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सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी जतिन्द्र नाथ मुखर्जी का बलिदान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक बाघा जतिन, जिनका असली नाम जतिनेंद्र नाथ मुखर्जी था, ने अपने साहस और बलिदान से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। 7 दिसंबर 1879 को वर्तमान बांग्लादेश के जैसोर क्षेत्र में जन्मे जतिन ने अपनी वीरता का पहला परिचय किशोरावस्था में ही दिया जब उन्होंने एक बाघ से अकेले लड़ाई की, जिसके बाद लोग उन्हें ‘बाघा जतिन’ के नाम से जानने लगे

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फाँसी के फंदे को चूमने वाला 20 वर्षीय नायक : 30 अगस्त विशेष

-डॉ. आनंद सिंह राणा आधुनिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बरतानिया सरकार के लिए महा महारथी महान् क्रांतिकारी योद्धा श्रीयुत

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अंग्रेजियत के विरुद्ध संघर्ष और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण: माधवहरि अणे

अणे पर लोकमान्य तिलक जी का प्रभाव उनके समाचारपत्र ‘मराठा’ और ‘केसरी’  के कारण पड़ा।  वे इन पत्रों के नियमित पाठक थे। 1914 में जब तिलक जी जेल से छूटकर आये तो अणे जी उनसे मिलने वालों में शामिल थे। इसी भेंट के बाद उनके तिलक जी से संबंध बने और वे तिलक जी के निकट आ गये।

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राष्ट्रीय एवं वैश्विक चुनौतियों का समाधान : कृष्ण और गीता

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए- ‘ धर्मो रक्षति रक्षितः। ‘ हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा। धर्म के अन्तर्गत व्यक्ति का शरीर, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व, चराचर जगत् और विश्व चेतना का समावेश है। हम शरीर धर्म की पालना करेंगे तो शरीर हमारी रक्षा करेगा। परिवार धर्म के पालन से परिवार हमारी रक्षा करेगा।

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एक विस्मृत क्रांतिकारी की कहानी

जीवन यापन के लिये भिक्षावृत्ति तक करनी पड़ी। स्वतंत्रता के बाद किसी ने उनकी खबर नहीं ली। उन्होंने अपना पूरा जीवन स्वाधीनता संघर्ष को अर्पण कर दिया था। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष में भी भाग लिया और अहिंसक आंदोलन में भी। किन्तु स्वतंत्रता के बाद उनके सामने अपने जीवन  जीने के लिये ही नहीं रोटी तक का संकट आ गया था। पेट भरने के लिये भिक्षावृत्ति भी की और अंत में  सड़क के किनारे लावारिश अवस्था में अपने प्राण त्यागे।

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धर्मांतरण विरोधी आंदोलन के नायक स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की कहानी

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने वनवासी क्षेत्रों में सक्रिय ईसाई मिशनरियों और माओवादी तत्वों के खिलाफ कार्य किया, जिससे उनके ऊपर कई बार हमले हुए। 23 अगस्त 2008 को, स्वामी जी और उनके चार शिष्यों की निर्मम हत्या कर दी गई, जिसे ईसाई मिशनरियों और माओवादियों का षड्यंत्र माना गया। स्वामी जी ने लगभग चालीस वर्षों तक वनवासियों के मतान्तरण और माओवादी गतिविधियों के विरुद्ध संघर्ष किया, जिसके कारण उन्हें कई बार धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ा।

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