सरदार पोस्ट से बस्तर तक केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल का शौर्य : 9 अप्रैल पराक्रम दिवस

केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की स्थापना 27 जुलाई 1939 को क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस के रूप में हुई थी। स्वतंत्र भारत में यह बल 18 दिसंबर 1949 को संसद अधिनियम द्वारा केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल नाम से जाना जाने लगा। आज यह देश की सबसे बड़ी अर्धसैनिक बल इकाई है जो आंतरिक सुरक्षा की रक्षा में निरंतर तैनात रहती है। लेकिन 9 अप्रैल का दिन इस बल के लिए विशेष महत्व रखता है। इसे पराक्रम दिवस या शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस उन बहादुर जवानों की याद दिलाता है जिन्होंने 1965 में गुजरात के कच्छ के रण में सरदार पोस्ट पर पाकिस्तानी ब्रिगेड के हमले को मात्र दो कंपनियों की ताकत से विफल कर दिया। इस युद्ध में वे 6 जवान शहीद हुए लेकिन उनकी वीरता ने पूरे बल को प्रेरणा दी और देश की सीमाओं की रक्षा का नया अध्याय लिखा।
पराक्रम दिवस की कहानी शुरू होती है उस रेगिस्तानी इलाके से जहां रण की मिट्टी गर्म हवाओं और नमक के मैदानों से भरी थी। 9 अप्रैल 1965 की सुबह जब सूरज उगा तो सरदार पोस्ट पर तैनात केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की दूसरी बटालियन की दो कंपनियां लगभग 300 जवानों की संख्या में थीं। उनके सामने पाकिस्तानी सेना की इक्यावनवीं ब्रिगेड थी जिसमें लगभग 3500 सैनिक थे। आधुनिक हथियारों से लैस यह ब्रिगेड सरदार पोस्ट पर कब्जा करने के उद्देश्य से हमला करने आई थी। लेकिन भारतीय जवानों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए ऐसा प्रतिरोध किया कि दुश्मन को पीछे हटना पड़ा। उन्होंने 34 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और 4 को जीवित गिरफ्तार किया। इस संघर्ष में 6 भारतीय जवान शहीद हुए। इतिहास में शायद ही कभी इतनी छोटी टुकड़ी ने पूर्ण ब्रिगेड स्तर के हमले को इतनी देर तक रोका हो।
उस दिन की घटना को याद करते हुए लगता है कि कैसे सामान्य से सामान्य जवान अचानक वीर बन जाते हैं जब देश की पुकार उन्हें छू जाती है। सरदार पोस्ट एक सपाट इलाका था जहां रणनीतिक रूप से लाभ दुश्मन के पास था। पाकिस्तानी सेना ने तोपखाने और मोर्टार की मदद से हमला शुरू किया। लेकिन केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान अपनी पोस्ट पर डटे रहे। गोलीबारी लगभग 12 घंटे तक चली। गोला बारूद की कमी होने पर भी उन्होंने अपनी जगह नहीं छोड़ी। एक वीर जवान कांस्टेबल शमशेर सिंह ने दुश्मन की आग में घुसकर अपनी राइफल से कई हमलावरों को रोका। लांस नायक किशोर सिंह ने अपने साथियों को प्रोत्साहित करते हुए आगे बढ़ाया। कांस्टेबल ज्ञान सिंह ने घायल होने के बावजूद अपनी मशीन गन पर कब्जा नहीं छोड़ा। लांस नायक गणपत राम ने दुश्मन के एक अधिकारी को निशाना बनाकर मार गिराया। कांस्टेबल हरि राम और कांस्टेबल सिंधवीर प्रधान ने अंतिम सांस तक लड़ते हुए अपनी ड्यूटी निभाई। इन 6 शहीदों ने अपनी जान देकर साबित कर दिया कि कर्तव्य पालन से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
इस युद्ध में एक और नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हवलदार किशन सिंह जो आज भी जीवित हैं और उस युद्ध के एकमात्र जीवित नायक माने जाते हैं। उन्होंने गोला बारूद की कमी महसूस होते ही जिप्सी में दुश्मन की आग के बीच सैकड़ों गज दूरी तय करके बारूद पहुंचाया। तीन बार उन्होंने यह जोखिम भरा सफर किया। उनकी बहादुरी के कारण पोस्ट पर तैनात जवानों का मनोबल बना रहा। बाद में उन्हें राष्ट्रपति बहादुरी पदक से सम्मानित किया गया। ऐसी कहानियां बताती हैं कि वीरता केवल हथियारों से नहीं बल्कि हृदय की लगन से पैदा होती है। किशन सिंह जैसे जवानों ने परिवार से दूर रहकर भी मां भारत की सेवा को अपना सर्वोच्च धर्म माना।
इस पराक्रम दिवस को मनाने का उद्देश्य केवल याद करना नहीं बल्कि उन भावनाओं को जीवंत रखना है जो इन जवानों के मन में थीं। कल्पना कीजिए उन जवानों की जिनके घर में मां बाप इंतजार कर रहे थे। पत्नी बच्चे की चिंता में रातें जाग रही थी। लेकिन जब ड्यूटी का समय आया तो उन्होंने बिना एक पल सोचे आगे बढ़ गए। यह मानवीय पहलू है जो इस दिवस को केवल तथ्यात्मक घटना से ऊपर उठाता है। हर शहीद के पीछे एक परिवार होता है जो आज भी गर्व के साथ आंसू पोछता है। शहीदों की पत्नियां जो विधवा हो गईं उन्होंने बच्चों को पाला और उन्हें देशभक्ति सिखाई। उनके बच्चे आज भी अपने पिता की वीरता की कहानियां सुनकर बड़े होते हैं। यह बलिदान की श्रृंखला है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है।
केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की भूमिका केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह बल देश के अंदर आतंकवाद नक्सलवाद और सांप्रदायिक अशांति से निपटने में हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहा है। चुनाव ड्यूटी आपदा राहत और कानून व्यवस्था बनाए रखने में इसके जवानों ने अपनी जान की परवाह नहीं की। पराक्रम दिवस इन्हीं सभी बलिदानों का प्रतीक बन गया है। हर वर्ष इस दिन बल के सभी इकाइयों में शहीद स्मारकों पर माल्यार्पण किया जाता है। शपथ ली जाती है कि देश की सेवा में कोई कमी नहीं आएगी। वरिष्ठ अधिकारी भाषण देते हैं और नए भर्ती हुए जवानों को प्रेरणा देते हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर विशेष कार्यक्रम आयोजित होते हैं जहां महानिदेशक स्वयं शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सरदार पोस्ट पर भी हर वर्ष तीर्थ यात्रा जैसा माहौल बनता है। वहां की मिट्टी अब भी वीरता की गंध लिए हुए है।
इस दिवस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह साबित करता है कि पुलिस बल भी सेना की तरह देश की रक्षा कर सकता है। उस समय सीमा सुरक्षा बल की स्थापना नहीं हुई थी इसलिए केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल को सीमा पर तैनात किया गया था। उनके इस साहस ने बाद में सीमा सुरक्षा बल के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। लेकिन मूल श्रेय उन जवानों को जाता है जिन्होंने बिना नियमित सेना के समर्थन के दुश्मन को रोका। यह घटना भारतीय सैन्य इतिहास में एक अनोखा उदाहरण है जहां अर्धसैनिक बल ने पूर्ण सैन्य ब्रिगेड को पराजित किया।
मानवीय दृष्टि से देखें तो यह दिवस हमें सिखाता है कि सच्चा पराक्रम अकेले व्यक्ति का नहीं बल्कि सामूहिक संकल्प का होता है। हर जवान ने अपने साथी की पीठ थपथपाई। घायल साथी को सहारा दिया। कमांडर ने बिना हिचकिचाहट के आदेश दिए। यह टीम भावना ही थी जिसने असंभव को संभव बनाया। आज के युवा जो इस बल में भर्ती होते हैं उन्हें इन कहानियों से सीख मिलती है कि डर को कैसे जीतना है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सरदार पोस्ट की घटना सुनाई जाती है ताकि उनका मनोबल मजबूत रहे।
लेकिन पराक्रम दिवस की वीरता की गाथा केवल1965 तक सीमित नहीं है। यह बल की उस अथक लड़ाई को भी समेटे हुए है जो छत्तीसगढ़ के बस्तर के घने जंगलों में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ी जा रही है। बस्तर का पराक्रम केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की आधुनिक वीरता का जीवंत उदाहरण है। यहां के सघन वनों में जहां सूरज की किरणें भी मुश्किल से पहुंचती हैं वहां केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की कोबरा यूनिट और अन्य बटालियनों ने वर्षों से नक्सलियों के विरुद्ध अभियान चलाए। इन जंगलों में जवानों ने न केवल दुश्मन से लड़ाई लड़ी बल्कि अपनी जान की परवाह किए बिना स्थानीय आदिवासी भाई बहनों का विश्वास जीता। हर घात लगाए हुए नक्सली हमले में उन्होंने डटकर मुकाबला किया।
बस्तर के पराक्रम की एक यादगार घटना 6 अप्रैल 2010 की है। तदमेतला इलाके में नक्सलियों के 500 से अधिक भारी हथियारबंद हमलावरों ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की टुकड़ी पर घात लगाया। इस हमले में 76 जवान शहीद हुए। वे जवान घने जंगलों में ऑपरेशन पर निकले थे जब अचानक चारों तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई। लेकिन उन्होंने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी। उनकी बहादुरी ने न केवल दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया बल्कि पूरे बल को नई प्रेरणा दी। इन शहीदों की कुर्बानी के बाद भी केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
वर्षों की निरंतर कार्रवाइयों में सैकड़ों जवानों ने अपनी जान गंवाई। कोबरा बटालियनों ने 2009 से अब तक 39 से अधिक ऑपरेशन किए जिनमें सैकड़ों नक्सली मारे गए और हजारों ने आत्मसमर्पण किया। इन बलिदानों की बदौलत आज बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद का लगभग उन्मूलन हो चुका है। 2025-26 के अभियानों में शीर्ष नक्सली नेताओं सहित सैकड़ों नक्सली समाप्त किए गए। जहां एक समय पूरा बस्तर नक्सली गढ़ था वहां आज शांति की किरणें दिख रही हैं। यह उन्मूलन सैकड़ों जवानों के बलिदान की कीमत पर संभव हुआ है जिन्होंने जंगल की लड़ाई में परिवार को पीछे छोड़कर देश की सेवा को चुना।
पराक्रम दिवस केवल यादगार नहीं बल्कि प्रेरणा का स्रोत भी है। हर वर्ष इस दिन वीरता पुरस्कार दिए जाते हैं। बल के उन कर्मियों को सम्मानित किया जाता है जिन्होंने असाधारण साहस दिखाया। यह पुरस्कार शहीदों की याद में और भी अर्थपूर्ण हो जाते हैं। परिवारों को आमंत्रित किया जाता है ताकि वे महसूस करें कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। शहीदों की विधवाओं को आर्थिक सहायता और सम्मान दिया जाता है। बच्चों को शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाते हैं। यह मानवीय संवेदना का उदाहरण है जो बल को परिवार जैसा बनाता है।
आज के समय में जब देश की सुरक्षा चुनौतियां बदल रही हैं तब भी केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल उसी परंपरा को निभा रहा है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाकर वे जंगल की लड़ाई लड़ते हैं। आतंकवाद प्रभावित घाटियों में तैनात रहकर वे शांति स्थापित करते हैं। आपदा के समय वे सबसे पहले पहुंचते हैं। हर चुनौती में वे उसी सरदार पोस्ट वाले जज्बे को दोहराते हैं। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि सुरक्षा बल के जवान केवल नौकरी नहीं करते बल्कि जीवन जीते हैं। उनका हर पल देश के नाम होता है।
9 अप्रैल पराक्रम दिवस केवल एक तारीख नहीं बल्कि भावना है। यह उन अनगिनत परिवारों की पीड़ा और गर्व की कहानी है जिन्होंने अपने प्रियजन खोए लेकिन देश को बचाया। यह उन जवानों का संदेश है जो आज भी सीमाओं पर और बस्तर के जंगलों में डटे हुए हैं। हर भारतीय नागरिक को इस दिवस पर उन शहीदों को नमन करना चाहिए। उनके बलिदान को याद करना चाहिए। क्योंकि उनकी वीरता ने ही हमें आजादी और सुरक्षा का वरदान दिया है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल का यह पराक्रम हमेशा अमर रहेगा।
