Author: News Editor

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन

यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। यह समर्थन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा भी किया गया था। स्टार्मर ने कहा कि सुरक्षा परिषद को एक “अधिक प्रतिनिधि निकाय” बनने की आवश्यकता है

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अबूझमाड़: घने जंगलों में सुरक्षा बलों की ऐतिहासिक जीत, तीन बड़े नक्सली ढेर

अबूझमाड़ में 124 घंटों तक चले सर्च ऑपरेशन में डीआरजी, एसटीएफ और बीएसएफ की टीमें शामिल थीं। यह अभियान नारायणपुर, कोण्डागांव और दंतेवाड़ा जिलों में एक साथ संचालित हुआ। मुठभेड़ के बाद घटनास्थल से भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक बरामद किए गए, जिनमें एके-47, इंसास, एसएलआर, और बीजीएल लॉन्चर जैसे अत्याधुनिक हथियार शामिल थे।”

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रानी हंसादेवी सहित नौ सौ क्षत्राणियों का अग्नि प्रवेश

सिवाणा का किला वीरता और बलिदान की अनेक गाथाओं का साक्षी है। 1308 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय सातलदेव सोनगरा और रानी हंसादेवे ने वीरता और स्वाभिमान की रक्षा हेतु जौहर और साका किया। लगभग दो वर्षों तक दुश्मन का सामना करने के बाद, सिवाणा की 900 महिलाओं ने जौहर किया और हजार सैनिकों ने अंतिम युद्ध लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

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पूर्ण एकाग्रता से लक्ष्य साधो : स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द ने बिना कुछ कहे उस युवक के हाथ से बन्दूक ली और एक के बाद एक लगातार बारह छिलके पर सटीक निशाना लगाया। सारे युवक आश्चर्यचकित हो सोचने लगे कि स्वामी निश्चित ही वे कोई बड़े निशानेबाज हैं। स्वामी जी उनकी मनःस्थिति भाँपकर बोले – ” मैंने अपने जीवन में कभी भी गोली नहीं चलाई है बन्धु । आज ये जो निशाना ठीक लगा है उसकी सफलता का रहस्य है- पूर्ण एकाग्रता । “

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एकात्म मानववाद और अंत्योदय के प्रणेता : पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन और दर्शन भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे पंडित जी ने अपने जीवन में सामाजिक सेवा और राष्ट्र की एकता के लिए संघर्ष किया

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एकात्म मानव दर्शन : चतुर्पुरुषार्थ सिद्धांत को व्यवहारिक स्वरूप दिया था दीनदयाल जी ने

दीनदयाल उपाध्याय ने “एकात्म मानव दर्शन” के माध्यम से चतुर्पुरुषार्थ सिद्धांत को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि समाज के विकास का आधार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन पर होना चाहिए।

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