लोक-संस्कृति

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वेदों और पुराणों में प्रकृति संरक्षण की अवधारणा : जैव विविधता दिवस विशेष

वेदों और पुराणों में निहित प्रकृति संरक्षण की अवधारणा आज के पर्यावरण संकट के समाधान का मार्ग दिखाती है। जानिए कैसे भारतीय परंपरा में जैव विविधता, संतुलन और सतत विकास का गहरा संबंध है।

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रमतूला की गूंज में बसती है बुंदेलखंड की सांस्कृतिक आत्मा

रमतूला बुंदेलखंड का पारंपरिक लोक वाद्य है, जो शौर्य, आस्था, विवाह परंपराओं और लोक संस्कृति की पहचान माना जाता है। जानिए इसके इतिहास, संरचना और सांस्कृतिक महत्व की विस्तृत कहानी।

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“विजय का पर्व”- भोजशाला सत्य–प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक क्षण

यह लेख भोजशाला–कमाल मौला परिसर से जुड़े पुरातात्विक, स्थापत्य और ऐतिहासिक साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए इसे राजा भोज कालीन सरस्वती मंदिर एवं विद्या-पीठ के रूप में प्रस्तुत करता है। “विजय का पर्व” इतिहास, प्रमाण और सांस्कृतिक स्मृति की पुनर्पुष्टि का भावपूर्ण आलेख है।

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आद्य पत्रकारिता के जनक और लोक संचार के प्रथम आचार्य देवर्षि नारद

देवर्षि नारद को भारतीय परंपरा में केवल एक ऋषि नहीं, बल्कि लोक संचार और संवाद के प्रथम आचार्य के रूप में भी देखा जाता है। देवर्षि नारद के जीवन, कार्य और संस्कृत ग्रंथों में वर्णित उनके संवादों के आधार पर यह शोधपरक आलेख इस प्रश्न का विश्लेषण करता है

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लोक कल्याण के संवाहक पत्रकार थे देवर्षि नारद

देवर्षि नारद को केवल पौराणिक पात्र ही नहीं, बल्कि लोककल्याण के संवाहक और आदर्श पत्रकार के रूप में समझना आवश्यक है। निष्पक्षता, सत्य और संवाद की उनकी परंपरा आज भी पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक है।

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अजमेर का ‘लाल्या-काल्या मेला’ : नृसिंह जयंती पर जीवंत होती आस्था और परंपरा

अजमेर के नया बाजार होलीदड़ा स्थित श्रीनृसिंह मंदिर में नृसिंह जयंती पर लगने वाला ऐतिहासिक लाल्या-काल्या मेला, जहां वराह और नृसिंह अवतार की कथा जीवंत रूप में प्रस्तुत की जाती है।

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