रेडियो और लोकतंत्र की वापसी की वह गांव की शाम

ग्रामीण अंचल में आज से चालीस-पचास वर्ष पहले सूचना और मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो था। तब रेडियो भी हर घर में नहीं होता था। धनवान और शौकीन लोगों के पास यह जादू का पिटारा हुआ करता था। लोगों के पास पैसे कम होते थे, इसलिए हर व्यक्ति रेडियो खरीदने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। पहले बिजली से चलने वाले रेडियो थे, फिर बैटरी से चलने वाले ट्रांजिस्टर आ गए और उन्होंने गांव-गांव में अपनी जगह बना ली।
सुबह छह बजे रेडियो स्टेशन शुरू होता। रामचरितमानस की चौपाइयां जब रेडियो पर गूंजतीं, तो लगता था कि दिन शुभ होगा, क्योंकि सुबह-सुबह रामायण का पाठ सुन लिया। इसके बाद भजन प्रसारित होते और फिर समाचार आते। दोपहर की सभा, शाम की सभा और रात तक चलने वाले कार्यक्रम दिनचर्या का हिस्सा थे। समाचार दिन में तीन बार प्रसारित होते थे और इन्हीं के माध्यम से देश-दुनिया में घट रही घटनाओं की जानकारी गांव तक पहुंचती थी। अखबारों की पहुंच सीमित थी, इसलिए सूचना का यह एकमात्र भरोसेमंद साधन था।
रेडियो केवल एक यंत्र नहीं था, वह घर का सदस्य था। उसकी आवाज में गांव की सुबह बसती थी, खेतों की मिट्टी की खुशबू घुली रहती थी और शाम की थकान को हर लेने वाला अपनापन होता था। रेडियो का स्विच घुमाते ही हल्की सी खरखराहट के बाद जब आकाशवाणी की परिचित धुन बजती, तो लगता था जैसे पूरा आकाश छोटे से घर में उतर आया हो। बिजली कभी रहती, कभी चली जाती, लेकिन बैटरी से चलने वाला रेडियो साथ नहीं छोड़ता था।
गांव में कई लोग पढ़े-लिखे नहीं थे, पर रेडियो ने उन्हें ज्ञान दिया। कृषि कार्यक्रमों से नई तकनीकें सीखीं, स्वास्थ्य कार्यक्रमों से साफ-सफाई और टीकाकरण की जानकारी मिली। डॉक्टरों की सलाह सुनकर लोग अपने जीवन में बदलाव लाते। वह चलता-फिरता विद्यालय था, जिसका संबंध हर घर से था।
शाम को खेत या शहर से लौटकर थके हुए लोग आंगन में बैठते और रेडियो पर नाटक या कहानी सुनते। उन कहानियों के पात्र अपने लगते। उनकी हंसी और दुख जीवन से जुड़ा प्रतीत होता। दिन में अधिक सुनने पर पिता जी डांट भी देते। मां कहतीं कि लड़का दिन भर रेडियो सुनता है, बिगड़ जाएगा। फिर भी रेडियो से रिश्ता अटूट रहता।
खेतों की ओर जाते समय भी रेडियो साथ होता। बैलों की घंटियों और पक्षियों की चहचहाहट के बीच वह मौसम का हाल सुनाता। हमारे लिए वही मौसम विभाग था और वही सलाहकार। समाचार बुलेटिन के समय गांव के लोग आंगन में इकट्ठा हो जाते। कोई चारपाई पर बैठता, कोई जमीन पर। चुनाव परिणाम हों, किसी बड़े नेता का संबोधन हो या आपदा की सूचना, सब ध्यान से सुनते।
25 जून 1975 की रात रेडियो ने बताया कि देश में इमरजेंसी घोषित की गई है, जिसे आपातकाल कहा गया। मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए। लोग गिरफ्तार हुए, जेलों में डाले गए। वातावरण में डर था। लोग धीरे बोलते। पान की दुकानों और होटलों पर भी बातचीत सावधानी से होती। हम बच्चे थे और उस भयावह समय की बातें पिता जी से सुनते। अखबारों में सब कुछ स्पष्ट नहीं छपता था। बीबीसी की खबरें विश्वसनीय मानी जाती थीं। रेडियो भी सरकारी सेंसर के दायरे में था, फिर भी वही एकमात्र सहारा था।
मार्च के महीने की बात है, एक दिन मेरा जन्मदिन था। उन दिनों केक नहीं काटे जाते थे। दादी माथे पर रोली का टीका लगातीं, मैं सबको पैलगी करता और लोग आठ आना या एक रुपया आशीर्वाद स्वरूप देते। स्कूल में संतरे या पुदीने की गोलियां बांटी जातीं। 21 मार्च 1977 की शाम भोजन के समय रेडियो चालू किया गया। समाचार आया कि इमरजेंसी समाप्त कर दी गई है। पिता जी ने बताया कि अब चुनाव होंगे। उस समय बचपना था, पर इतना समझ आया कि अब बोलने और घूमने की आजादी लौट आई है। यह भी संयोग था कि मेरे जन्मदिन पर ही आपातकाल समाप्त हुआ। यह दिन जीवन भर नहीं भूला जाएगा।
गांव में लोगों को लगा जैसे सीने पर रखा भारी पत्थर हट गया हो। हवा किसी ने बांध रखी थी, वह हल्की होकर आसमान छूने लगी हो। लोग सड़क पर इकट्ठा हुए। कोई कह रहा था कि अब खुलकर बोल सकेंगे। जिनके परिजन जेल में थे, उन्हें आशा जगी। बुजुर्गों की आंखों में राहत थी, युवाओं के चेहरों पर उत्साह।
आज विश्व रेडियो दिवस पर जब यह सब याद आता है, तो समझ में आता है कि रेडियो ने केवल सूचना नहीं दी, उसने समय का इतिहास सुनाया। उसने आपातकाल की घोषणा भी सुनाई और उसके अंत की खबर भी दी। वह स्मृति आज भी बालमन में अंकित है, समय की धूल भी उसे ढक नहीं सकी।
आज तकनीक ने दुनिया को एक कुटुंब बना दिया है। एक क्लिक में समाचार उपलब्ध हैं। पर उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा होता हैं। ऐसे समय में रेडियो अब भी भरोसे की आवाज बना हुआ है। वह भले बीते जमाने का साधन हो, पर श्रोताओं के दिलों में आज भी जीवंत है।
