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जहाँ अक्षर बोलते हैं: पुस्तकों के साथ मनुष्य का रिश्ता

रेखा पाण्डेय (लिपि)

किताबें या पुस्तकें जिन्हें हम सभी पढ़ते हैं। बचपन में जब हमने बोलना सीखा, तब से ही माँ सिखाती वर्णमाला और बारह खड़ी गीतों की तरह, और हम सुनते लोरियों की तरह, अ अनार का, आ आम का, क में बड़ी ई की मात्रा की। कभी ए फार एप्पल, कभी एक दो तीन चार, कभी वन टू थ्री। सबने सुना और दोहराया होगा।

पढ़ना-लिखना नहीं आता था, तब किताबों में चित्रों को बहुत मन लगाकर, ध्यान से देखते, फूल, पत्तियां, चिड़िया, हाथी, गाय, गाड़ी वगैरह। अक्षरों से बनी लिखावट कोई डिजाइन या चित्रों की भांति दिखती थी। जब कोई पुस्तक पढ़ता, तो बड़े ध्यान से उनके मुख को देखते कि पुस्तक कैसे पढ़ रहे हैं? पढ़ना-लिखना नहीं आता था, तब लगता कि पुस्तकें बोलती कैसे हैं?

जब हम शाला में पढ़ने गए, तो हमारे हाथों में सुंदर चित्रों वाली किताबें आईं और शिक्षकों ने विधिवत हमें पढ़ना-लिखना सिखाया। जब स्वयं देखा-सुना, समझा और पढ़ा, तब जाना कि अक्षर कैसे बोलते हैं। तभी तो कहा जाता है-‘पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब’।

अक्षरों का ज्ञान मानव जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है। मानव जीवन के विकास के साथ-साथ ध्वनि, चित्रों और संकेतों के साथ धीरे-धीरे अक्षरों का भी विकास हुआ। इस प्रकार अक्षर से शब्द और शब्दों से वाक्य बने, जिन्हें हम लिपि के रूप में जानते हैं, जैसे ब्राह्मी लिपि, देवनागरी लिपि इत्यादि।

विभिन्न ग्रंथों, पुस्तकों में, अखबार, पत्र-पत्रिकाओं में, यहां तक कि जगह-जगह पोस्टरों, दीवारों पर लिखे तरह-तरह के विज्ञापनों में, छोटे-बड़े वस्तुओं की पैकिंग में—कोई भी स्थान नहीं, जहां छोटे-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ न मिलता हो। ये तो केवल लिखे हुए हैं, पर हम उनका उच्चारण करते हैं, अर्थात पढ़ते हैं, तो उसका अर्थ भी समझ जाते हैं और संदेश या बातें हम तक पहुंच जाती हैं। किंतु केवल साक्षर व्यक्ति ही इसे करता है। निरक्षर व्यक्ति के लिए वह केवल आड़ी-टेढ़ी लकीरें हैं।

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बिना अक्षरों के दुनिया अधूरी है। चित्रकार का चित्र हो या शिल्पकार की शिल्पकला, सभी का वर्णन बोलकर या लिखकर ही होता है। जो बोलते हैं, वह अक्षरों का ही समूह होता है, जो शब्दों के रूप में अभिव्यक्त किए जाते हैं।

अक्षर बहुत शक्तिशाली होते हैं। आपस में जुड़कर समस्त ज्ञान हमें देते हैं और सारे संसार को चला रहे हैं। सभी क्षेत्रों में इन्हीं से बनी पुस्तकें मार्गदर्शन करती हैं। समस्याओं का प्रश्न और उत्तर—सब कुछ इन्हीं अक्षरों से बने वाक्यों में ही होता है। धर्मग्रंथ हों या विद्यालय में पढ़ाई जाने वाली किताबें, हर विषय की किताबों से संसार भरा हुआ है, जिसे पढ़कर ही सभी डिग्रियां प्राप्त कर उच्च पद पर पहुंचते हैं।

यदि पढ़ने की बात करें, तो उच्चारण हम हिंदी में करते हैं। अंग्रेजी पढ़ते हैं, तो उच्चारण हिंदी में ही होता है। स्पेलिंग भले ही अंग्रेजी के अक्षरों को जोड़कर बनती है, किंतु उच्चारण तो हिंदी में ही करते हैं। सभी भाषाओं की अपनी वर्णमाला होती है, उसी के अनुरूप लेखन कार्य किया जाता है, परंतु उसे बोलने में हिन्दी की प्रतिध्वनि ही सुनाई देती है। अर्थ चाहे जो हो, जिसे हम समझ नहीं पा रहे, परंतु हम हिंदी के शब्द ही उच्चारण में पाते हैं।

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कारण यह है कि हमारी वर्णमाला में वर्णों के उच्चारण का नियत स्थान है। मुख के दांत, ओठ, जीभ, तालू और कंठ से उच्चरित किया जाता है। प्रत्येक बोली भाषा में इन्हीं अंगों से बोला जाता है।

हमारे ग्रंथों, वेद-पुराणों में अथाह ज्ञान छिपा है। महान लेखकों, वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, पुरातत्वविदों, इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों, राजनीतिक विचारकों इत्यादि सभी ने इन्हीं अक्षरों को जोड़कर विभिन्न भाषाओं में लिखा है, जिन्हें युगों-युगों तक पढ़ा जा रहा है और कल भी पुस्तकों में लिखी गई बातों को पढ़कर ज्ञान प्राप्त किया जाएगा। इन्हीं से सीखकर अपने अनुभवों को जोड़कर कुछ नया ज्ञान प्राप्त होगा, जिसे पुनः इन्हीं पुस्तकों में नए कलेवर के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।

अक्षरों से बने शब्दों में निर्माण और विनाश दोनों ही समाहित हैं। इसलिए इनके उपयोग में अत्यधिक सावधानी रखनी चाहिए, अन्यथा अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगेगी।

भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है और ध्वनि संगठित होकर अक्षर के रूप में प्रस्तुत होती है। ध्वनियों द्वारा बोलकर, अक्षरों द्वारा लिखकर विचारों और भावों को व्यक्त किया जाता है। मानव जीवन में अक्षरों का महत्वपूर्ण स्थान है। बिना इनके विकास असंभव था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अक्षर केवल पढ़ने–लिखने का साधन नहीं हैं, बल्कि मानव सभ्यता की रीढ़ हैं। बचपन की लोरियों से लेकर जीवन के गंभीर निर्णयों तक, अक्षर हर मोड़ पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इन्हीं अक्षरों के सहारे मनुष्य ने अपने अनुभवों को सहेजा, ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया और अज्ञान से ज्ञान की ओर यात्रा की। पुस्तकें मौन होकर भी बोलती हैं, प्रश्न करती हैं और उत्तर भी देती हैं। वे समय की सीमाओं को लांघकर अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ती हैं।

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अक्षरों की शक्ति इतनी गहन है कि वे समाज का निर्माण भी कर सकते हैं और उसे विनाश की ओर भी ले जा सकते हैं। इसलिए उनका उपयोग विवेक, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व के साथ किया जाना चाहिए। जब हम शब्दों का चयन सोच-समझकर करते हैं, तब वही शब्द प्रेरणा बनते हैं, मार्गदर्शक बनते हैं और परिवर्तन का आधार बनते हैं।

आज के डिजिटल युग में भी अक्षरों का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि उनका स्वरूप बदला है। स्क्रीन पर उभरते अक्षर भी उतने ही प्रभावशाली हैं जितने कभी कागज पर लिखे शब्द थे। इसलिए यह आवश्यक है कि हम पुस्तकों से अपना संबंध बनाए रखें, पढ़ने की आदत को जीवित रखें और आने वाली पीढ़ियों को भी अक्षरों के इस अमूल्य संसार से परिचित कराएँ। वास्तव में, अक्षरों के बिना मानव विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती। अक्षर हैं तो विचार हैं, विचार हैं तो सृजन है और सृजन है तो जीवन निरंतर आगे बढ़ता रहता है।

लेखिका साहित्यकार एवं हिन्दी व्याख्याता हैं।