कालिदास से निराला तक साहित्य में बसंत पंचमी की यात्रा

भारतीय साहित्य में बसंत पंचमी एक ऐसा पर्व है जो सदियों से कवियों की कलम में रंग भरता आया है। यह केवल ऋतु परिवर्तन या तिथि नहीं, बल्कि जीवन में नवीनता, ज्ञान की ज्योति और प्रेम की मादकता का प्रतीक है। जब माघ की कठोर सर्दी धीरे-धीरे विदा लेती है, सरसों के खेत पीली चादर ओढ़ते हैं, आम की मंजरियाँ सुगंध बिखेरती हैं और कोकिल की कुहूँ चारों ओर गूंजती है, तब प्रकृति स्वयं काव्य बन उठती है। इसी क्षण में बसंत पंचमी आती है—सरस्वती की वीणा की झंकार और कामदेव की मिठास लेकर। यह पर्व भारतीय संस्कृति में ज्ञान की देवी सरस्वती के आविर्भाव से जुड़ा है, जब देवताओं की स्तुति से वेदों की ऋचाएँ और वसंत राग उत्पन्न हुए। साहित्य में बसंत अब केवल प्रकृति का चित्र नहीं, बल्कि मानव मन की उमंग, भक्ति की गहराई और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक बन गया है।
प्राचीन संस्कृत साहित्य में बसंत का स्थान ऋतुराज के रूप में सर्वोच्च है। महाकवि कालिदास ने अपने खंडकाव्य ऋतुसंहार के वसंत सर्ग में इस ऋतु को इतनी जीवंतता से चित्रित किया कि पढ़ते हुए लगता है प्रकृति स्वयं श्रृंगार कर रही हो। वे लिखते हैं:
कुसुमिततरवः सर्वे मदगन्धेन वायुना।
मधुरं गायति कोकिलः प्रियामाह्वयन्निव॥
पवनः सुगन्धिः वहति मन्दं मन्दं।
कामिन्यः कामुकैः सह विहरन्ति॥
यहाँ बसंत में फूलों से लदे वृक्ष, सुगंधित मंद पवन और कोकिल की मधुर ध्वनि प्रेमियों को आमंत्रित करती प्रतीत होती है। कालिदास का बसंत मानव मन में उठने वाले उल्लास और प्रेम की अभिव्यक्ति है। उनके मेघदूत में भी बसंत की
स्मृति यक्ष के विरह को और गहन कर देती है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जयदेव ने गीतगोविंद में बसंत को राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का साक्षी बनाया। एक अष्टपदी में वे कहते हैं:
ललितलवंगलता-परिशीलन-कोमल-मलय-समीरे।
मधुकर-निकर-करम्बित-कोकिल-कूजित-कुञ्ज-कुटीरे॥
विहारति हरिरिह सरस-वसन्ते।
नृत्यति युवति-जनन सह बाले॥
यहाँ मलय पवन, भँवरों की गुंजन और कोकिल की कूक राधा-कृष्ण की लीलाओं को मादक बनाती हैं। जयदेव का बसंत श्रृंगार रस की पराकाष्ठा है, जहाँ प्रकृति और दिव्य प्रेम एकाकार हो जाते हैं।
भक्ति काल में बसंत का स्वरूप और समृद्ध हुआ। सूरदास जैसे कृष्ण भक्त कवियों ने इसे गोविंद की लीला का अंग बना दिया। उनके प्रसिद्ध पद में बसंतोत्सव का चित्रण इस प्रकार है:
कुहू कुहू कोकिला सुनाई।
सुनि सुनि नारि परम हरषाईं॥
बार बार सो हरिहिं सुनावति।
ऋतु बसंत आयौ समुझावतिं॥
सूर का बसंत यमुना तट पर कृष्ण और गोपियों की रासलीला की पृष्ठभूमि है, जहाँ कोकिल की ध्वनि बसंत के आगमन की सूचना देती है और प्रकृति भक्ति में डूब जाती है। इसी काल में बसंत पंचमी का सरस्वती से जुड़ाव स्पष्ट हुआ, जिससे यह ज्ञान और कला का प्रतीक भी बना।
मध्यकाल में सूफी और भक्ति धाराओं के संयोग से बसंत ने सांस्कृतिक समन्वय का रूप लिया। अमीर खुसरो ने बसंत को सूफी उत्सव बनाया। उनकी प्रसिद्ध रचना है:
सकल बन फूल रही सरसों।
अम्बवा फूटे टेसू फूले॥
कोयल बोले डार डार।
और गोरी करत सिंगार॥
मलनियाँ गढवा ले आईं कर सों।
सकल बन फूल रही सरसों॥
कथा है कि जब निजामुद्दीन औलिया शोक में थे, खुसरो ने पीले वस्त्र और सरसों के फूल लेकर यह गीत गाया, जिसने शोक को उल्लास में बदल दिया। तब से दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह पर बसंत पीले फूलों और कव्वालियों से मनाई जाती है। खुसरो का बसंत हिंदू-मुस्लिम एकता का जीवंत प्रमाण है।
आधुनिक हिंदी साहित्य में बसंत और भी विविध रूपों में उभरा। सुमित्रानंदन पंत ने प्रकृति की मातृस्वरूपा आत्मा के रूप में चित्रित किया:
फिर वसंत की आत्मा आई।
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण॥
अभिवादन करता भू का मन!
दीप्त दिशाओं के वातायन॥
पंत का बसंत सर्दी के बाद नवयौवन और उल्लास लाता है। जनकवि नागार्जुन ने आम की मंजरियों को किन्नरियों सरीखा बनाया:
रंग-बिरंगी खिली-अधखिली।
किसिम-किसिम की गंधों-स्वादों वाली॥
ये मंजरियाँ तरुण आम की।
डाल-डाल टहनी-टहनी पर झूम रही हैं॥
नागार्जुन का बसंत प्रकृति की विविधता और उमंग का प्रतीक है। केदारनाथ अग्रवाल की बसंती हवा स्वच्छंद और मस्तमौला है:
हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।
सुनो बात मेरी – अनोखी हवा हूँ॥
बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला।
नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ॥
यह हवा खेतों, नदियों और पोखरों को झुलाती-झुमाती जीवन की निडरता का संदेश देती है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, जिनका जन्म बसंत पंचमी को हुआ, ने बसंत को नवजीवन की परी बनाया:
आओ, आओ फिर, मेरे बसन्त की परी—छवि-विभावरी।
सिहरो, स्वर से भर भर, अम्बर की सुन्दरी-छबि-विभावरी॥
बहे फिर चपल ध्वनि-कलकल तरंग।
तरल मुक्त नव नव छल के प्रसंग॥
निराला का बसंत विद्रोह और सृजन की संदेशवाहिका है, जो पुरानी जड़ताओं को तोड़ती है।
बसंत पंचमी भारतीय साहित्य में जीवन दर्शन है,यह सिखाती है कि अंधकार के बाद ज्योति, सर्दी के बाद उल्लास और विरह के बाद मिलन अवश्य आता है। कालिदास का श्रृंगार, जयदेव का दिव्य प्रेम, सूर की भक्ति, खुसरो का समन्वय, पंत की कोमलता, नागार्जुन की उमंग, केदार की स्वच्छंदता और निराला का नवजागरण—सब मिलकर बसंत को अमर बनाते हैं। आज भी सरसों के खेत देखकर या सरस्वती वंदना करके ये पंक्तियाँ जीवंत हो उठती हैं, हमें याद दिलाती हैं कि जीवन बसंत की तरह नवीन और उल्लासपूर्ण हो सकता है। इस पर्व की सांस्कृतिक गहराई हमें एकता, ज्ञान और प्रकृति प्रेम की ओर ले जाती है, जो भारतीय साहित्य की आत्मा है।
