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हिन्दी नवजागरण के शिल्पकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

अंग्रेजी राज से भारत की मुक्ति के लिए जहाँ एक ओर सशस्त्र और अहिंसक आंदोलन चले, वहीं दूसरी ओर सामाजिक और साहित्यिक जागरण के अभियान भी निरंतर सक्रिय रहे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने 1857 की क्रांति की असफलता के बाद टूट चुके समाज के मनोबल को पुनः खड़ा करने के लिए हिन्दी नवजागरण का अभियान चलाया।

परिवार ने उनका नाम हरिश्चन्द्र ही रखा था। साहित्य की अद्भुत साधना और राष्ट्रीय चेतना के लिए उन्हें “भारतेन्दु” अर्थात “भारत का चन्द्र” की उपाधि से विभूषित किया गया। उन्होंने इस सम्मान को अपने नाम के साथ जोड़ लिया और “भारतेन्दु हरिश्चन्द्र” के नाम से विख्यात हुए। जब उन्होंने होश संभाला, तब भारतीय समाज, हिन्दी भाषा और साहित्य तीनों ही विषमता और आत्महीनता के दौर से गुजर रहे थे। 1857 की असफल क्रांति के बाद समाज का मनोबल टूट चुका था। विदेशी लेखकों के साथ-साथ अनेक भारतीय विद्वान भी अंग्रेजी में रचनाएँ करने लगे थे। ऐसे वातावरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने स्वभाषा में रचना का दृढ़ अभियान आरंभ किया।

उन्होंने स्वयं अवधी, ब्रजभाषा और हिन्दी, विशेषकर खड़ी बोली में साहित्य सृजन किया और अन्य लेखकों को भी इसके लिए प्रेरित किया। आज हिन्दी खड़ी बोली साहित्य में जिस गरिमामय स्थान पर प्रतिष्ठित है, उसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान आधारशिला के समान है। उनके घर में साहित्यिक वातावरण था, जिसका प्रभाव उनके बाल्यकाल से ही दिखाई देने लगा। वे बचपन से ही तुकबंदी में कविताएँ रचने लगे थे और आसपास की घटनाओं को कहानी के रूप में सुनाया करते थे। सात वर्ष की आयु तक उनकी रचनाएँ परिष्कृत होने लगी थीं, जो आज भी उपलब्ध हैं।

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उन्होंने गद्य, पद्य, कहानी, व्यंग्य के साथ-साथ नाटक भी लिखे। आधुनिक हिन्दी नाट्य रचना का पितामह उन्हें इसी कारण कहा जाता है। उनकी रचनाओं में तत्कालीन समाज की दासता, गरीबी, शोषण और पिछड़ेपन का यथार्थ चित्रण है। वे नवजागरण के कल्पनाकार माने जाते हैं। मात्र पैंतीस वर्षों के अल्प जीवन में उन्होंने लगभग सभी साहित्यिक विधाओं में इतना विपुल लेखन किया कि ऐसा प्रतीत होता है मानो वे असाधारण प्रज्ञा लेकर इस संसार में आए हों।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को उत्तर प्रदेश के बनारस नगर में हुआ। परिवार आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध था और बनारस के प्रतिष्ठित धनी परिवारों में उनकी गणना होती थी। उनके पिता गोपाल चन्द्र अपने समय के प्रसिद्ध कवि थे। घर में हिन्दी और साहित्य का सशक्त वातावरण था। बालक हरिश्चन्द्र अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, कल्पनाशील और विलक्षण स्मरण शक्ति के धनी थे। पाँच वर्ष की आयु में माता का निधन हो गया और दादी ने उनका पालन-पोषण किया। दस वर्ष की आयु में पिता का भी देहांत हो गया, किंतु साहित्य साधना का उनका मार्ग अविराम रहा।

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किशोरावस्था में ही वे ‘बाल विबोधिनी’, ‘हरिश्चन्द्र पत्रिका’ और ‘कविवचन सुधा’ जैसी पत्रिकाओं के संपादन से जुड़ गए। मात्र अठारह वर्ष की आयु में उन्होंने ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। उस समय भारत के लगभग सभी प्रमुख विद्वान और साहित्यकार इस पत्रिका में प्रकाशित हुए। भारतेन्दु जी को अवधी, ब्रजभाषा, बंगला, मराठी, गुजराती, उर्दू और संस्कृत सहित अनेक भारतीय भाषाओं का ज्ञान था। उनका साहित्य लेखन लगभग सभी भाषाओं में हुआ, किंतु ब्रजभाषा और हिन्दी खड़ी बोली में उनकी रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

केवल सत्रह वर्ष की आयु में उन्होंने बंगला भाषा के प्रसिद्ध नाटक ‘विद्या सुन्दर’ का खड़ी बोली में अनुवाद किया, जिसका मंचन भी हुआ। इसके बाद उन्होंने खड़ी बोली में स्वयं मौलिक नाटकों की रचना आरंभ की। उनके नाटकों की कथावस्तु और पात्र उनके स्वयं के अनुभवों से उपजे होते थे। वे अत्यंत संवेदनशील थे। जो कुछ वे देखते, वही उनके मस्तिष्क में स्थायी रूप ले लेता और नाट्य रूप में प्रकट होता था। इन्हीं कारणों से उन्हें हिन्दी थियेटर का पितामह कहा गया।

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काशी के विद्वानों ने उनकी साहित्यिक प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें ‘भारतेन्दु’ की उपाधि प्रदान की। उस समय उनकी आयु मात्र तीस वर्ष थी। उनके अद्भुत साहित्यिक योगदान और उनसे प्रेरित समकालीन रचनाओं के कारण ही उनके जीवनकाल को “भारतेन्दु युग” कहा जाता है। अपने जीवन का प्रत्येक क्षण हिन्दी साहित्य को समर्पित करने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 6 जनवरी 1885 को इस संसार से विदा ली।

उनकी रचनाओं में भक्ति, श्रृंगार और निर्वेग भावों की विविधता मिलती है। दोहा, चौपाई और छंदों में उनकी भाषा परिष्कृत और शुद्ध है। स्वभाषा, भारतीय परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र के प्रति उनकी गहरी निष्ठा उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देती है। वे सुधारवादी थे और उनकी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन का स्पष्ट संदेश मिलता है। केवल पैंतीस वर्ष के जीवन में उन्होंने कुल 72 ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रत्येक कृति कालजयी है और आज भी हिन्दी साहित्य को दिशा और प्रेरणा देती है। यद्यपि उनका रचना संसार बहुभाषी है, फिर भी ब्रजभाषा में उनकी रचनाएँ असाधारण हैं, जिनमें अद्भुत श्रृंगार और प्रेमभाव दिखाई देता है। ‘सप्त संग्रह’ और ‘प्रेम माधुरी’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।