हमारे नायक

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क्राँतिकारी कन्हाई लाल दत्त ने गद्दार को जेल में गोली मारी

विश्वासघाती को सबक सिखाने वाले सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी कन्हाई लाल दत्त का जन्म 30 अगस्त 1888 को बंगाल के चंदननगर में हुआ था। उनका नाम सर्वतोष रखा गया। किन्तु उनका जन्म भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात को हुआ था इससे वे कन्हाई नाम कन्हाई से प्रसिद्ध हुये।

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औरंगजेब के आदेश पर जिनकी क्रूर हत्या की गई

तब 9 नवम्बर 1675 को सबसे पहले भाई मतीदास को लकड़ी के पटियों में बाँधा गया। फिर जल्लादों ने सिर पर आरा रखा और धीरे धीरे चीरना आरंभ किया। उनके शरीर को कमर तक चीरकर दो भागों में बांट दिया गया। भयभीत करने के लिये यह दृश्य सभी बंदियों को दिखाया गया। फिर भी कोई न डिगा।

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भारत का नेपोलियन महान योद्धा हेमचंद्र विक्रमादित्य

मध्यकालीन युद्धों के इतिहास में एक यौद्धा ऐसा भी  हुआ जिसने मुगलों और पठानों दोनों को पराजित करके दिल्ली से बाहर कर दिया और अपना शासन स्थापित कर लिया था। उसके शौर्य और शक्ति से पराजित होकर शेरशाह सूरी के वंशजों को दिल्ली से भागना पड़ा था और मुगल शासक हुमायूँ ने गुमनामी में भटकते हुये अपने प्राण त्याग दिये थे। इतिहास में यह महान यौद्धा हेमचंद्र भार्गव था।

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भारत की स्वतंत्रता में भाई परमानंद का योगदान और बलिदान

1902  में भाई परमानन्द ने पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की और लाहौर के दयानन्द एंग्लो महाविद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गये। भारत की प्राचीन संस्कृति तथा वैदिक धर्म में आपकी रुचि देखकर महात्मा हंसराज ने आपको भारतीय संस्कृति का प्रचार करने के लिए अक्टूबर 1905 में अफ्रीका भेजा। डर्बन में भाईजी की गांधीजी से भेंट हुई।

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चिंतक विचारक और 1857 की क्रांति अग्रदूत महान साधक महर्षि दयानंद सरस्वती : पुण्यतिथि विशेष

स्वामी दयानन्द सरस्वती को बहुत विरोध का सामना करना पड़ा। यह विरोध दोनों तरफ से था एक ओर धर्मान्तरित हिन्दुओः की घर वापसी केलिये और दूसरी ओर आडंबर मुक्ति अभियान के लिये भी। और इसी कुचक्र के अंतर्गत उन्होंने देह त्यागी। एक वेश्या के कुचक्र से हुआ। कहते हैं षड्यंत्र कारियों ने स्वामी जी के रसोइये को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया और दूध में विष मिलाकर स्वामी जी को पिला दिया।

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ऐसी ब्रिटिश नागरिक जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति समर्पित रहीं

यदि कहीं कोई भारतीय बड़े पद पर है और अंग्रेज छोटे पद पर तब भारतीय को क्यों खड़े होना चाहिए और क्यों सामान्य अंग्रेज को पानी पिलाना चाहिए। आरंभ में उन्होंने स्थानीय अधिकारियों से चर्चा करके मानवीय व्यवहार समझाना चाहा, पर बात नहीं बनी और वे भी नौकरी छोड़कर समाज के जागरण में जुट गयीं।

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