ईरान युद्ध के बीच अमेरिका ने बदला रुख, भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए दिया 30 दिन का समय
वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के बीच अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की छूट दी है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर लगातार दबाव बना रहे थे और इस मुद्दे पर भारत पर 50 प्रतिशत तक का शुल्क भी लगाया गया था। अब ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ने के बाद अमेरिका ने भारत से ही बाजार को संतुलित रखने में मदद करने की अपील की है।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने फॉक्स बिज़नेस को दिए साक्षात्कार में कहा कि भारत ने वाशिंगटन के अनुरोधों का जिम्मेदारी से पालन किया है। उन्होंने भारत को “विश्वसनीय भागीदार” बताते हुए कहा कि समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने से वैश्विक बाजार में आपूर्ति का दबाव कम होगा। खासकर उस समय जब होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से तेल परिवहन प्रभावित हो रहा है। यह मार्ग दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्या भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद किया?
हाल के दिनों में मध्य पूर्व में युद्ध की स्थिति बनने से कच्चे तेल की कीमतें 2024 की गर्मियों के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि भारत ने रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद नहीं किया है। विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार से सवाल किए हैं कि भारत को किसी अन्य देश से अनुमति लेने की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए।
पिछले महीने ट्रंप ने दावा किया था कि एक प्रस्तावित व्यापार समझौते के तहत भारत रूसी तेल खरीदना बंद करने पर सहमत हो गया है और इसके बदले अमेरिका शुल्क घटाकर 18 प्रतिशत कर सकता है। हालांकि भारत सरकार ने इस दावे की पुष्टि नहीं की थी।
2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद चीन और भारत रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार बन गए थे। एक समय ऐसा भी था जब भारत के कुल तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। बाद में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इसमें कमी आई और जनवरी में यह करीब 21 प्रतिशत रह गई, जबकि फरवरी में यह फिर बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत हो गई।
भारत के लिए क्यों अहम है यह छूट
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इनमें से करीब 40 से 50 प्रतिशत कच्चा तेल मध्य पूर्व से आता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है। इस स्थिति में रूस से तेल खरीदने की अनुमति भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिससे आपूर्ति का संकट कम किया जा सकेगा और आयात लागत को भी नियंत्रित रखा जा सकेगा।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रिफाइनरियां पहले ही एक करोड़ बैरल से अधिक रूसी कच्चा तेल खरीद चुकी हैं। इसके अलावा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में टैंकरों पर लगभग डेढ़ करोड़ बैरल तेल मौजूद है, जिसे एक सप्ताह के भीतर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचाया जा सकता है।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक भारत के पास फिलहाल करीब 25 दिनों तक चलने लायक कच्चे तेल का भंडार है, जबकि पेट्रोल और डीजल का स्टॉक भी लगभग इतने ही दिनों तक पर्याप्त है।
अमेरिका ने क्यों दी छूट
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि अमेरिका ने भारत से अनुरोध किया है कि वह समुद्र में मौजूद रूसी तेल को खरीद ले। इससे यह तेल जल्दी रिफाइनरियों तक पहुंचेगा और वैश्विक बाजार में तत्काल आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे कीमतों पर दबाव कम किया जा सकेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक होने के साथ-साथ चौथा सबसे बड़ा रिफाइनिंग केंद्र और पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सस्ते रूसी कच्चे तेल को खरीदकर उसे परिष्कृत किया और कई देशों को पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में निर्यात किया।
विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरी स्थिति ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है और उसे नजरअंदाज करना अब किसी भी बड़े देश के लिए आसान नहीं है।

