धर्म-अध्यात्म

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गृह शांति एवं व्यावसायिक सफ़लता के लिए सृष्टि के रचयिता भगवान विश्वकर्मा की पूजा उपासना

सृष्टि के निर्माता भगवान विश्वकर्मा किसी एक समाज के आराध्य देव नहीं हैं, वे सकल समाज के अराध्य हैं और उनकी पूजा सकल समाज को करनी चाहिए। प्राचीन काल में देवता सकल समाज के होते थे, वर्तमान में देवताओं को भी लोगों ने जातियों में बांट और बांध लिया। हम हिन्दू समाज में विघटन और संघर्ष का देख रहे हैं, उसका मुख्य कारण यही है।

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वैश्विक संस्कृति में भगवान गणेश का प्रभाव एवं महत्व : विशेष आलेख

भगवान गणेश का वैश्विक संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी पूजा का स्वरूप और महत्त्व अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न हो सकता है, लेकिन उनका प्रतीकात्मक महत्व लगभग समान है—विघ्नहर्ता, बाधाओं को हरने वाले और ज्ञान, समृद्धि व सौभाग्य के दाता के रूप में।

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गणपति के नाम और स्वरूप पुराणों से तांत्रिक पूजा तक

उपनिषद काल में भी गणपति की पूजा की परम्परा रही। गणपत्युपनिषद इसका प्रमाण है, जिसमें गणेश जी को कर्ता-धर्ता और प्रत्यक्ष तत्व कहा गया है। जिनके रूपों में साक्षात ब्रह्म व आत्मस्वरूप बताया गया है। स्मृति काल में भी गणेश पूजा का विधान रहा। नवग्रहों के पूजन के पूर्व गणेश की पूजा करने का निर्देश है। इनसे ही लक्ष्मी की प्राप्ति सम्भव होती है। पुराण युग में इस पूजा का उज्ज्वल रूप में उदय हुआ।

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वैदिक काल से राष्ट्रीय जनचेतना तक की यात्रा : गणेशोत्सव विशेष

आदिकाल से गणेश की स्तुति के अलग अलग प्रमाण मिले हैं। इनकी कथा भिन्न-भिन्न है। सतयुग में सिंहासन आरूढ़ विनायक के स्वरूप में पूजा गया जिनकी दस भुजा थी परन्तु मुख तो हाथी का ही था। त्रेतायुग में गणेश मयूरारूढ़, मयूरेश्वर के नाम से विख्यात थे जिनकी छह भुजा थी। द्वापर में इनका वाहन भूषकराज था तब इनकी चार भुजाएं थी। कलि के अंत में ये धुम्रकेत के नाम से अश्व में सवार होंगे इनका वर्ण भी धुम्र होगा।

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भारतीय संस्कृति और धर्म में गणेश जी का स्थान एवं महत्व

विघ्ननाशक और सिद्धि विनायक गणेश या गणपति की विनायक के रूप में पूजन की परंपरा प्राचीन है किंतु पार्वती अथवा गौरीनंदन गणेश का पूजन बाद में प्रारंभ हुआ। ब्राह्मण धर्म के पांच प्रमुख सम्प्रदायों में गणेश जी के उपासकों का एक स्वतंत्र गणपत्य सम्प्रदाय भी था जिसका विकास पांचवीं से आठवीं शताब्दी के बीच हुआ।

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आर्यावर्त का द्वार द्वारका और श्रीकृष्ण मिथकीय नहीं

द्वारका 3102 ईसा पूर्व समुद्र के डूब में आ गई। द्वापर युग का अंत और कलियुग का प्रारंभ हुआ इस दौरान यह प्राकृतिक घटना घटी। श्रीमद्भागवत पुराण व अन्य ग्रंथों में इसका उल्लेख किया गया है। सूर्य सिद्धांत के अनुसार कलियुग 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व की मध्य रात्रि से शुरू हुआ। द्वापरयुग से कलियुग में पृथ्वी में प्रवेश किया

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