भारत की आत्मा को जीवंत करने वाला कलाकार: मनोज कुमार

हिन्दी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपनी कला और योगदान के कारण अमर हो गए। मनोज कुमार उनमें से एक हैं, जिन्हें “भारत कुमार” के नाम से जाना जाता है। यह उपनाम उनके लिए केवल एक सम्मान ही नहीं, बल्कि उनकी देशभक्ति और सिनेमा के प्रति समर्पण का प्रतीक बन गया। उनकी फिल्मों ने न सिर्फ मनोरंजन किया, बल्कि समाज में देशप्रेम और सामाजिक चेतना को जागृत करने का भी काम किया।
मनोज कुमार की पहचान उनकी देशभक्ति की फ़िल्में बनी, मनोज कुमार ने अपने करियर में देशभक्ति को अपनी फिल्मों का मुख्य आधार बनाया। उनकी फिल्में केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वे समाज को जागरूक करने और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने का माध्यम भी बनीं। “शहीद” में भगत सिंह की शहादत, “उपकार” में किसान और जवान की एकता, “पूरब और पश्चिम” में भारतीय संस्कृति की महिमा, और “क्रांति” में स्वतंत्रता संग्राम की भावना को उन्होंने पर्दे पर जीवंत किया। उनकी फिल्मों ने उस दौर के युवाओं में देशप्रेम की भावना को प्रज्वलित किया।
उनकी खास शैली भी उन्हें अलग बनाती थी। वे अक्सर अपने एक हाथ को चेहरे के पास रखते थे, जो उनकी अभिनय की पहचान बन गया। इसके पीछे एक किस्सा यह भी है कि वे अपने चेहरे के भावों को नियंत्रित करने के लिए ऐसा करते थे। साथ ही, वे बंद गले के कुर्ते या शर्ट पहनना पसंद करते थे, जो उनकी सादगी और भारतीयता को दर्शाता था।
मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी फ्रंटियर प्रांत (वर्तमान में पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा) के एबटाबाद में एक पंजाबी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका असली नाम हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी था। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय, जब वे मात्र 10 वर्ष के थे, उनका परिवार दिल्ली आकर बस गया। यह वह दौर था जब उन्होंने शरणार्थी जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखा। दिल्ली के विजय नगर के किंग्सवे कैंप में शरणार्थी शिविर में रहते हुए उन्होंने अपने परिवार के साथ कई मुश्किलें झेलीं। इस दौरान उनके नवजात भाई की मृत्यु भी हो गई, जो उनके जीवन का एक दुखद अध्याय रहा। बाद में उनका परिवार पुराने राजेंद्र नगर में स्थायी रूप से बस गया।
मनोज ने अपनी शिक्षा दिल्ली में पूरी की और हिंदू कॉलेज से कला स्नातक (बीए) की डिग्री हासिल की। बचपन से ही वे सिनेमा के प्रति आकर्षित थे। खास तौर पर वे मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार से बेहद प्रभावित थे। दिलीप कुमार की फिल्म “शबनम” (1949) में उनके किरदार का नाम “मनोज” था, जिसने उन्हें इतना प्रेरित किया कि उन्होंने अपना नाम हरिकृष्ण से बदलकर मनोज कुमार रख लिया। यह निर्णय उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
मनोज कुमार ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1957 में फिल्म “फैशन” से की, जिसमें उन्होंने 90 साल के एक भिखारी की छोटी सी भूमिका निभाई। यह फिल्म भले ही ज्यादा सफल न हुई, लेकिन इसने उन्हें फिल्म उद्योग में पहचान दिलाने की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने कई छोटी-मोटी भूमिकाएँ निभाईं और धीरे-धीरे सहायक से मुख्य अभिनेता की ओर बढ़े। उनकी पहली प्रमुख फिल्म “कांच की गुड़िया” (1960) थी, लेकिन असली सफलता उन्हें 1962 में विजय भट्ट की फिल्म “हरियाली और रास्ता” से मिली। इस फिल्म में माला सिन्हा के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया।
शुरुआती दौर में मनोज ने रोमांटिक और थ्रिलर फिल्मों में काम किया। “वो कौन थी” (1964), “हिमालय की गोद में” (1965), “गुमनाम” (1965) और “दो बदन” (1966) जैसी फिल्मों ने उन्हें एक लोकप्रिय अभिनेता के रूप में स्थापित किया। लेकिन उनकी असली पहचान तब बनी जब उन्होंने देशभक्ति फिल्मों की ओर रुख किया।
मनोज कुमार को “भारत कुमार” का उपनाम उनकी देशभक्ति से प्रेरित फिल्मों के कारण मिला। 1965 में फिल्म “शहीद” में उन्होंने क्रांतिकारी भगत सिंह का किरदार निभाया, जिसने दर्शकों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी। इस फिल्म ने उन्हें देशभक्ति सिनेमा के एक मजबूत स्तंभ के रूप में स्थापित किया। इसके बाद 1967 में आई फिल्म “उपकार” ने उनके करियर को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। इस फिल्म का निर्माण तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे “जय जवान, जय किसान” से प्रेरित था। मनोज ने न केवल इसमें अभिनय किया, बल्कि इसका निर्देशन और लेखन भी किया। “उपकार” सुपरहिट रही और इसे कई पुरस्कार मिले, जिसमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल था। इस फिल्म का गाना “मेरे देश की धरती” आज भी देशभक्ति का पर्याय माना जाता है।
“उपकार” के बाद मनोज ने “पूरब और पश्चिम” (1970), “रोटी कपड़ा और मकान” (1974), और “क्रांति” (1981) जैसी फिल्में बनाईं, जो देशभक्ति और सामाजिक मुद्दों पर आधारित थीं। इन फिल्मों में उनके किरदार का नाम अक्सर “भारत” होता था, जो उनके देशप्रेम का प्रतीक था। “पूरब और पश्चिम” का गाना “भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ” उनकी पहचान बन गया। दर्शकों और फिल्म बिरादरी ने उन्हें “भारत कुमार” कहना शुरू कर दिया, जो उनके लिए गर्व की बात थी।
मनोज कुमार का करियर हमेशा आसान नहीं रहा। 1975 में इमरजेंसी के दौरान उन्होंने इसका खुलकर विरोध किया, जिसके कारण उनकी फिल्म “दस नंबरी” को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बैन कर दिया। उनकी एक और फिल्म “शोर” को सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले ही दूरदर्शन पर दिखा दिया गया, जिससे वह बॉक्स ऑफिस पर असफल रही। लेकिन मनोज ने हार नहीं मानी और कानूनी लड़ाई लड़कर अपनी फिल्मों को रिलीज करवाया। यह उनके साहस और सिद्धांतों की मिसाल है।
1981 में “क्रांति” की सफलता के बाद उनके करियर में उतार-चढ़ाव आए। उनकी बाद की फिल्में जैसे “क्लर्क” (1989) और “मैदान-ए-जंग” (1995) ज्यादा सफल नहीं रहीं। बतौर निर्देशक उनकी आखिरी फिल्म “जय हिंद” (1999) थी। इसके बाद वे फिल्मी दुनिया से धीरे-धीरे दूर हो गए।
मनोज कुमार ने अपने फिल्मी करियर के शिखर के बाद, खास तौर पर 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में, राजनीति में रुचि दिखाई। 2004 के आम चुनाव से पहले, उन्होंने आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल होने का फैसला किया। यह कदम उनके लिए स्वाभाविक था, क्योंकि उनकी फिल्मों में राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता था। हालांकि, मनोज कुमार ने सक्रिय रूप से कोई चुनाव नहीं लड़ा और न ही वे किसी बड़े राजनीतिक पद पर आसीन हुए। उनकी भूमिका अधिकतर प्रतीकात्मक और प्रचारात्मक रही।
मनोज कुमार को उनके योगदान के लिए कई सम्मानों से नवाजा गया। 1992 में उन्हें पद्म श्री और 2015 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और सात फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले।
4 अप्रैल 2025 को 87 वर्ष की आयु में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में मनोज कुमार ने अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय सिनेमा ने एक महान कलाकार को खो दिया, लेकिन उनकी फिल्में और “भारत कुमार” की छवि हमेशा जीवित रहेगी।
मनोज कुमार को “भारत कुमार” इसलिए कहा जाता था क्योंकि उन्होंने अपने सिनेमा के जरिए भारत की आत्मा को पर्दे पर उतारा। उनकी फिल्में देश की मिट्टी, संस्कृति और संघर्ष की कहानी कहती हैं। एक शरणार्थी बच्चे से लेकर देशभक्ति सिनेमा के नायक बनने तक की उनकी यात्रा प्रेरणादायक है। वे न केवल एक अभिनेता, निर्देशक और लेखक थे, बल्कि एक सच्चे देशभक्त भी थे, जिन्होंने अपनी कला से लाखों दिलों में भारत के प्रति प्रेम जगाया। उनकी यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल रहेगी।