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जब तीन युवाओं ने इतिहास की दिशा बदल दी

आचार्य ललित मुनि

वह शाम का वक्त, जब 23 मार्च को लाहौर सेंट्रल जेल की दीवारें सूर्यास्त की लाली में रंग गई थीं।  भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीन युवा हँसते हुए, गले में फंदा डालने के लिए कदम बढ़ा रहे थे। उनके चेहरे पर कोई डर नहीं, कोई पछतावा नहीं। बस एक नारा वातावरण में गूँज रहा था  “इंकलाब ज़िंदाबाद!” हवा में। जेल के अहाते में खड़े अंग्रेज अधिकारी स्तब्ध थे। ये तीन लड़के, जिनकी उम्र मुश्किल से 23-24 साल थी, मौत को गले लगा रहे थे जैसे मौत से कोई पुरानी यारी हो।

यह सिर्फ एक फाँसी नहीं थी। यह एक युग का अंत और एक नई क्रांति की शुरुआत थी। आज जब हम शहीद दिवस मनाते हैं, तो उस दिन की याद हमें सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि उन युवाओं के सर्वोच्च बलिदान की याद दिलाती है, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। लाहौर षड्यंत्र केस (1929-1930) और 23 मार्च 1931 की घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक कड़ी है। यह कहानी किसी के प्रति बैर की नहीं, बल्कि प्यार की है,  मातृभूमि के प्रति असीम प्यार की।

20वीं सदी के शुरूआती दशक में भारत ब्रिटिश साम्राज्य की की परतंत्रता  की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। जालियांवाला बाग की नरसंहार (1919) के घाव अभी ताजा थे। पंजाब की धरती पर हर तरफ विद्रोह की आग सुलग रही थी। भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को बंगा (अब पाकिस्तान) में एक जाट सिख परिवार में हुआ।

उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह पहले से ही आर्य समाजियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे। छोटे भगत ने स्कूल में ही किताबें नहीं, बल्कि क्रांतिकारी पत्रिकाएँ पढ़नी शुरू कर दीं। लाला लाजपत राय की “नेशनल कॉलेज” में पढ़ते हुए उन्होंने महसूस किया कि शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि जागृति का माध्यम है।

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सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना में हुआ। पिता की मृत्यु के बाद चाचा ने पाला। वे शांत स्वभाव के थे, लेकिन उनके भीतर आग भरी थी। वे HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन) के पंजाब प्रमुख थे,  संगठनकर्ता, प्लानर थे जो हर क्रांतिकारी को जोड़ते थे। शिवराम राजगुरु, जिनका जन्म 24 अगस्त 1908 को खेड़ (महाराष्ट्र) में हुआ, ठीक उल्टा। गुस्सैल, तेजस्वी, ब्राह्मण परिवार से। पिता की जल्दी मृत्यु ने उन्हें कठोर बना दिया। वे काकोरी षड्यंत्र (1925) में भी शामिल थे। तीनों की कहानी अलग-अलग थी, लेकिन एक ही धागे से बंधी, वह संकल्प था “अंग्रेजों को भारत से भगाना”।

1928 आया। साइमन कमीशन का विरोध। लाला लाजपत राय नेतृत्व कर रहे थे। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में पुलिस ने लाठी चार्ज किया। सुपरिंटेंडेंट जेम्स स्कॉट के आदेश पर लालाजी की पीठ पर इतनी लाठियाँ पड़ीं कि 17 नवंबर को उनका निधन हो गया। पूरा पंजाब रो पड़ा। युवा क्रांतिकारियों का खून खौल उठा।

HSRA, जो पहले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन था, अब सोशलिस्ट बन चुका था। चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने फैसला किया कि बदला लेना होगा। स्कॉट को निशाना बनाया गया। 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु ने पहली गोली चलाई, भगत सिंह ने करीब से और गोलियाँ मारीं। लेकिन गलती से सहायक सुपरिंटेंडेंट जॉन पी. सॉन्डर्स मारा गया। पीछा करने वाले हेड कांस्टेबल चन्नन सिंह को आज़ाद ने मार दिया।

उस रात पोस्टर चिपकाए गए लाहौर की दीवारों पर  “जे.पी. सॉन्डर्स मर चुका है। लाला लाजपत राय का बदला ले लिया गया। खून बहाने पर अफसोस, लेकिन क्रांति के लिए बलिदान जरूरी है।” यह मानवीय द्वंद्व था,  वे हिंसा नहीं चाहते थे, लेकिन अन्याय के खिलाफ चुप रहना भी हिंसा था। तीनों भागे, साइकिल पर, छिपते हुए। भगत सिंह ने दाढ़ी बढ़ाई, नाम बदला। लेकिन मन में एक ही विचार प्रबल था कि भारत को अंग्रेजों से आजाद कराना है।

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महीनों भागने के बाद 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंके। बम कमजोर थे, जान लेने के लिए नहीं, बल्कि आवाज़ पहुँचाने के लिए। “ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल” और “पब्लिक सेफ्टी बिल” जैसे काले कानूनों के खिलाफ। बम फटे, धुआँ फैला, लेकिन कोई मौत नहीं हुई। दोनों ने नारे लगाए  “इंकलाब ज़िंदाबाद! साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!” और खुद को गिरफ्तार करा लिया। उद्देश्य था अदालत को मंच बनाना, देश को जगाना।

भगत सिंह ने कहा था, “बम और पिस्तौल हमारे हथियार नहीं, सच्चाई हमारे हथियार हैं।” लेकिन अंग्रेजों ने इसे षड्यंत्र मान लिया। लाहौर में सॉन्डर्स हत्या का केस जोड़ा गया। FIR में सुखदेव को “स्वामी उर्फ किसान” लिखा गया। गिरफ्तारियाँ हुईं। जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु एक साथ।

जेल की जिंदगी कठोर थी। भारतीय कैदियों को कुत्तों जैसा व्यवहार। भोजन अलग, किताबें नहीं। जून 1929 में भगत सिंह ने भूख हड़ताल शुरू की। जतिन दास उनके साथ थे। 63 दिन बाद जतिन दास शहीद हो गए। पूरे देश में आंदोलन छिड़ गया। जवाहरलाल नेहरू जेल गए, जिन्ना ने असेम्बली में समर्थन दिया। 116 दिन बाद हड़ताल खत्म हुई। लेकिन इस हड़ताल ने क्रांतिकारियों को जनता से जोड़ दिया। लोग समझ गए कि ये लड़के असेम्बली में सिर्फ बम नहीं, बल्कि विचार फेंक रहे हैं।

मुकदमा शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार डर गई। सामान्य अदालत में ये लड़के अपने विचार रखते और जनता को जगाते। इसलिए वायसराय लॉर्ड इरविन ने 1 मई 1930 को विशेष अध्यादेश जारी किया “लाहौर षड्यंत्र केस अध्यादेश”। स्पेशल ट्रिब्यूनल बने, अपील का अधिकार छीन लिया गया। भगत सिंह ने कोर्ट का बहिष्कार किया। कहा, “यह राजनीतिक मुकदमा है, न्यायिक नहीं।”

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7 अक्टूबर 1930 को फैसला आया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी। बाकी को काला पानी। 68 पृष्ठों का फैसला। अंग्रेजो की यह साजिश थी। भगत सिंह ने पिता को पत्र लिखा — “मैं युद्ध लड़ रहा हूँ। मुझे तोप के मुंह में डालकर उड़ा दो। क्षमा की भीख नहीं माँगूँगा।”

फाँसी की तारीख 24 मार्च तय थी। लेकिन कांग्रेस का कराची अधिवेशन चल रहा था। ब्रिटिश डर गए  कि अगर कल फाँसी हुई तो देश भर में विद्रोह हो जाएगा। 23 मार्च को अचानक फैसला बदल दिया गया। शाम 7:30 बजे (कुछ रिकॉर्ड्स में 7:33) तीनों को फाँसी दी गई। कोई मजिस्ट्रेट नहीं था। जेलर ने बताया कि वे हँस रहे थे। भगत सिंह ने कहा, “हमारी शहादत से लाखों भगत सिंह पैदा होंगे।” राजगुरु ने माँ को याद किया, सुखदेव ने साथियों को।

शवों को काटा गया, गुप्त रूप से हुसेनीवाला ले जाकर सुतलज नदी के किनारे जलाया गया। राख नदी में बहा दी। लेकिन आग बुझी नहीं। पूरे देश में हड़तालें हुईं। कानपुर में आतंक का माहौल। गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा कि “इन वीरों ने मौत को जीत लिया, लेकिन अहिंसा का रास्ता अलग है।” उनकी शहादत ने युवाओं को जगाया। HSRA टूट गया, लेकिन विचार जीवित रहा। आजादी के बाद 1950 में शहीद स्मारक बना और 23 मार्च को शहीद दिवस।

आज 95 साल बाद भी  भारत आजादी के इन बलिदानियों का स्मरण करता है। वे बलिदान हो गए, लेकिन उनकी आत्मा हर उस युवा में जीवित है जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है। शहीद दिवस सिर्फ याद नहीं, प्रेरणा है। हर 23 मार्च को जब हम श्रद्धांजलि देते हैं, तो याद आता है कि वे हँसते हुए फ़ांसी पर झूल गये इस देश को जगाने को, भारत को स्वतंत्र कराने को। इन महान हुतात्माओं को सादर श्रद्धांजलि