futuredलोक-संस्कृति

तेंदूभाटा में कर्मा नृत्य महोत्सव का आयोजन, लोकनृत्य की थाप पर झूमे कलाकार और दर्शक

रायपुर, 01 फरवरी 2026/ राज्य सरकार के संस्कृति विभाग के सहयोग से लोकमया छत्तीसगढ़ी लोककला मंच द्वारा बेमेतरा जिले के साजा विकासखंड अंतर्गत ग्राम तेंदूभाटा में कर्मा नृत्य महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे आंचलिक नर्तक दलों ने कर्मा नृत्य की आकर्षक प्रस्तुतियों से सैकड़ों दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

वरिष्ठ साहित्यकार एवं लोक संस्कृति विशेषज्ञ डॉ. परदेशी राम वर्मा ने बताया कि राज्य अलंकरण से सम्मानित घनश्याम सिंह ठाकुर इस आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता विषय-विशेषज्ञ डॉ. भुनेश्वर साहू ने की, जबकि पंडवानी गायक महेंद्र चौहान विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया।

महोत्सव में ग्राम तेंदूभाटा के घनश्याम सिंह ठाकुर के कर्मा नर्तक दल ने 20 कलाकारों के साथ मांदर और झाँझ की थाप पर झूमते हुए अत्यंत मनोहारी नृत्य प्रस्तुति दी। इसके पश्चात कबीरधाम जिले के सुहागपुर निवासी राधेश्याम साहू के नेतृत्व में कर्मा नृत्य की प्रस्तुति हुई। ग्राम भाटाटोला की नृत्य मंडली ने भी अपने सशक्त नृत्य प्रदर्शन से दर्शकों की भरपूर सराहना प्राप्त की।

See also  तुरमा गांव में निषाद राज गुह जयंती का भव्य आयोजन: शोभायात्रा, अखंड रामायण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गूंजा अंचल

इस अवसर पर घनश्याम सिंह ठाकुर ने कर्मा नृत्य महोत्सव के आयोजन में सहयोग के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति विभाग और लोकमया लोककला मंच के अध्यक्ष महेश वर्मा सहित सभी प्रतिभागी नर्तक दलों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। डॉ. भुनेश्वर साहू और महेंद्र चौहान ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए लोककला और परंपराओं के संरक्षण पर बल दिया।

24 जनवरी को संपन्न यह महोत्सव तेंदूभाटा सहित आसपास के अनेक गांवों के लिए एक यादगार सांस्कृतिक आयोजन बन गया। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और लोकसंस्कृति प्रेमियों की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।

उल्लेखनीय है कि कर्मा लोकनृत्य छत्तीसगढ़ के आदिवासी और मैदानी अंचलों में अलग-अलग शैलियों में किया जाता है। यह नृत्य मानव जीवन के कर्म से जुड़ा हुआ है। प्रचलित लोककथा के अनुसार, एक बार अकाल पड़ने पर राजा ने करम सैनी वृक्ष की डाली को भूमि में गाड़कर नृत्य किया और हल चलाया, जिससे धरती माता प्रसन्न हुईं। इसी कथा से कर्मा नृत्य की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।

See also  छत्तीसगढ़ में मखाना की खेती बनी किसानों के लिए लाभकारी विकल्प, उत्पादन और प्रसंस्करण को मिल रहा बढ़ावा

यह लोकनृत्य छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति का प्रतीक है। फसल बोने के समय और कटाई के बाद नए अनाज के आगमन पर कर्मा नृत्य किया जाता है। बस्तर और सरगुजा अंचल में कर्मा नृत्य की शैलियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। यह नृत्य दशहरा और दीपावली जैसे पर्वों पर भी किया जाता है। कर्मा नृत्य में महिलाएं और पुरुष दोनों सामूहिक रूप से भाग लेते हैं, हालांकि उनकी नृत्य मंडलियाँ अलग-अलग होती हैं।