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भारतीय अर्थव्यवस्था, उद्योग और वैश्विक भूमिका के लिए एक निर्णायक मोड़ : भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौता

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (Free Trade Agreement – FTA) केवल एक व्यापारिक करार नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक दिशा, वैश्विक भागीदारी और दीर्घकालिक विकास रणनीति का अहम आधार बनकर उभर रहा है। 27 यूरोपीय देशों के समूह के साथ यह समझौता भारत के इतिहास के सबसे बड़े व्यापारिक करारों में से एक माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे “साझा समृद्धि का नया अध्याय” बताया जाना इसके व्यापक प्रभाव को रेखांकित करता है।

इस समझौते के तहत भारत के लगभग 93 प्रतिशत उत्पादों को यूरोपीय बाजार में शुल्क-मुक्त या रियायती दरों पर प्रवेश मिलेगा, जबकि यूरोपीय संघ की 97 प्रतिशत वस्तुओं पर भारत में आयात शुल्क में छूट दी जाएगी। यह निर्णय ऐसे समय पर आया है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला संकट और संरक्षणवाद की चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे परिदृश्य में भारत और ईयू का यह करार स्थिरता और भरोसे का संकेत देता है।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार वार्ता कोई नई बात नहीं है। पिछले डेढ़ दशक से दोनों पक्ष इस समझौते को लेकर बातचीत कर रहे थे, लेकिन कृषि, बौद्धिक संपदा अधिकार, बाजार पहुंच और शुल्क संरचना जैसे मुद्दों पर मतभेद के कारण यह प्रक्रिया लंबी खिंचती रही। हाल के वर्षों में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में आए बदलावों ने दोनों पक्षों को एक-दूसरे के करीब आने के लिए प्रेरित किया।

यूरोपीय संघ भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार है। ईयू पहले से ही भारत का प्रमुख निर्यात गंतव्य और निवेश स्रोत रहा है। दूसरी ओर, भारत यूरोप के लिए एक विशाल उपभोक्ता बाजार, कुशल मानव संसाधन और उभरता हुआ मैन्युफैक्चरिंग हब है। मुक्त व्यापार समझौता इन संभावनाओं को औपचारिक और संरचित रूप देता है।

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समझौते की प्रमुख शर्तें

इस एफटीए के अंतर्गत कई अहम बिंदु शामिल हैं:

  • भारत के 93 प्रतिशत उत्पादों को यूरोपीय बाजार में कर-मुक्त या कम शुल्क पर प्रवेश

  • यूरोपीय संघ की 97 प्रतिशत वस्तुओं पर भारत में आयात शुल्क में कटौती

  • गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने के लिए मानकों और प्रक्रियाओं का सरलीकरण

  • सेवाओं, निवेश, तकनीक हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा में सहयोग

  • श्रम, पर्यावरण और सतत विकास से जुड़े प्रावधान

इन शर्तों का उद्देश्य केवल व्यापार बढ़ाना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और संतुलित आर्थिक साझेदारी बनाना है।

भारतीय निर्यात को मिलने वाला बड़ा बढ़ावा

इस समझौते से भारत को सबसे बड़ा लाभ निर्यात क्षेत्र में मिलने की संभावना है। यूरोपीय संघ दुनिया के सबसे बड़े और सबसे समृद्ध उपभोक्ता बाजारों में से एक है। अब तक भारतीय उत्पादों को वहां उच्च आयात शुल्क और कड़े मानकों के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। शुल्क में छूट मिलने से भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।

विशेष रूप से निम्न क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है:

  • वस्त्र और परिधान उद्योग – भारत का पारंपरिक और श्रम-प्रधान क्षेत्र

  • चमड़ा और जूता उद्योग – जहां भारत पहले से मजबूत स्थिति में है

  • कृषि और खाद्य उत्पाद – चावल, मसाले, चाय, कॉफी, समुद्री उत्पाद

  • फार्मास्यूटिकल्स – जेनेरिक दवाओं में भारत की वैश्विक पहचान

  • इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स – यूरोपीय ऑटो उद्योग के लिए आपूर्ति

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इन क्षेत्रों में निर्यात बढ़ने से भारत की विदेशी मुद्रा आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

निर्यात में वृद्धि का सीधा असर उत्पादन और रोजगार पर पड़ता है। जैसे-जैसे यूरोपीय मांग बढ़ेगी, भारतीय उद्योगों को उत्पादन बढ़ाना होगा। इससे विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों में लाखों नए रोजगार सृजित होने की संभावना है।

ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्थित एमएसएमई इकाइयों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। कृषि-आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा और कुटीर उद्योगों को नए बाजार मिलेंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधि बढ़ेगी और पलायन की समस्या में भी कमी आ सकती है।

मुक्त व्यापार समझौता केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसमें छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए भी नए रास्ते खुलते हैं। यूरोपीय बाजार तक सीधी पहुंच मिलने से भारतीय एमएसएमई वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बन सकेंगे।

इसके साथ ही, गुणवत्ता, पैकेजिंग और तकनीकी मानकों में सुधार का दबाव भारतीय उद्योगों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगा। स्टार्टअप्स के लिए यह समझौता तकनीक, निवेश और नवाचार के नए अवसर लेकर आएगा।

विदेशी निवेश और तकनीकी सहयोग

यूरोपीय संघ भारत में पहले से ही एक बड़ा निवेशक रहा है। एफटीए के बाद निवेश का यह प्रवाह और तेज़ होने की संभावना है। यूरोपीय कंपनियां भारत को न केवल एक बाजार, बल्कि एक उत्पादन और निर्यात केंद्र के रूप में भी देखेंगी।

विशेष रूप से इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ सकता है:

  • हरित ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल तकनीक

  • ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक वाहन

  • डिजिटल टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

  • रक्षा उत्पादन और एयरोस्पेस

  • स्वास्थ्य और बायोटेक्नोलॉजी

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तकनीकी सहयोग से भारतीय उद्योगों की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार होगा।

समझौते के तहत लग्जरी कारों और कुछ उच्च मूल्य वाले वाहनों पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती का प्रावधान किया गया है। इससे भारतीय उपभोक्ताओं को बेहतर तकनीक वाली गाड़ियां अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिल सकेंगी।

हालांकि, इसका एक दूसरा पहलू भी है। घरेलू ऑटो उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा, लेकिन यही प्रतिस्पर्धा उसे तकनीकी रूप से अधिक उन्नत और कुशल बनने के लिए प्रेरित करेगी।

यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। भारत और यूरोपीय संघ दोनों लोकतांत्रिक मूल्यों, नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था और बहुपक्षीय सहयोग के समर्थक हैं।

रक्षा, साइबर सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ेगा। इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका मजबूत होगी और वह वैश्विक निर्णय-निर्माण में अधिक प्रभावी आवाज बन सकेगा।

हालांकि यह समझौता कई अवसर लेकर आता है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। भारतीय किसानों और छोटे उद्योगों को यूरोपीय प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए संतुलित नीतियों की आवश्यकता होगी। गुणवत्ता और पर्यावरण मानकों को पूरा करने के लिए उद्योगों को निवेश करना पड़ेगा।

सरकार, उद्योग और नीति-निर्माताओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि इस समझौते का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचे और किसी वर्ग पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।