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भारत–यूरोपीय यूनियन मुक्त व्यापार समझौता: साझा समृद्धि की ओर ऐतिहासिक कदम

प्रहलाद सबनानी

भारत ने यूरोपीय यूनियन के 27 सदस्य देशों के साथ एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया है। अब इस समझौते की शर्तों को यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों की संसदों द्वारा पारित किया जाएगा। इसके पश्चात यह मुक्त व्यापार समझौता भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच होने वाले विदेशी व्यापार पर लागू हो जाएगा।

इस समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। इसका कारण यह है कि यह मुक्त व्यापार समझौता विश्व के 28 देशों के उस भूभाग पर लागू होने जा रहा है, जहां विश्व की लगभग 30 प्रतिशत आबादी निवास करती है। इस क्षेत्र में 200 करोड़ से अधिक नागरिक रहते हैं। इन 28 देशों की संयुक्त हिस्सेदारी विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 25 प्रतिशत है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी संयुक्त अर्थव्यवस्था यूरोपीय यूनियन, जिसका सकल घरेलू उत्पाद लगभग 22 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है, और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत, जिसका सकल घरेलू उत्पाद लगभग 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है, के बीच यह मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न होने जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर होने वाले कुल विदेशी व्यापार में इन देशों की हिस्सेदारी लगभग 33 प्रतिशत है। पूरी दुनिया में लगभग 33 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी व्यापार होता है, जिसमें से करीब 11 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का व्यापार इन 28 देशों द्वारा किया जाता है। इस दृष्टि से यह समझौता विश्व का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार समझौता माना जा रहा है। इससे पूर्व सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते के रूप में चीन और 10 आसियान देशों के बीच हुए समझौते को जाना जाता था।

यह समझौता केवल एक व्यापारिक करार नहीं है, बल्कि यूरोपीय यूनियन के 27 देशों और भारत के बीच साझा समृद्धि का एक दीर्घकालिक ब्लूप्रिंट है। इसमें वैश्विक आर्थिक परिदृश्य की दिशा और दशा बदलने की क्षमता है। इस समझौते को अंतिम रूप देने के प्रयास पिछले 18 वर्षों से चल रहे थे, किंतु विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इसमें विलंब हुआ। अब इसके सम्पन्न होने को भारत और यूरोपीय यूनियन के संबंधों में एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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इस मुक्त व्यापार समझौते के लागू होने के बाद वर्ष 2032 तक भारत और यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों के बीच विदेशी व्यापार के दोगुना होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इससे पूर्व भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच भी मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न हो चुका है। अब कनाडा के प्रधानमंत्री के मार्च माह में भारत आगमन की संभावना है, और भारत तथा कनाडा के बीच भी कुछ क्षेत्रों में व्यापार समझौता होने की अटकलें हैं।

जहां अमेरिका मुक्त व्यापार समझौतों को रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग कर रहा है, वहीं भारत मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए विभिन्न देशों के साथ ऐसे समझौते कर रहा है, ताकि इनसे भारत सहित अन्य देशों के नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ मिले। यह भारतीय संस्कृति के “वसुधैव कुटुम्बकम” के भाव को भी प्रतिबिंबित करता है। इसी नीति के चलते विश्व के अनेक देश भारत के साथ शीघ्र मुक्त व्यापार समझौते करने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं।

हाल के वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी उथल-पुथल देखने को मिली है। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच सम्पन्न हुआ यह समझौता इस अस्थिरता को कुछ हद तक संतुलित करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

भारत में कृषि और डेयरी क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि देश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हीं पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर है। इसी कारण इन दोनों क्षेत्रों को इस मुक्त व्यापार समझौते से बाहर रखा गया है। इसके विपरीत, समुद्री उत्पाद, वस्त्र और परिधान, जेम्स एवं ज्वेलरी, चमड़ा, खिलौना, केमिकल और फर्नीचर जैसे श्रम आधारित उद्योगों को इस समझौते से अधिकतम लाभ मिलने जा रहा है।

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यूरोपीय यूनियन के सभी 27 देश भारत से इन उत्पादों के आयात पर लगने वाले आयात शुल्क को शून्य कर रहे हैं। वर्तमान में समुद्री उत्पादों पर 26 प्रतिशत, वस्त्र और परिधान पर 12 प्रतिशत, खिलौनों पर 4.7 प्रतिशत, जेम्स एवं ज्वेलरी पर 4 प्रतिशत, केमिकल उत्पादों पर 12.8 प्रतिशत, चमड़ा उत्पादों पर 17 प्रतिशत और फर्नीचर पर 10.7 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाता है, जिसे इस समझौते के लागू होने के बाद समाप्त कर दिया जाएगा।

यूरोपीय यूनियन के देशों में पिछले कई वर्षों से जन्म दर में लगातार गिरावट आ रही है। कुछ देशों में यह लगभग शून्य स्तर तक पहुंच चुकी है, जिससे वहां वृद्ध आबादी तेजी से बढ़ रही है और कार्यशील श्रमबल की भारी कमी उत्पन्न हो गई है। सेवा, तकनीकी, चिकित्सा, निर्माण और अन्य क्षेत्रों में कुशल श्रमिकों का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

इस मुक्त व्यापार समझौते के बाद भारतीय नागरिकों के लिए यूरोपीय यूनियन के 27 देशों में रोजगार के व्यापक अवसर खुलेंगे। वीजा प्रक्रिया को सरल बनाया जाएगा। यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में भारतीय इंजीनियरों और डॉक्टरों की पहले से ही भारी मांग है। साथ ही, भारतीय नागरिकों के परिवार के सदस्यों के लिए भी रोजगार की प्रक्रिया को सुगम बनाया जाएगा। भारतीय विद्यार्थियों को यूरोपीय विश्वविद्यालयों से शिक्षा पूरी करने के बाद 9 से 12 माह तक वहां रहकर रोजगार तलाशने की अनुमति दी जाएगी।

इस समझौते से भारतीय कारीगरों के लिए वैश्विक बाजार के द्वार खुलेंगे। भारत अब एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर सकता है। यूरोपीय यूनियन के देश अपनी पूंजी भारत में निवेश कर सकते हैं और यहां विनिर्माण इकाइयों की स्थापना भी कर सकते हैं। इससे भारत में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और बेरोजगारी की समस्या के समाधान में सहायता मिलेगी।

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भारत सरकार द्वारा मुक्त व्यापार समझौते इस दृष्टि से किए जा रहे हैं कि इनसे किसानों, मजदूरों, कारीगरों, पेशेवर नागरिकों और सूक्ष्म, छोटे एवं मध्यम उद्योगों को प्रत्यक्ष लाभ मिले। यूरोपीय यूनियन के 27 देशों में वस्त्र एवं परिधान बाजार का आकार लगभग 26,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर है। इससे भारत का वस्त्र निर्यात वर्तमान 64,000 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है।

इसी प्रकार, चमड़ा उत्पादों का बाजार लगभग 10,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर और जेम्स एवं ज्वेलरी का बाजार 7,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। इन विशाल बाजारों में भारतीय उत्पादों की पहुंच से देश की श्रम आधारित इकाइयों को बड़ा लाभ मिलने वाला है। समुद्री उत्पाद, खिलौना, केमिकल और फर्नीचर उद्योगों में भी इसी प्रकार की वृद्धि अपेक्षित है। इन सभी क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने का सीधा अर्थ है अधिक श्रमबल की आवश्यकता, जिसकी पूर्ति वर्तमान में भारत सबसे बेहतर ढंग से कर सकता है।

रक्षा क्षेत्र में भारत तीव्र गति से प्रगति कर रहा है और आत्मनिर्भरता इसका प्रमुख लक्ष्य है। दूसरी ओर, अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन ने यूरोपीय देशों को सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर न रहने की सलाह दी है। इसके परिणामस्वरूप यूरोपीय देश अपने रक्षा बजट में वृद्धि पर विचार कर रहे हैं।

ऐसे समय में भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौते का अंतिम रूप लेना भारत के लिए एक सुनहरा अवसर सिद्ध हो सकता है। इससे भारतीय रक्षा कंपनियों को यूरोपीय बाजार मिलेगा और साथ ही उच्च तकनीक के हस्तांतरण की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। कुल मिलाकर, यूरोपीय यूनियन के 27 देशों के साथ यह मुक्त व्यापार समझौता भारत के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होने जा रहा है।