चैती छठ और भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजन की परंपरा

भारतीय संस्कृति की जड़ें प्रकृति पूजन की प्राचीन परंपरा में गहरी बस चुकी हैं जहां सूर्य जल पृथ्वी वन और वायु जैसे तत्वों को देवता मानकर उनकी आराधना की जाती रही है। चैती छठ इस परंपरा का जीवंत और शुद्धतम रूप है जो वैदिक काल से चली आ रही सूर्योपासना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है और इसमें कोई मूर्ति पूजा नहीं बल्कि सूर्य को सीधे अर्घ्य देना नदियों में खड़े होकर पूजा करना और फलों अनाज तथा पौधों के उपहार चढ़ाना होता है।
चैती छठ और भारतीय संस्कृति की प्रकृति पूजन परंपरा एक ही धारा हैं क्योंकि दोनों में दिव्यता प्रकृति के प्रत्यक्ष तत्वों में देखी जाती है दोनों में वेदों की शिक्षाएं जीवित हैं और दोनों मनुष्य को पर्यावरण संरक्षण तथा शुद्धता का संदेश देते हैं। जहां वैदिक ऋषि सूर्य को जीवन का आधार मानते थे वहीं चैती छठ में व्रती सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय नदी किनारे खड़े होकर उसी भाव से अर्घ्य देते हैं। यह एकता इतनी गहरी है कि चैती छठ को अलग मानना भारतीय संस्कृति की अखंडता को न समझने जैसा है।
वैदिक काल में सूर्य पूजन की परंपरा ऋग्वेद के सूक्तों में स्पष्ट रूप से मिलती है जहां सूर्य को विश्व का नेत्र और प्राण का स्रोत कहा गया है। ऋग्वेद में सूर्य सूक्तों में मंत्र हैं जैसे ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् जो गायत्री मंत्र के रूप में आज भी जपा जाता है। इसका अर्थ है हम सविता देव के उस श्रेष्ठ भर्ग का ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे। यह मंत्र सूर्य को ऊर्जा और ज्ञान का स्रोत मानता है ठीक वैसे ही जैसे चैती छठ में व्रती सूर्य की किरणों से स्वास्थ्य और समृद्धि मांगते हैं। वैदिक लोग सूर्य को प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल अर्घ्य देते थे और जल से ही पूजा करते थे बिना किसी मंदिर या मूर्ति के।
चैती छठ की यह विशेषता है कि इसमें भी ठीक यही वैदिक विधि अपनाई जाती है जहां व्रती घुटनों तक पानी में खड़े होकर सूर्य को जल दूध और फलों का अर्घ्य चढ़ाते हैं। अथर्ववेद में भी सूर्य को रोग नाशक और जीवनदाता बताया गया है जो चैती छठ के व्रत के उद्देश्य से मेल खाता है जहां व्रत से स्वास्थ्य और संतान सुख की कामना की जाती है। इस प्रकार चैती छठ वैदिक सूर्योपासना का प्रत्यक्ष विस्तार है जो प्रकृति पूजन की मूल भावना को जीवित रखता है।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजन की परंपरा केवल सूर्य तक सीमित नहीं बल्कि जल पृथ्वी और वनस्पतियों को भी समाहित करती है। चैती छठ में नदियों या तालाबों का महत्व सर्वोपरि है क्योंकि व्रती पूरे चार दिनों तक जल तत्व की शुद्धता में रहते हैं। पहला दिन नहाय खाय में व्रती शुद्ध जल से स्नान करते हैं और शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं जो पृथ्वी की उपज से प्राप्त होता है। दूसरा दिन खरना में खीर और गुड़ का प्रसाद चढ़ाया जाता है जो गन्ने की मिठास और चावल की उपज से बनता है। यह सब प्रकृति के उपहार हैं जो वैदिक भूमि सूक्त की याद दिलाते हैं जहां पृथ्वी को माता कहा गया है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य में व्रती नदी किनारे खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और चौथे दिन उषा अर्घ्य में उगते सूर्य को।
इन अनुष्ठानों में कोई मूर्ति नहीं होती बल्कि सूर्य जल और आकाश सीधे पूजे जाते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे वैदिक यज्ञों में अग्नि और वायु को प्रत्यक्ष देवता माना जाता था। पौराणिक काल में यह परंपरा और समृद्ध हुई जहां ब्रह्मवैवर्त पुराण में छठी मैया की कथा मिलती है जो सूर्य की बहन या शक्ति रूप बताई गई हैं। पुराण के अनुसार राजा प्रियव्रत के मृत पुत्र को छठी मैया के वरदान से जीवन मिला और तब से यह व्रत प्रचलित हुआ। यह कथा प्रकृति की ममता को दर्शाती है जहां छठी मैया संतान और स्वास्थ्य की रक्षक हैं ठीक वैसे ही जैसे भारतीय संस्कृति में नदियों को माता गंगा या यमुना कहा जाता है।
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में चैती छठ की जड़ें स्पष्ट दिखती हैं जो इसे प्रकृति पूजन की अटूट परंपरा से जोड़ती हैं। रामायण में सीता ने छठ व्रत किया था जब वे राम के साथ अयोध्या लौटीं और सूर्य की उपासना से मातृत्व का सुख प्राप्त किया। यह उदाहरण दिखाता है कि चैती छठ केवल सूर्य पूजा नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आभार का व्रत है जहां जल और सूर्य की कृपा से जीवन फलता फूलता है। महाभारत में कर्ण जो सूर्य का पुत्र था ने प्रतिदिन जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया और इससे उसे शक्ति और उदारता प्राप्त हुई।
कुन्ती और द्रौपदी ने भी संकट काल में छठ व्रत रखा और इससे परिवार की रक्षा हुई। ये कथाएं चैती छठ को भारतीय संस्कृति की प्रकृति पूजन परंपरा से जोड़ती हैं क्योंकि महाकाव्यों में भी सूर्य को प्रकृति का प्रत्यक्ष रूप माना गया है जो जीवन चक्र को संचालित करता है। स्कंद पुराण और काशी खंड में भी छठ पूजा की शुरुआत वाराणसी से बताई गई है जहां सूर्य मंदिरों और नदी किनारे पूजा का प्रचलन हुआ। इस प्रकार चैती छठ पौराणिक कथाओं का जीवंत रूप है जो वैदिक प्रकृति पूजन को दैनिक जीवन में उतारती है।
चैती छठ के अनुष्ठानों में प्रकृति पूजन की गहराई और अधिक उजागर होती है। व्रत की शुद्धता के लिए कोई प्याज लहसुन नहीं खाया जाता और सभी प्रसाद जैसे ठेकुआ चावल का लड्डू और फल पृथ्वी की उपज से बनाए जाते हैं। गन्ने की पांच डंडियों से बने चंदोवा पांच महाभूतों पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश का प्रतीक हैं जो वैदिक दर्शन का मूल है। व्रती बांस की टोकरी में फल अनाज और फूल रखकर नदी ले जाते हैं जहां गोबर से मंडल बनाकर दीप जलाए जाते हैं। यह सब प्रकृति के तत्वों का सम्मान है जहां गोबर पृथ्वी का उपहार है फूल वनस्पतियों के और जल नदियों का।
भारतीय संस्कृति में भी यही परंपरा है जहां वैदिक भूमि सूक्त में पृथ्वी को औषधियों और फसलों का भंडार कहा गया है और अथर्ववेद में ओषधि सूक्त में पौधों को माता माना गया है। चैती छठ में व्रती ३६ घंटे का निर्जल व्रत रखते हैं जो प्रकृति की शक्ति के प्रति समर्पण दर्शाता है। संध्या अर्घ्य में डूबते सूर्य को और उषा अर्घ्य में उगते सूर्य को जल से अर्घ्य देना वायु और जल तत्व की पूजा है। यह विधि ठीक वैदिक सूर्य स्नान और अर्घ्य से मेल खाती है जहां ऋषि कहते थे कि सूर्य की किरणें अमृत समान हैं।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजन की परंपरा चैती छठ के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है। व्रत के दौरान नदियों को शुद्ध रखा जाता है कोई कचरा नहीं फेंका जाता और फसलें जैसे गेहूं और चावल का सम्मान किया जाता है। यह वैदिक युग की उस भावना से जुड़ा है जहां यज्ञ में प्रकृति की रक्षा की जाती थी। पौराणिक ग्रंथों में गंगा को सूर्य से जोड़ा गया है क्योंकि सूर्य की किरणें जल को शुद्ध करती हैं ठीक वैसे ही चैती छठ में गंगा या स्थानीय नदियों में पूजा होती है।
बिहार उत्तर प्रदेश झारखंड और नेपाल के मैथिल क्षेत्रों में चैती छठ बड़े उत्साह से मनाया जाता है जहां लाखों व्रती नदियों किनारे एकत्र होते हैं और सामूहिक रूप से प्रकृति की आराधना करते हैं। यह एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता है जहां परिवार की महिलाएं मुख्य व्रती होती हैं और पुरुष सहयोग करते हैं जो प्रकृति की ममता और पिता दोनों रूपों को दर्शाता है। चैती छठ में छठी मैया को पूजा जाता है जो ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवी पार्वती का छठा रूप या सूर्य की बहन बताई गई हैं। यह देवी संतान और स्वास्थ्य की रक्षक हैं जो प्रकृति की शक्ति का प्रतीक हैं।
चैती छठ को भारतीय संस्कृति की प्रकृति पूजन परंपरा से अलग बताना गलत होगा क्योंकि दोनों में एक ही सत्य निहित है। वैदिक काल में जहां सूर्य को द्यौ का पुत्र कहा गया है वहीं चैती छठ में सूर्य को जीवन का आधार माना जाता है। जहां पुराणों में नदियों को देवी रूप दिया गया है वहीं चैती छठ में नदी जल को पवित्र मानकर पूजा की जाती है। उदाहरण के लिए मकर संक्रांति में सूर्य पूजा होती है जो चैती छठ से मेल खाती है और बसंत पंचमी में वसंत ऋतु की पूजा प्रकृति के फूलों से होती है। छठ में भी फूल और फल चढ़ाए जाते हैं।
रामायण में वनवास के दौरान राम सीता ने प्रकृति से प्रेम किया और छठ व्रत किया जो दिखाता है कि यह पर्व वन और नदी दोनों को जोड़ता है। महाभारत में पांडवों के संकट में छठ व्रत ने उन्हें शक्ति दी ठीक वैसी ही शक्ति जो वैदिक इंद्र और सूर्य से मिलती थी। आज भी चैती छठ में गीत गाए जाते हैं जो सूर्य की महिमा गाते हैं जैसे हे सूर्य देवता तुम्हारी किरणें हमें आशीर्वाद दो। ये गीत वैदिक स्तुतियों की लोक भाषा हैं।
इस पर्व की वैज्ञानिकता भी प्रकृति पूजन की परंपरा से जुड़ी है। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय यूवी किरणों के लिए आदर्श होता है जो स्वास्थ्य बढ़ाता है। जल में खड़े होकर अर्घ्य देना शरीर को ठंडक देता है और व्रत विषाक्त पदार्थों को निकालता है। यह वैदिक आयुर्वेद की शिक्षाओं से मेल खाता है जहां सूर्य स्नान को औषधि माना गया। चैती छठ में कोई प्रदूषण नहीं होता बल्कि प्रकृति का सम्मान होता है जो भारतीय संस्कृति की सतत विकास की भावना है। झारखंड और बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में चैती छठ के बाद फसलें अच्छी होती हैं क्योंकि व्रत से मन शुद्ध होता है और प्रकृति कृपा देती है। यह पर्व महिलाओं को विशेष शक्ति देता है जो प्रकृति की ममता का प्रतीक है।
चैती छठ के प्रसार में भी भारतीय संस्कृति की एकता दिखती है। शुरू में यह मैथिल और भोजपुरी क्षेत्रों में प्रचलित था पर अब पूरे देश में फैल गया है जहां लोग प्रकृति पूजन के रूप में इसे अपनाते हैं। काशी खंड में वर्णित है कि गहड़वाल वंश ने वाराणसी से इसकी शुरुआत की और फिर पूरे भारत में फैलाई। आज दिल्ली मुंबई और विदेशों में भी बिहारी समुदाय चैती छठ मनाता है जो दिखाता है कि यह परंपरा सीमाओं से परे है। प्रकृति पूजन की दृष्टि से चैती छठ अन्य त्योहारों से अलग है क्योंकि इसमें मंदिर नहीं नदियां और खुले आकाश हैं। यह वैदिक युग की सरलता को लौटाता है जहां ऋषि जंगलों और नदियों में पूजा करते थे।
अंत में कहा जा सकता है कि चैती छठ भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजन की परंपरा का सबसे शुद्ध और प्राचीन रूप है। दोनों एक ही हैं क्योंकि दोनों में सूर्य जल पृथ्वी और वनस्पतियों की आराधना है दोनों में वैदिक मंत्रों की भावना है और दोनों मनुष्य को प्रकृति का पुत्र मानते हैं। रामायण महाभारत पुराण और वेदों के संदर्भ इसे प्रमाणित करते हैं। चैती छठ मनाने से न केवल स्वास्थ्य मिलता है बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ाव भी। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति देवी है और उसकी पूजा से जीवन संतुलित होता है।
जहां वैदिक ऋषि कहते थे कि सूर्य सबको प्रकाश देता है वहीं चैती छठ के व्रती कहते हैं कि सूर्य हमारी आस्था का केंद्र है। इस एकता में भारतीय संस्कृति की महानता छिपी है जो सदियों से प्रकृति को केंद्र में रखकर जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। चैती छठ मनाकर हम न केवल सूर्य की पूजा करते हैं बल्कि पूरी प्रकृति की आराधना करते हैं जो भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप है। इस प्रवाह में कोई विभेद नहीं बल्कि निरंतर सामंजस्य है जो हमें एकजुट और प्रकृति के प्रति उत्तरदायी बनाता है।
