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वैदिक काल से राष्ट्रीय जनचेतना तक की यात्रा : गणेशोत्सव विशेष

आदिकाल से गणेश की स्तुति के अलग अलग प्रमाण मिले हैं। इनकी कथा भिन्न-भिन्न है। सतयुग में सिंहासन आरूढ़ विनायक के स्वरूप में पूजा गया जिनकी दस भुजा थी परन्तु मुख तो हाथी का ही था। त्रेतायुग में गणेश मयूरारूढ़, मयूरेश्वर के नाम से विख्यात थे जिनकी छह भुजा थी। द्वापर में इनका वाहन भूषकराज था तब इनकी चार भुजाएं थी। कलि के अंत में ये धुम्रकेत के नाम से अश्व में सवार होंगे इनका वर्ण भी धुम्र होगा।

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आस्था और प्रेम का प्रतीक तीजा तिहार

लोक परंपरा के अनुसार, तीजा के अवसर पर बेटियों को साड़ी उपहार में दी जाती है। छत्तीसगढ़ में एक कहावत भी प्रचलित है: “मइके के फरिया अमोल”—यानि मायके से मिले कपड़े का टुकड़ा भी अनमोल होता है। इस दिन माताएँ अपनी बेटियों के लिए चूड़ियाँ, फीते और सिन्दूर भी लाती हैं। तीजा की इस अनोखी परंपरा को निभाने का महत्व छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में गहराई से बसा हुआ है।

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भारतीय कृषि और जैव विविधता संरक्षण का अनूठा संगम : पोला पर्व

पोला पर्व मुख्य रूप से भारत के छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, और तेलंगाना राज्यों में मनाया जाता है। यह पर्व

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गोगा नवमी और जैव विविधता संरक्षण

गोगा जी को सांपों के देवता के रूप में पूजा जाता है, जो सांपों की सुरक्षा और सांपों के प्रति आदरभाव का संदेश देता है। सांप कृषि और पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि वे चूहों और अन्य छोटे जानवरों की आबादी को नियंत्रित रखते हैं। गोगा नवमी के अवसर पर, सांपों की पूजा से उनके महत्व को समझने और उन्हें न मारने की शिक्षा दी जा सकती है, जिससे सांपों की प्रजातियों का संरक्षण होता है।

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कृष्ण का वैश्विक प्रभाव और उनके दर्शन का महत्व

गीता का प्रभाव वैश्विक स्तर पर है और इसे विभिन्न भाषाओं में अनुवादित किया गया है। महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, एल्डस हक्सले, और हेनरी डेविड थोरो जैसे महान व्यक्तियों ने गीता से प्रेरणा ली है। गीता ने जीवन के संघर्षों से जूझने के लिए एक मार्गदर्शन प्रदान किया है और इसे दुनिया भर में एक गहरे आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथ के रूप में सम्मानित किया जाता है।

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छत्तीसगढ़ में आठे कन्हैया और जन्माष्टमी उत्सव

रायगढ़ के राजा भूपदेवसिंह के शासनकाल में नगर दरोगा ठाकुर रामचरण सिंह जात्रा से प्रभावित रास के निष्णात कलाकार थे। उन्होंने इस क्षेत्र में रामलीला और रासलीला के विकास के लिए अविस्मरणीय प्रयास किया। गौद, मल्दा, नरियरा और अकलतरा रासलीला के लिए और शिवरीनारायण, किकिरदा, रतनपुर, सारंगढ़ और कवर्धा रामलीला के लिए प्रसिद्ध थे। नरियरा के रासलीला को इतनी प्रसिद्धि मिली कि उसे ‘छत्तीसगढ़ का वृंदावन‘ कहा जाने लगा।

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