प्रेम के वसंत का दिव्य उत्सव फुलेरा दूज

कल्पना कीजिए एक ऐसी सुबह की जब आकाश में हल्की सुनहरी धूप तैर रही हो। यमुना के किनारे ओस से भीगे फूल चमक रहे हों। हवा में गुलाब और गेंदे की मिली जुली सुगंध बह रही हो। दूर मंदिरों से रासिया की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही हो। वातावरण में भक्ति है। वातावरण में प्रेम है। यही वह क्षण है जहां से फुलेरा दूज का उत्सव आरंभ होता है।
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया। यह तिथि साधारण नहीं है। यह प्रेम के वसंत का पहला स्पर्श है। यह वह दिन है जब ब्रज भूमि में फूलों की होली खेली जाती है। यह वह दिन है जब राधा और कृष्ण के दिव्य मिलन की स्मृति जीवंत होती है। ब्रज की धरती इस दिन सचमुच मुस्कुराती है।
फुलेरा शब्द अपने भीतर ही अर्थ समेटे है। इसका अर्थ है फूलों से भरा हुआ। दूज का अर्थ है द्वितीया। फूल यहां केवल सजावट नहीं हैं। वे भाव हैं। वे संदेश हैं। वे प्रेम की भाषा हैं। फूल क्षणिक होते हैं। पर उनकी सुगंध लंबे समय तक रहती है। ठीक वैसे ही सच्चा प्रेम जीवन के हर कोने को महका देता है।
ब्रज की संस्कृति में राधा और कृष्ण केवल पात्र नहीं हैं। वे आत्मा और परमात्मा के प्रतीक हैं। राधा को भक्ति की पराकाष्ठा माना गया है। कृष्ण को अनंत चेतना का स्वरूप कहा गया है। उनका मिलन केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है। यह जीव और ब्रह्म का संगम है। फुलेरा दूज इसी संगम का उत्सव है।
कथा विरह से शुरू होती है। विरह में पीड़ा है। विरह में प्रतीक्षा है। पौराणिक प्रसंग बताते हैं कि एक समय ऐसा आया जब कृष्ण अपने कर्तव्यों में व्यस्त हो गए। वे वृंदावन से दूर रहे। राधा का मन व्याकुल हुआ। उनके नेत्र नम हो गए। ब्रज की प्रकृति भी जैसे उदास हो गई।
फूल मुरझा गए। पेड़ों की पत्तियां झुक गईं। पक्षियों का संगीत थम गया। यमुना की धारा भी शांत हो गई। गोपियां राधा के साथ बैठीं। वे भी विरह की वेदना में डूबी रहीं। यह दृश्य केवल प्रेम कथा नहीं है। यह मनुष्य जीवन का सत्य है। जब प्रेम दूर होता है तो संसार भी फीका लगता है।
देवर्षि नारद ने यह दशा देखी। वे द्वारका पहुंचे। उन्होंने कृष्ण को ब्रज की स्थिति बताई। कृष्ण का हृदय पिघल गया। वे तुरंत लौटे। जैसे ही वे वृंदावन पहुंचे वातावरण बदल गया। राधा के चेहरे पर मुस्कान आई। फूल खिल उठे। पेड़ हरे हो गए। पक्षी फिर गाने लगे।
कृष्ण ने प्रेम से राधा पर फूल बरसाए। राधा ने भी उत्तर में फूल अर्पित किए। गोपियां और गोप बालक इस आनंद में शामिल हो गए। यह फूलों की पहली होली थी। इसीलिए फुलेरा दूज को फूलों की होली कहा जाता है। यह रंगों से पहले का उत्सव है। यह कोमलता का उत्सव है।
धार्मिक दृष्टि से यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे अबूझ मुहूर्त कहा जाता है। बिना पंचांग देखे भी इस दिन विवाह, गृह प्रवेश या नया कार्य आरंभ किया जा सकता है। विश्वास है कि इस दिन किए गए कार्यों में राधा कृष्ण की कृपा बनी रहती है।
नवविवाहित दंपति इस दिन विशेष पूजा करते हैं। वे एक दूसरे को फूल अर्पित करते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि उनका संबंध भी फूलों की तरह महके। अविवाहित युवा भी मनोकामना लेकर व्रत रखते हैं। वे उचित जीवनसाथी की कामना करते हैं।
पूजा की विधि सरल है। सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। राधा कृष्ण की मूर्ति या चित्र को सजाया जाता है। पीले या सफेद वस्त्र पहनाए जाते हैं। फूलों की माला अर्पित की जाती है। मक्खन मिश्री और फल का भोग लगाया जाता है। दीपक जलाया जाता है। भजन गाए जाते हैं।
ब्रज के मंदिरों में दृश्य अत्यंत अद्भुत होता है। बांके बिहारी मंदिर में हजारों भक्त एकत्र होते हैं। पुजारी फूलों की वर्षा करते हैं। भक्त हाथ जोड़कर उस पुष्प वर्षा में भीगते हैं। यह दृश्य मन को छू लेता है। वृंदावन का राधा वल्लभ मंदिर भी सजीव हो उठता है। बरसाना में लाडली जी का श्रृंगार विशेष रूप से किया जाता है।
फुलेरा दूज वसंत पंचमी और होली के बीच का पुल है। वसंत पंचमी ज्ञान का आरंभ है। फुलेरा दूज प्रेम का विस्तार है। होली रंगों का उत्सव है। इन तीनों के बीच एक आध्यात्मिक क्रम दिखाई देता है। पहले ज्ञान। फिर प्रेम। फिर उत्साह।
सांस्कृतिक दृष्टि से यह पर्व ब्रज की आत्मा है। सूरदास ने अपनी रचनाओं में राधा कृष्ण के फूलों से सजे प्रसंगों का वर्णन किया है। मीरा ने कृष्ण को अपने हृदय का स्वामी कहा। रसखान ने ब्रज की गलियों को धन्य माना। यह सब उसी प्रेम परंपरा की झलक है।
आज के समय में भी यह पर्व प्रासंगिक है। आधुनिक जीवन व्यस्त है। परिवारों में समय की कमी है। रिश्तों में दूरी बढ़ जाती है। ऐसे में यह पर्व याद दिलाता है कि एक छोटा सा फूल भी संबंधों को ताजा कर सकता है। एक छोटी मुस्कान भी विरह मिटा सकती है।
पर्यावरण की दृष्टि से भी यह उत्सव संदेश देता है। फूल प्रकृति का उपहार हैं। उन्हें प्रेम से अर्पित करना प्रकृति के प्रति आभार है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ाव ही जीवन की सुंदरता है। जब हम फूलों से पूजा करते हैं तो हम प्रकृति का सम्मान करते हैं।
ब्रज से बाहर भी यह पर्व फैल रहा है। दिल्ली और जयपुर में मंदिरों में फूलों की होली खेली जाती है। सोशल मीडिया पर वीडियो साझा किए जाते हैं। लोग घरों में छोटे स्तर पर भी यह उत्सव मनाते हैं। इससे परंपरा जीवंत बनी रहती है।
आर्थिक दृष्टि से भी यह पर्व महत्वपूर्ण है। ब्रज में लाखों श्रद्धालु आते हैं। फूल विक्रेता, कारीगर और स्थानीय व्यापारी लाभ पाते हैं। पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। सांस्कृतिक विरासत सशक्त होती है।
दार्शनिक रूप से फुलेरा दूज जीवन का संदेश है। फूल क्षणिक हैं। पर वे अपनी उपस्थिति से वातावरण बदल देते हैं। जीवन भी क्षणभंगुर है। पर प्रेम उसे सार्थक बना देता है। विरह आता है। पर मिलन भी आता है। यही विश्वास भक्ति को जीवंत रखता है।
जब भक्त मंदिर में खड़ा होकर फूल अर्पित करता है तो वह केवल मूर्ति पर नहीं डालता। वह अपने अहंकार को भी त्यागता है। वह अपने मन को कोमल बनाता है। वह अपने भीतर के कृष्ण को पुकारता है। यही इस पर्व का गूढ़ अर्थ है।
फुलेरा दूज हमें सिखाता है कि प्रेम ही अंतिम सत्य है। ज्ञान महत्वपूर्ण है। शक्ति आवश्यक है। पर बिना प्रेम के सब अधूरा है। राधा और कृष्ण का मिलन हमें यही याद दिलाता है कि आत्मा और परमात्मा का संगम प्रेम से ही संभव है।
हर वर्ष जब फाल्गुन की द्वितीया आती है तो ब्रज में फूल खिलते हैं। हवा में सुगंध भर जाती है। मंदिरों में रास गूंजता है। लोग मुस्कुराते हैं। बच्चे दौड़ते हैं। बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं। यह दृश्य केवल उत्सव नहीं है। यह जीवन की पूर्णता है।
फुलेरा दूज कहता है प्रेम करो। खिलो। दूसरों को खिलाओ। विरह में धैर्य रखो। मिलन में आभार रखो। यही इसकी आत्मा है। यही इसकी अमरता है। यही ब्रज का संदेश है।
