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अगर सुभाष होते, तो क्या नेहरू सत्ता तक पहुँचते?

डॉ ब्रजकिशोर प्रसाद सिंह

स्वतंत्र भारत की सत्ता-संरचना केवल वैचारिक संघर्षों से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संयोगों और खुफिया असफलताओं से भी बनी। ब्रिटिश खुफिया तंत्र, जिसे अपनी दक्षता पर अत्यधिक भरोसा था, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मामले में बार-बार चूक गया। इन चूकों ने न केवल आज़ाद हिंद फौज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि स्वतंत्रता के बाद उभरने वाली राजनीतिक शक्ति-समीकरणों को भी गहराई से प्रभावित किया। यह आलेख उसी ऐतिहासिक कड़ी को खोलता है। – संपादक

ब्रिटिश खुफिया तंत्र की असफलता और अक्षमता ने स्वतंत्र भारत की राजनीतिक शक्ति संरचना को दुर्बल कर दिया। ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस की बड़ी धाक थी, लेकिन सुभाष चंद्र बोस के प्रसंग में इसकी एक भी नहीं चली। त्रिपुरी संकट के बाद सुभाष चंद्र बोस ने फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से कांग्रेस के अंदर एक राजनीतिक दल का निर्माण कर लिया। इसके अंतर्गत उन्होंने रामगढ़ में समझौता-विरोधी अधिवेशन किया। इसके बाद उन्होंने कोलकाता में हालवेल स्मारक को हटाने के लिए आंदोलन चलाया और इस आंदोलन के दौरान वे जेल गए।

जेल से बाहर निकलने के लिए उन्होंने भूख हड़ताल की और उन्हें उनके एलगिन रोड वाले निवास में नज़रबंद रखा गया। इस नज़रबंदी के दौरान उन्होंने गोपनीय तौर पर तैयारी की और भारत से बाहर निकलने की योजना बनाई। बड़ी खूबसूरती से उन्होंने इस योजना को अंजाम दिया और बेरोकटोक काबुल तक पहुँच गए। काबुल में, जहाँ वे एक धर्मशाला में रुके थे, एक पुलिसवाले को उन पर शक हो गया। पुलिसवाले से पीछा छुड़ाने के लिए उन्होंने अपने पिता द्वारा दी गई प्रिय घड़ी रिश्वत के रूप में दे दी।

यदि वह सिपाही घड़ी लेने का लोभ नहीं करता, तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस पकड़े जाते और भारत लाए जाते। इस स्थिति में आज़ाद हिंद फ़ौज की पूरी कहानी अस्तित्व में ही नहीं आ पाती। वे जेल में होते और आज़ादी के समय जैसे अन्य नेता जेल से छूटते, उसी तरह वे भी छूटते। यदि वे घर से निकलते समय पकड़े जाते, तो भी यही होता। इन दोनों अवसरों पर ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस पूरी तरह नाकाम रही।

1937 में सुभाष चंद्र बोस वियना के पास अपने प्रिय पर्यटक स्थल बैडगास्टीन में अपनी भावी पत्नी एमिली शेंकल से मिलने गए थे। वे वहाँ दस दिनों से अधिक समय तक साथ रहे। वहाँ से वे इंग्लैंड होते हुए भारत लौटे और उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। पूरे 1938-39 के दौरान उनका पत्राचार एमिली शेंकल से चलता रहा, लेकिन ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस यह नहीं भांप पाई कि क्या चल रहा है।

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यदि ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस इस प्रेम प्रसंग को पकड़ लेती और उसे प्रेस में जारी कर देती, तो सुभाष चंद्र बोस की प्रखर राष्ट्रवादी छवि को गहरा आघात पहुँचता। आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल होने वाले लोगों को लगता कि वे कोई त्यागी राष्ट्रवादी नहीं, बल्कि एक सामान्य व्यक्ति हैं। परिणामस्वरूप आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल लगभग 20,000 लोग उपलब्ध नहीं होते, न संघर्ष होता, न विमान दुर्घटना की कथा जन्म लेती। तब सुभाष चंद्र बोस आज़ादी के बाद यूरोप से भारत लौटते। यह स्थिति कुछ-कुछ वैसी होती, जैसी रूस में क्रांति से पहले जर्मनी से लेनिन के मास्को पहुँचने की थी।

1938 में कलकत्ता में पुलिस का मुख्यालय लालबाग में था। इस मुख्यालय में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का एक समर्थक नौकरी करता था। रात के समय वह लालबाग से कुछ गोपनीय फ़ाइलें नेताजी को पढ़ने के लिए उपलब्ध कराता था। इन फ़ाइलों से नेताजी को पता चला कि उनके घर-परिवार में आने-जाने वाले उनके घनिष्ठ लोगों में से एक व्यक्ति पुलिस का एजेंट बन चुका है।

इस जानकारी का उन्होंने अत्यंत चतुराई से उपयोग किया। भारत से बाहर जाने की पूरी तैयारी उन्होंने परिवार के अधिकांश सदस्यों से भी छिपाकर रखी और उस व्यक्ति से भी, जो पुलिस का एजेंट था। परिणामस्वरूप पुलिस तक कोई सूचना नहीं पहुँची। जासूस का नाम उन्हें पुलिस की फ़ाइलों से ज्ञात हो चुका था और पुलिस को उनके भागने की योजना की भनक तक नहीं लगी। यह खुफिया सेवा की चौथी बड़ी असफलता थी।

हालाँकि एक मामले में खुफिया पुलिस को सफलता मिली। 1938 में सुभाष चंद्र बोस यह समझ चुके थे कि शीघ्र ही विश्व युद्ध होने वाला है और जर्मनी से सहायता ली जानी चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने मुंबई में जर्मन काउंसिल से मिलने की योजना बनाई। खुले रूप में मिलना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने वेश बदलकर मुलाक़ात की। बातचीत हुई, लेकिन एक चूक यह हुई कि वेश बदलकर जाते समय खुफिया पुलिस ने उनकी तस्वीर खींच ली।

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उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेसी सरकार थी और गृह मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी थे। पुलिस ने वह तस्वीर मुंशी को भेजी, जिन्होंने उसे महात्मा गांधी तक पहुँचा दिया। संभवतः पुलिस का उद्देश्य भी यही था। गांधी इस बात से अत्यंत नाराज़ हुए कि कांग्रेस का अध्यक्ष इस तरह वेश बदलकर षड्यंत्रपूर्ण ढंग से विदेश शक्ति से संपर्क कर रहा है। यह भी एक कारण था कि त्रिपुरी अधिवेशन में जीत के बाद भी गांधी सुभाष चंद्र बोस से असहज हो गए। उन्हें आशंका थी कि ऐसी गोपनीय गतिविधियाँ कांग्रेस के जन-आंदोलन के खुले स्वरूप को नुकसान पहुँचाएँगी। इस मामले में खुफिया पुलिस की रणनीति सफल रही।

इसके बाद 1946 की परिस्थिति को समझना आवश्यक है। जब मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ रहे थे, तब नए अध्यक्ष के लिए प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों से नाम प्रस्तावित किए गए। कुल 15 में से 12 प्रांतीय कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया। शेष तीन कमेटियों से कृपलानी और पट्टाभि सीतारमैया के नाम आए।

ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के कुछ सदस्यों ने सुभाष चंद्र बोस और जयप्रकाश नारायण का नाम भी प्रस्तावित किया, जबकि जवाहरलाल नेहरू का नाम किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने नहीं दिया था। गांधी का मानना था कि सरदार पटेल की आयु अधिक है और स्वास्थ्य अनुकूल नहीं है, इसलिए उन्हें नेहरू के पक्ष में हट जाना चाहिए। इसी प्रकार पट्टाभि सीतारमैया और कृपलानी को भी हटाया गया। जयप्रकाश नारायण का नाम इसलिए छोड़ा गया क्योंकि वे कांग्रेस के सदस्य नहीं थे और सुभाष चंद्र बोस के बारे में कहा गया कि वे भारत में उपलब्ध नहीं हैं।

यदि उस समय सुभाष चंद्र बोस जेल से बाहर होते, तो उनका नाम अत्यंत मजबूती से उभरता। वे उम्र में नेहरू से छोटे थे और सरदार पटेल के साथ उनकी अच्छी जमती थी। इस स्थिति में पटेल और बोस की जोड़ी अत्यंत शक्तिशाली बन जाती। अंतरिम सरकार और आज़ादी के बाद के मंत्रिमंडल में सुभाष चंद्र बोस को जो भी मंत्रालय मिलता, वह नेहरू के लिए निरंतर चुनौती बनता। सत्ता संघर्ष लंबा खिंचता और 1950 के बाद नेहरू को जो निर्विरोध सत्ता मिली, वह संभव नहीं होती। भारत में भी सत्ता संघर्ष वैसा ही होता, जैसा रूसी क्रांति के बाद स्टालिन और ट्रॉट्स्की के बीच हुआ था। यह भी संभव था कि पटेल और बोस अपनी संगठन क्षमता के बल पर नेहरू का स्थान ले लेते।

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पाठकों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि गांधी नेहरू को पसंद करते थे, लेकिन क्या वे सुभाष चंद्र बोस को भी पसंद करते थे। त्रिपुरी अधिवेशन के बाद जब सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस संगठन में कोई पद धारण करने से रोक दिया गया, तब 1939 में विश्व युद्ध आरंभ हुआ। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक वर्धा में हुई, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में बुलाया गया। यह प्रस्ताव स्वयं गांधी ने रखा था।

सुभाष चंद्र बोस के मन में कोई कटुता नहीं थी। उनके मन में गांधी के प्रति सम्मान था। बैठक में उन्होंने तत्काल आंदोलन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया, जबकि गांधी का मत था कि उस समय आंदोलन संभव नहीं है। 1940 में सुभाष चंद्र बोस नागपुर से वर्धा जाकर गांधी से मिले और एक बार फिर आंदोलन शुरू करने की बात कही। इससे स्पष्ट होता है कि बहुचर्चित मतभेदों के बावजूद गांधी और बोस के बीच संवाद और समन्वय बना हुआ था।

1948 में 23 जनवरी को गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा में सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस पर उनकी प्रशंसा की थी। वे सुभाष को भूले नहीं थे। यदि 1946 में सुभाष चंद्र बोस भारत में होते, तो नेहरू के लिए स्थिति कहीं अधिक कठिन होती।

अंततः हम फिर उसी प्रारंभिक बिंदु पर लौटते हैं कि ब्रिटिश सीक्रेट सर्विस असफल रही। वह सुभाष चंद्र बोस को पकड़ नहीं पाई और इसी कारण नेहरू का रास्ता लगभग निष्कंटक हो गया। आज़ाद हिंद फ़ौज के संघर्ष के बाद सुभाष चंद्र बोस का भारत लौट पाना संभव नहीं हो सका और स्वतंत्र भारत की सत्ता संरचना एक विशेष दिशा में आकार लेती चली गई।