भारतीय सभ्यता के मूल में शिव तत्व : शिवरात्रि विशेष

भारत की सभ्यता को समझने के लिए यदि किसी एक प्रतीक, एक भाव और एक तत्त्व की तलाश की जाए, तो वह निस्संदेह शिव हैं। शिव केवल एक देवता नहीं, वे भारतीय संस्कृति के उस गहरे, शांत और विराट आयाम के प्रतीक हैं, जो सृजन और संहार दोनों को एक ही सतत चक्र का हिस्सा मानता है। भारत की संस्कृति में जो संतुलन है, जो सहिष्णुता है, जो विविधता के बीच एकात्मता है, उसके केंद्र में शिव का वही व्यापक रूप दिखाई देता है, जो विरोधों को समेटकर उन्हें सामंजस्य में बदल देता है।
भारतीय सभ्यता की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। सिंधु-सरस्वती सभ्यता की मुहरों पर योगमुद्रा में बैठे एक पुरुष की आकृति मिलती है, जिसे अनेक विद्वान ‘पशुपति’ के रूप में देखते हैं। यह आकृति केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि उस समय के समाज के प्रकृति-केन्द्रित दृष्टिकोण का संकेत है। पशुओं, वनस्पतियों और मानव के बीच एक आंतरिक संबंध की स्वीकृति शिव के इसी ‘पशुपति’ रूप में निहित है।
भारत का आदिम समाज प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं करता, बल्कि उसके साथ सहजीवन का मार्ग खोजता है। शिव की जटाओं से बहती गंगा, उनके गले में लिपटा सर्प, उनके मस्तक पर अर्धचंद्र और शरीर पर भस्म ये सब संकेत हैं कि भारतीय मनुष्य ने प्रकृति की शक्तियों को देवत्व दिया और उनसे सामंजस्य स्थापित किया।
वैदिक साहित्य में रुद्र का उल्लेख मिलता है उग्र, तेजस्वी और साथ ही औषधियों के स्वामी। यही रुद्र आगे चलकर शिव के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं, दृष्टि का भी है। रुद्र की भयावहता में भी करुणा का तत्व है। वे संहारक हैं, परंतु वही संहार नई सृष्टि का मार्ग भी बनाता है।
उपनिषदों में जो अद्वैत का भाव मिलता है, वह शिव के निराकार स्वरूप से गहरे जुड़ा है। शिव लिंग केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि उस अनंत, निराकार ब्रह्म का संकेत है, जिसका न आदि है, न अंत। भारत की दार्शनिक परंपरा में जो एकत्व की अनुभूति है ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ उसका जीवंत रूप शिव में दिखाई देता है।
भारत की सभ्यता का एक प्रमुख आधार तप है। हिमालय की शीतल निस्तब्धता में ध्यानमग्न शिव भारतीय मानस में तपस्वी आदर्श को स्थापित करते हैं। वे राजसत्ता या वैभव के प्रतीक नहीं हैं। उनका निवास कैलाश है, उनका आसन व्याघ्रचर्म, उनका आभूषण सर्प और भस्म। यह सादगी केवल बाहरी नहीं, भीतर की विरक्ति का भी प्रतीक है।
भारतीय संस्कृति में सन्यास और गृहस्थ दोनों को समान महत्व दिया गया है। शिव इस संतुलन के केंद्र में हैं। वे एक ओर योगी हैं, दूसरी ओर पार्वती के साथ गृहस्थ जीवन का आदर्श भी प्रस्तुत करते हैं। उनके परिवार में गणेश और कार्तिकेय जैसे पुत्र हैं, नंदी जैसा सेवक है, और भूत-प्रेत तक उनके गण हैं। यह समावेशी दृष्टि बताती है कि भारतीय समाज ने विविधताओं को स्थान दिया, उन्हें तिरस्कृत नहीं किया।
नटराज का रूप भारतीय कला और दर्शन की ऊँचाइयों का परिचायक है। शिव का तांडव केवल नृत्य नहीं, सृष्टि के स्पंदन का प्रतीक है। डमरू की ध्वनि से सृजन की लय निकलती है, अग्नि में संहार की ज्वाला है, और उठे हुए चरण में मुक्ति का आश्वासन।
यह रूप बताता है कि भारत ने जीवन को स्थिर नहीं माना। यहाँ सब कुछ गतिशील है। परिवर्तन भय का कारण नहीं, विकास का संकेत है। शिव का तांडव हमें सिखाता है कि विनाश भी नवजीवन की भूमिका हो सकता है। सभ्यता का यह दृष्टिकोण भारत को निरंतर पुनर्नवा करता रहा है।
शिव को आदियोगी और आदिदेव कहा गया है, परंतु वे लोकदेव भी हैं। गाँवों में, पहाड़ियों पर, नदी तटों पर छोटे-छोटे शिवालय मिलते हैं। पूजा की जटिलता नहीं, केवल जल, बेलपत्र और श्रद्धा पर्याप्त है। यह सहजता भारतीय समाज की समानतावादी चेतना को दर्शाती है।
शिव की आराधना में जाति या वर्ग का बंधन अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। भक्ति आंदोलन के संतों ने शिव को अपने निकट पाया। कबीर से लेकर तमिल नायनार संतों तक, शिव की उपासना ने सामाजिक दीवारों को पिघलाया। भारतीय सभ्यता का जो लोकतांत्रिक और सहभागी स्वरूप है, उसमें शिव-भक्ति की बड़ी भूमिका रही है।
शिव का समूचा स्वरूप पर्यावरणीय संतुलन का पाठ पढ़ाता है। वे पर्वतों के स्वामी हैं, नदियों के संरक्षक हैं, वन्यजीवन के मित्र हैं। समुद्र मंथन की कथा में जब विष निकला, तो शिव ने उसे कंठ में धारण कर लिया। यह केवल पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह संकेत है कि समाज के संकट को कोई तो अपने भीतर रोकता है, ताकि जगत सुरक्षित रह सके।
आज जब पर्यावरण संकट की चर्चा होती है, तब शिव का नीलकंठ रूप विशेष अर्थ रखता है। भारत की सभ्यता ने प्रकृति को भोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि पूज्य माना। यह दृष्टि शिव तत्व से ही उपजी है।
अर्धनारीश्वर का स्वरूप भारतीय चिंतन की अद्भुत उपलब्धि है। आधा शरीर शिव का, आधा पार्वती का। यह केवल कलात्मक कल्पना नहीं, बल्कि यह स्वीकार है कि सृष्टि का संतुलन स्त्री और पुरुष दोनों के सामंजस्य में है।
भारतीय समाज में स्त्री को शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा मिली। शक्ति के बिना शिव शव हो जाते हैं यह प्रसिद्ध उक्ति केवल भाषाई संकेत नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक सत्य है। सभ्यता का विकास तभी संभव है, जब ऊर्जा और चेतना, संवेदना और संकल्प दोनों साथ हों।
भारतीय कला की कोई भी धारा शिव से अछूती नहीं। भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी जैसे नृत्यों में नटराज की छाया है। शास्त्रीय संगीत में रागों के नाम और भजनों में शिव की महिमा है। साहित्य में कालिदास से लेकर आधुनिक कवियों तक, शिव प्रेरणा के स्रोत रहे हैं।
लोकगीतों में, विशेषकर ग्रामीण भारत में, शिव को सहज और निकट देवता के रूप में गाया जाता है। वे भोलेनाथ हैं, जो जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। यह सरलता भारतीय लोकमानस की आत्मीयता को दर्शाती है।
शिव का अर्थ ही है कल्याण। वे विनाश के देवता कहे जाते हैं, पर उनका विनाश अहंकार का है, अज्ञान का है। ध्यान की परंपरा, योग की साधना और आत्मचिंतन की प्रवृत्ति भारत की पहचान बन चुकी है। इसका आदिस्रोत शिव ही माने जाते हैं।
योगशास्त्र में शिव को प्रथम गुरु माना गया है। उनकी ध्यानमग्न मुद्रा हमें भीतर की यात्रा का संकेत देती है। भारत की सभ्यता ने बाहरी विस्तार के साथ-साथ आंतरिक अन्वेषण को भी महत्व दिया। यही कारण है कि यहाँ आध्यात्मिकता जीवन का स्वाभाविक अंग बनी रही।
भारत अनेक आक्रमणों, उतार-चढ़ावों और ऐतिहासिक परिवर्तनों से गुजरा, पर उसकी मूल चेतना अक्षुण्ण रही। इसका कारण यह है कि भारतीय दृष्टि में संहार भी एक प्रक्रिया है, अंत नहीं। शिव का तत्त्व यही सिखाता है कि जो पुराना है, वह टूटेगा ताकि नया जन्म ले सके।
यह लचीलापन और पुनरुत्थान की क्षमता भारतीय सभ्यता की शक्ति है। वह कठोर संरचना नहीं, बल्कि जीवंत प्रवाह है।
जब हम कहते हैं कि भारत की सभ्यता के मूल में शिव हैं, तो इसका अर्थ किसी एक संप्रदाय की प्रधानता नहीं है। इसका आशय उस व्यापक चेतना से है, जो जीवन को समग्रता में देखती है। शिव में तप है, प्रेम है, क्रोध है, करुणा है, संहार है और सृजन भी। वे विरोधों के मेल हैं।
भारतीय सभ्यता की यही विशेषता है कि वह विरोधों को युद्ध में नहीं, संतुलन में बदल देती है। विविधता को विभाजन नहीं बनने देती, बल्कि उसे उत्सव बना देती है। इस दृष्टि का मूल स्रोत शिव तत्व है।
शिव का स्वरूप हमें याद दिलाता है कि सभ्यता केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं बनती; वह भीतर की परिपक्वता से बनती है। जब मनुष्य अपने अहं को त्यागकर व्यापक चेतना से जुड़ता है, तब वह सच्चे अर्थों में सभ्य बनता है। भारत की यात्रा इसी आंतरिक साधना की यात्रा है, और उस यात्रा के पथप्रदर्शक शिव हैं।
“नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः।
नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः॥”

