Author: News Editor

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शिमला में संजौली मस्जिद विवाद: बाजार बंद

शिमला में संजौली मस्जिद के अवैध निर्माण को लेकर बुधवार को भारी प्रदर्शन हुआ। गुरुवार को मॉल रोड, संजौली और बालूगंज में बाजार बंद रहेगा।

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futuredताजा खबरेंविविध

आतंकी घटनाओं पर विवादित पुस्तकें और बयान: पाकिस्तान को बचाने का अभियान

पुलिस अगले दिन फिर मदरसा पहुँची। इस बार आपत्तिजनक सामग्री मिली। यह सामग्री भारत में कट्टरपंथ फैलाने वाली थीं। इनमें एक पुस्तक ऐसी भी मिली जिसमें भारत में घटी कुछ बड़ी आतंकी घटनाओं के लिये पाकिस्तान को क्लीनचिट दी गई और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकवादी संगठन बताकर इनका जिम्मेदार बताया गया।

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futuredसमाज

स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण का ऐतिहासिक प्रभाव

वाराणसी की अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने कहा, ‘मैं जा रहा हूं, लेकिन मैं तब तक वापस नहीं आऊंगा जब तक कि मैं समाज पर बम की तरह फट न सकूं।’  इस अवधि में, स्वामीजी ने एक बार कहा था, ‘मेरे जीवन के अंतिम बारह वर्षों में, मुझे यह नहीं पता था कि अगला भोजन कहाँ से आएगा।’ उन्होंने इस अवधि के दौरान शिकागो में विश्व धर्म संसद के बारे में भी जाना।

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futuredहमारे नायक

सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी जतिन्द्र नाथ मुखर्जी का बलिदान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक बाघा जतिन, जिनका असली नाम जतिनेंद्र नाथ मुखर्जी था, ने अपने साहस और बलिदान से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। 7 दिसंबर 1879 को वर्तमान बांग्लादेश के जैसोर क्षेत्र में जन्मे जतिन ने अपनी वीरता का पहला परिचय किशोरावस्था में ही दिया जब उन्होंने एक बाघ से अकेले लड़ाई की, जिसके बाद लोग उन्हें ‘बाघा जतिन’ के नाम से जानने लगे

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futuredलोक-संस्कृति

नुआखाई और ऋषि पंचमी का सांस्कृतिक महत्व

ॠषि पंचमी को मनाया जाने वाला त्योहार नुआखाई ओडिशा और छत्तीसगढ़ की समृद्ध कृषि संस्कृति का महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व नई फसल के स्वागत के साथ-साथ भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम है। नुआखाई का उत्सव ग्रामीण समाज के बीच सामाजिक एकता और संस्कृति का प्रतीक है। इसके साथ ऋषि पंचमी महिलाओं के लिए आत्मशुद्धि और प्रायश्चित का पर्व है। सप्तऋषियों की पूजा के माध्यम से यह पर्व नारी शक्ति के आध्यात्मिक और सामाजिक उत्थान का प्रतीक है।

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futuredधर्म-अध्यात्मलोक-संस्कृति

वैदिक काल से राष्ट्रीय जनचेतना तक की यात्रा : गणेशोत्सव विशेष

आदिकाल से गणेश की स्तुति के अलग अलग प्रमाण मिले हैं। इनकी कथा भिन्न-भिन्न है। सतयुग में सिंहासन आरूढ़ विनायक के स्वरूप में पूजा गया जिनकी दस भुजा थी परन्तु मुख तो हाथी का ही था। त्रेतायुग में गणेश मयूरारूढ़, मयूरेश्वर के नाम से विख्यात थे जिनकी छह भुजा थी। द्वापर में इनका वाहन भूषकराज था तब इनकी चार भुजाएं थी। कलि के अंत में ये धुम्रकेत के नाम से अश्व में सवार होंगे इनका वर्ण भी धुम्र होगा।

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