नाट्यशास्त्र के प्रणेता आचार्य भरतमुनि ने विश्व को दी नाट्यकला : भरतमुनि जयंती माघ पूर्णिमा

कला का उत्कृष्ट रूप काव्य को माना गया है, किन्तु नाटक को कला का उत्कृष्टतम रूप कहा गया है। नाट्यविधा को प्रतिपादित करने वाला सर्वप्राचीन भारतीय ग्रंथ भरतमुनि का नाट्यशास्त्र है। विश्वभर में ग्रीक और रोमन ड्रामा को नाट्यकला की उत्पत्ति का श्रेय दिया जाता है, किन्तु लगभग 400 ईसा पूर्व, अर्थात 2500 वर्ष पूर्व, भारतीय ऋषि आचार्य भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र की रचना कर नाटक को कला के रूप में प्रतिपादित कर दिया था।
नाट्यशास्त्र के 36 अध्यायों में 6000 संस्कृत श्लोकों के माध्यम से नाट्यकला के साथ-साथ काव्य, संगीत, नृत्य, शिल्प और अन्य ललित कलाओं जैसे उसके आनुषंगिक विषयों के सूक्ष्मतम बिंदुओं को भी विस्तार से बताया गया है। इसीलिए यह नाटक से संबंधित सभी विधाओं का विश्वकोष है। कला का सूक्ष्म एवं व्यापक विवेचन करने वाले विश्व के एकमात्र ग्रंथ का गौरव नाट्यशास्त्र को ही प्राप्त है। भरतमुनि की जयंती माघ माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है।
नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में इसकी उत्पत्ति की एक रोचक कथा का वर्णन किया गया है। त्रेतायुग में एक समय मनुष्य अत्यंत भोग-विलास में इस कदर डूब गया था कि देवताओं को सृष्टि की समाप्ति की आशंका होने लगी। तब सभी देवगण समाधान के लिए सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के पास गए और प्रार्थना की कि कोई ऐसा मनोविनोद का साधन बताएं, जो सुनने के साथ देखा भी जा सके और जिसके माध्यम से मनुष्य को सही मार्ग पर लाने का संदेश दिया जा सके।
तब ब्रह्माजी ने चारों वेदों का स्मरण-चिंतन करते हुए ऋग्वेद से पाठ, अर्थात गद्य-पद्यात्मक संवाद, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रसों को लेकर एक नए पंचमवेद ‘नाट्यवेद’ की रचना की और देवराज इंद्र से कहा कि अब इसका प्रयोग देवगणों से करवाया जाए। किन्तु नाट्यकला को समझकर उसका अभिनय करना देवगणों के सामर्थ्य में नहीं था।
तब योग्य पात्र की खोज हुई और सर्वयोग्य आचार्य भरतमुनि को इस दायित्व के लिए चुना गया। भरतमुनि ने नाट्यवेद की विस्तृत व्याख्या करते हुए नाट्यशास्त्र ग्रंथ की रचना की और ब्रह्माजी के निर्देशानुसार अपने सौ पुत्रों को नाट्य-अभिनय का प्रशिक्षण दिया। इसके पश्चात उन्होंने विश्व के प्रथम नाटक ‘अमृतमंथन’ का मंचन किया।
इस नाटक के माध्यम से मनुष्यों को जीवन की महत्ता, आदर्श, धर्म और सदाचार की प्रेरणा मिली। मनुष्य ने उन मूल्यों का अनुसरण करना आरंभ किया और इस प्रकार सृष्टि विनाश से बच गई। नाट्यशास्त्र केवल नाटक का ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव जीवन को संतुलित और संस्कारित करने का शास्त्र है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने रचना काल में था।
— उमेश कुमार चौरसिया
साहित्यकार, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार
