ट्रीय पहचान


छत्तीसगढ़ी रंगमंच को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और प्रतिष्ठा दिलाने में हबीब तनवीर का योगदान भी अविस्मरणीय है। वह अभिनेता, कवि और नाट्य निर्देशक होने के साथ-साथ एक मँजे हुए पटकथा लेखक और अभिनेता भी थे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 1 सितम्बर 1923 को जन्मे हबीब तनवीर का निधन 8 जून 2009 को भोपाल में हुआ। अपनी जीवन यात्रा के लगभग पाँच दशक उन्होंने हिन्दी और छत्तीसगढ़ी रंगमंच को दिए। शानदार रंगमंचीय उपलब्धियों के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री तथा पद्मभूषण अलंकरणों से भी सम्मानित किया गया था। उन्होंने वर्ष 1959 में दिल्ली में अपनी नाट्य संस्था ‘नया थियेटर’ की स्थापना की थी। वह कई दशकों तक अपनी इस संस्था के माध्यम से देश-विदेश में हिन्दी और छत्तीसगढ़ी नाटकों का मंचन करते रहे। उनकी प्रमुख छत्तीसगढ़ी नाट्य प्रस्तुतियों में ‘चरणदास चोर’ और ‘मोर नांव दमाद-गाँव के नांव ससुरार’ भी उल्लेखनीय हैं। हबीब साहब ने ‘नया थियेटर’ में छत्तीसगढ़ के अनेक लोक-कलाकारों को शामिल कर उनकी प्रतिभा को निखारा। उन्होंने महात्मा गाँधी के जीवन पर अस्सी के दशक में आयी रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गाँधी’ में भी अभिनय किया। उनके द्वारा निर्देशित छत्तीसगढ़ी नाटक ‘चरणदास चोर’ पर फिल्म भी बन चुकी है। हबीब तनवीर ने स्वतंत्रता संग्राम के शहीद मंगल पांडे के जीवन पर वर्ष 2005 में बनी फिल्म में भी एक किरदार निभाया। वह वर्ष 1972 से 1978 तक राज्यसभा के भी सदस्य रह चुके थे।

छत्तीसगढ़ी भाषा के वरिष्ठ नाट्य लेखकों में डॉ. खूबचन्द बघेल, लोचन प्रसाद पांडेय, शुकलाल प्रसाद पांडेय, टिकेन्द्र टिकरिहा, मुरलीधर पांडेय, कपिलनाथ कश्यप, लखनलाल गुप्त, परदेशीराम वर्मा, मेहतर राम साहू, प्यारेलाल गुप्त, नारायण लाल परमार, हरि ठाकुर, नंदकिशोर तिवारी, श्यामलाल चतुर्वेदी, भावसिंह हिरवानी, विश्वेन्द्र ठाकुर, किसान दीवान, सुशील यदु और सुरेन्द्र दुबे सहित कई वरिष्ठ और विशिष्ट नाम शामिल हैं। इनके लिखे नाटकों की अलग से विस्तृत चर्चा हो सकती है।

— स्वराज्य करुण