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भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और रामलीला मंचन की परंपरा

आचार्य ललित मुनि

भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत में रंगमंच और नाट्य कला का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब हम नाट्य परंपरा की बात करते हैं तो सबसे पहले ऋषि भरत मुनि और उनके अमर ग्रंथ नाट्यशास्त्र का स्मरण होता है। नाट्यशास्त्र को विश्व का सबसे प्राचीन और व्यापक नाट्य शास्त्र माना जाता है जो न केवल नाटक की कला बल्कि संगीत नृत्य अभिनय और रंगमंच निर्माण जैसे सभी पक्षों को समाहित करता है। इसी नाट्यशास्त्र की नींव पर विकसित हुई भारतीय रंगमंच परंपरा ने समय के साथ अनेक रूप धारण किए जिनमें से एक सबसे जीवंत और लोकप्रिय रूप है रामलीला मंचन की परंपरा। रामलीला रामायण की कथा को जीवंत रूप में मंचित करने का वह अनुपम माध्यम है जो सदियों से भारतीय समाज को नैतिक मूल्यों धर्म भावना और सांस्कृतिक एकता का संदेश देता आया है। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित सिद्धांतों का रामलीला में प्रत्यक्ष अनुप्रयोग देखा जा सकता है जो प्राचीन शास्त्रीय परंपरा को लोक जीवन से जोड़ता है।

भरत मुनि का नाट्यशास्त्र भारतीय नाट्य कला का आधारभूत ग्रंथ है। इसकी रचना का काल लगभग 400 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के बीच माना जाता है। किंवदंती के अनुसार जब देवताओं ने ब्रह्मा से एक ऐसा वेद मांगा जो सभी वर्गों के लिए सुलभ हो और जो मनोरंजन के साथ साथ ज्ञान और नैतिक शिक्षा भी प्रदान करे तब ब्रह्मा ने ऋग्वेद से पाठ सामवेद से संगीत यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यवेद की रचना की। इस नाट्यवेद को उन्होंने भरत मुनि को सौंपा जिन्होंने इसे नाट्यशास्त्र के रूप में संकलित किया। ग्रंथ कुल 36 अध्यायों में विभक्त है जिसमें नाट्यमंडप निर्माण अभिनय के चार प्रकार रस, सिद्धांत भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव तथा दशरूपक जैसे विषयों का विस्तृत वर्णन है। भरत मुनि ने नाट्य को पंचम वेद कहा क्योंकि यह सभी वेदों का सार है और यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी वर्णों तथा स्त्री पुरुष सभी के लिए उपलब्ध है। नाट्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि लोक कल्याण और धार्मिक भावना का संवर्धन है।

नाट्यशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण देन रस सिद्धांत है। भरत मुनि के अनुसार नाट्य में आठ मूल रस हैं शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत जिन्हें बाद में शांत रस जोड़कर नौ किया गया। रस की उत्पत्ति स्थायी भाव के साथ विभाव अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से होती है। अभिनेता को इन भावों को व्यक्त करने के लिए आंगिक वाचिक आहार्य और सात्विक अभिनय का प्रयोग करना चाहिए। आंगिक अभिनय मुद्राओं और शरीर भाषा पर आधारित है वाचिक अभिनय स्वर और उच्चारण पर आहार्य वेशभूषा और सज्जा पर तथा सात्विक अभिनय प्राकृतिक भावों जैसे रोमांच अश्रु आदि पर। नाट्यशास्त्र में लोकधर्मी और नाट्यधर्मी अभिनय की अवधारणा भी दी गई है जिसमें लोकधर्मी यथार्थवादी शैली है जबकि नाट्यधर्मी शैलीकृत और प्रतीकात्मक। रंगमंच निर्माण के लिए भरत मुनि ने विस्तृत निर्देश दिए हैं जिसमें मंच का आकार दर्शकों की दूरी प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि का ध्यान रखा गया है। ये सभी सिद्धांत आज भी भारतीय रंगमंच की आधारशिला बने हुए हैं।

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रामलीला मंचन की परंपरा नाट्यशास्त्र के इन सिद्धांतों का लोक रूप में सुंदर अनुप्रयोग है। रामलीला शब्द दो शब्दों राम और लीला से मिलकर बना है जिसका अर्थ है राम की लीला या राम की दिव्य क्रीड़ा। यह रामायण की कथा को गीत संवाद नृत्य और अभिनय के माध्यम से मंचित करने की परंपरा है। रामलीला मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस पर आधारित है। रामचरितमानस १६वीं शताब्दी में अवधी भाषा में रचित हुई जिसने राम कथा को आम जन तक पहुंचाया। परंपरा के अनुसार तुलसीदास के शिष्य मेघा भगत ने 1625 ईस्वी में रामचरितमानस आधारित रामलीला का प्रारंभ किया हालांकि कुछ विद्वान मानते हैं कि रामलीला इससे पहले भी 1200 से 1500 ईस्वी के बीच वाल्मीकि रामायण पर आधारित रूप में प्रचलित थी। रामलीला मुख्य रूप से नवरात्रि से दशहरा तक आयोजित होती है और इसमें राम वनवास सीता हरण लक्ष्मण के साथ युद्ध और रावण वध की कथा को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

रामलीला में भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के सिद्धांत स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। रामलीला में रसों का सुंदर मिश्रण है शृंगार रस राम सीता के प्रेम में करुण रस वनवास और सीता हरण में वीर रस युद्ध के दृश्यों में और अद्भुत रस राम के दिव्य चरित्र में। अभिनय भी नाट्यशास्त्र के अनुसार किया जाता है जहां स्वयंसेवक या स्थानीय कलाकार राम लक्ष्मण सीता और हनुमान जैसे पात्रों को निभाते हैं। आंगिक अभिनय में मुद्राएं और शारीरिक भावों का प्रयोग भरत मुनि के निर्देशों से प्रेरित है। वाचिक अभिनय में रामचरितमानस के दोहे और चौपाइयां गाई और बोली जाती हैं जो वाचिक अभिनय का उत्कृष्ट उदाहरण है। आहार्य अभिनय में वेशभूषा मुकुट धनुष बाण और रावण का विशाल पुतला आदि का प्रयोग दर्शकों को आकर्षित करता है। रामलीला में मंच प्रायः खुला मैदान या विशेष रूप से निर्मित रंगमंच होता है जो नाट्यशास्त्र के नाट्यमंडप सिद्धांत से जुड़ता है। दर्शक और अभिनेता के बीच प्रत्यक्ष संबंध बना रहता है जिससे भावों का आदान प्रदान आसानी से होता है।

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रामलीला की सबसे प्रसिद्ध परंपरा वाराणसी के रामनगर में देखी जाती है। यहां काशी नरेश की अध्यक्षता में रामलीला एक माह से अधिक समय तक चलती है जिसमें पूरा शहर मंच बन जाता है। विभिन्न स्थानों को राम की यात्रा के अनुसार सजाया जाता है जैसे अयोध्या जनकपुर पंचवटी और लंका। रामनगर रामलीला में हजारों कलाकार और दर्शक भाग लेते हैं और इसमें घोड़ों हाथियों तथा नावों का भी प्रयोग होता है। यह परंपरा 18वीं शताब्दी से चली आ रही है और इसमें नाट्यशास्त्र के अनुसार रस अनुभूति का पूरा ध्यान रखा जाता है। अयोध्या में भी रामलीला का विशेष महत्व है जहां राम जन्मभूमि के आसपास लीला मंचित की जाती है। वृंदावन मथुरा और अन्य स्थानों में भी रामलीला लोकप्रिय है।

रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इसमें सभी वर्गों के लोग भाग लेते हैं चाहे वे अभिनेता हों या दर्शक। बच्चे युवा और वृद्ध सभी इसमें शामिल होते हैं जिससे सामुदायिक भावना मजबूत होती है। रामलीला में नैतिक शिक्षा का संदेश दिया जाता है जैसे सत्य पालन माता पिता की आज्ञा का पालन और बुराई पर अच्छाई की विजय। यह भरत मुनि के नाट्य उद्देश्य से मेल खाता है कि नाट्य मनोरंजन के साथ साथ शिक्षा और शुद्धिकरण का साधन है। दशहरा के दिन रावण वध और रावण दहन का दृश्य रामलीला का चरमोत्कर्ष होता है जो बुराई के विनाश का प्रतीक है।

भारत के विभिन्न राज्यों में रामलीला की अपनी स्थानीय शैलियां हैं। उत्तर प्रदेश में यह अधिकतर रामचरितमानस पर आधारित है जबकि कुछ स्थानों में वाल्मीकि रामायण का प्रभाव भी दिखता है। छत्तीसगढ़ में रामलीला की परंपरा भी काफी समृद्ध है जहां लोक नाट्य शैलियों के साथ राम कथा मंचित की जाती है। रायपुर बिलासपुर और बस्तर क्षेत्र में स्थानीय कलाकार रामलीला प्रस्तुत करते हैं जिसमें गोंड और हल्बा लोक गीतों का मिश्रण देखा जाता है। यह परंपरा नाट्यशास्त्र के लोकधर्मी अभिनय से प्रेरित है जहां स्थानीय भाषा और लोक वेशभूषा का प्रयोग किया जाता है। रामलीला यहां सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक जागरण का माध्यम बनती है।

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2008 में रामलीला को यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया। यह मान्यता रामलीला की वैश्विक महत्वता को दर्शाती है। यूनेस्को ने इसे सामुदायिक भागीदारी सांस्कृतिक विविधता और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण के लिए सराहा। आज भी रामलीला पूरे भारत में हजारों स्थानों पर आयोजित होती है और इसमें लाखों लोग भाग लेते हैं। आधुनिक समय में रामलीला में कुछ बदलाव आए हैं जैसे प्रकाश व्यवस्था ध्वनि प्रभाव और कभी कभी वीडियो प्रोजेक्शन का प्रयोग लेकिन मूल भावना और नाट्यशास्त्र के सिद्धांत आज भी अक्षुण्ण हैं।

रामलीला मंचन की परंपरा भरत मुनि के नाट्यशास्त्र को जीवंत रखने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। जहां नाट्यशास्त्र शास्त्रीय और सैद्धांतिक है वहीं रामलीला उसका लोक रूप है जो आम जन तक पहुंचता है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि नाट्य मात्र कला नहीं बल्कि जीवन का दर्शन है। रामलीला के माध्यम से राम के आदर्श चरित्र को समाज में स्थापित किया जाता है जो आज भी प्रासंगिक है। जब हम रामलीला देखते हैं तो भरत मुनि का वह वाक्य याद आता है कि नाट्य सभी वेदों का सार है और यह मनुष्य को बेहतर बनाने का साधन है।

आज के युग में जब डिजिटल माध्यम रंगमंच को चुनौती दे रहे हैं तब रामलीला जैसी परंपराएं हमें याद दिलाती हैं कि जीवंत मंच की अपनी अनोखी शक्ति है। दर्शक और अभिनेता के बीच का प्रत्यक्ष संबंध भावों का आदान प्रदान और सामुदायिक अनुभव डिजिटल स्क्रीन कभी नहीं दे सकती। रामलीला न केवल धार्मिक है बल्कि सांस्कृतिक एकता सामाजिक सद्भाव और नैतिक शिक्षा का भी माध्यम है। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और रामलीला की परंपरा साथ साथ चलते हैं और भारतीय संस्कृति की निरंतरता को बनाए रखते हैं।

इस प्रकार भरत मुनि के नाट्यशास्त्र ने भारतीय रंगमंच को एक मजबूत आधार प्रदान किया और रामलीला मंचन की परंपरा ने उसे लोक जीवन से जोड़कर अमर बना दिया। यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेगी और सत्य अहिंसा और धर्म के संदेश को फैलाती रहेगी। रामलीला देखते समय हम न केवल राम की कहानी देखते हैं बल्कि भरत मुनि के नाट्य दर्शन को भी अनुभव करते हैं। यही भारतीय नाट्य परंपरा की महानता है।