हैदर अली के आक्रमण से रुका महामाघ मामंकम सनातन उत्सव 250 साल बाद पुन: प्रारंभ

केरल की पवित्र भूमि, जहां भारतपुझा नदी की नीली-शांत लहरें सदियों से सनातन संस्कृति की गाथा गुनगुनाती आई हैं, आज एक बार फिर इतिहास के पन्नों से निकलकर वर्तमान में जीवंत हो रही है। यह वही भूमि है, जहां धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि जीवन की लय रहा है। इसी भारतपुझा, जिसे उत्तर भारत की गंगा के समकक्ष दक्षिण की पवित्र नदी माना जाता है, के तट पर स्थित तिरुनावाया आज एक ऐसे आयोजन का साक्षी बन रही है, जिसे दक्षिण भारत का कुंभ मेला कहा जा रहा है। यह आयोजन है महामाघ महोत्सव 2026, जिसे प्राचीन काल में मामंकम उत्सव के नाम से जाना जाता था।
यह महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह केरल के गौरवशाली अतीत, उसकी सांस्कृतिक स्मृति, और सनातन परंपराओं की अविच्छिन्न धारा का पुनर्पाठ है। लगभग ढाई सौ वर्षों तक इतिहास के गर्भ में दबा यह उत्सव अब फिर से 18 जनवरी से 3 फरवरी 2026 तक आयोजित हो रहा है। यह पुनरुद्धार अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि परंपराएं चाहे कितनी भी बार बाधित की जाएं, वे अंततः अपने मूल स्रोत से पुनः प्रवाहित होती ही हैं।
मामंकम : केवल उत्सव नहीं, एक सभ्यता
मामंकम की जड़ें भारतीय सभ्यता की उस परंपरा में हैं, जहां धर्म, संस्कृति, राजनीति और व्यापार एक-दूसरे से अलग नहीं थे। यह वह समय था जब धार्मिक अनुष्ठान केवल मोक्ष की कामना तक सीमित नहीं थे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन के केंद्र भी होते थे। तिरुनावाया, जो आज मलप्पुरम जिले का एक छोटा सा कस्बा है, कभी दक्षिण भारत की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक धुरी था।
यहां स्थित नवमुकुंद मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक प्राचीन वैष्णव तीर्थ है। भारतपुझा के तट पर स्थित इस मंदिर के कारण तिरुनावाया को अत्यंत पवित्र माना गया। प्राचीन ग्रंथों, मंदिर अभिलेखों और लोक परंपराओं से यह स्पष्ट होता है कि 12वीं शताब्दी से यहां हर 12 वर्ष में एक भव्य महोत्सव आयोजित होता था—मामंकम। यह आयोजन अपने स्वरूप में उत्तर भारत के कुंभ मेले से अत्यंत मिलता-जुलता था।
यहां लाखों श्रद्धालु पवित्र स्नान के लिए आते थे। मान्यता थी कि माघ मास में भारतपुझा में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण इसे महामाघ भी कहा जाता था। लेकिन मामंकम केवल स्नान और पूजा तक सीमित नहीं था। यह एक विशाल सांस्कृतिक और राजनीतिक मंच था, जहां दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों से लोग आते थे।
जामोरिन और मलाबार की राजनीतिक एकता
मामंकम उत्सव के मुख्य संरक्षक थे जामोरिन, यानी कोझिकोड के शासक। उनके लिए यह उत्सव केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक सत्ता और वैधता का प्रतीक था। जामोरिन इसे मलाबार क्षेत्र की एकता और शक्ति के रूप में देखते थे। उत्सव के दौरान विभिन्न रियासतों के प्रतिनिधि, योद्धा और सरदार उपस्थित होते थे।
विशेष रूप से उल्लेखनीय थे चावर योद्धा वे वीर, जो आत्मघाती दस्ते के रूप में प्रसिद्ध थे। वे जामोरिन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को सदैव तत्पर रहते थे। इन योद्धाओं की गाथाएं आज भी केरल के लोकगीतों और कथाओं में जीवित हैं। यह दर्शाता है कि मामंकम केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वीरता, त्याग और सत्ता संघर्ष का भी प्रतीक था।
इस दौरान भारतपुझा के सूखे तट पर विशाल अस्थायी बाजार लगते थे। व्यापारी दूर-दूर से आते थे, मसाले, वस्त्र, धातु, हस्तशिल्प और दुर्लभ वस्तुओं का व्यापार होता था। वैष्णव, शैव और अन्य संप्रदायों के लोग एक साथ इस आयोजन में सम्मिलित होते थे। यह केरल की उस सांस्कृतिक सहिष्णुता का प्रमाण था, जहां विविधता संघर्ष नहीं, बल्कि उत्सव का कारण थी।
स्वर्णिम काल : 14वीं से 17वीं शताब्दी
मामंकम का स्वर्णिम काल 14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच माना जाता है। इस अवधि में यह उत्सव पूरे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध हो गया। यहां तक कि पुर्तगाली यात्रियों और यूरोपीय इतिहासकारों ने भी अपने वृत्तांतों में मामंकम का उल्लेख किया है। वे इसे एक ऐसा भव्य मेला बताते हैं, जहां हजारों नहीं, बल्कि लाखों लोग एकत्र होते थे।
उत्सव की शुरुआत ध्वजारोहण से होती थी। इसके बाद रथ यात्रा, अनुष्ठान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, युद्धकला प्रदर्शन और व्यापारिक गतिविधियां निरंतर चलती रहती थीं। यह आयोजन कई दिनों तक चलता था और पूरे क्षेत्र में उत्सव का वातावरण रहता था। भारतपुझा का तट उस समय दक्षिण भारत का सबसे बड़ा सामाजिक मंच बन जाता था।
पतन का काल : युद्ध और सत्ता परिवर्तन
लेकिन इतिहास की धारा हमेशा एक-सी नहीं रहती। 18वीं शताब्दी में मलाबार क्षेत्र राजनीतिक उथल-पुथल की चपेट में आ गया। मैसूर के शासक हैदर अली ने 1766 में मलाबार पर आक्रमण किया और कोझिकोड पर विजय प्राप्त की। इससे जामोरिन की सत्ता बुरी तरह कमजोर हो गई।
इतिहासकारों के अनुसार, जामोरिन परिवार के कई सदस्यों ने इस पराजय के बाद आत्मदाह किया। क्षेत्र में अराजकता फैल गई। इसके बाद 1792 की सेरिंगपट्टनम संधि के माध्यम से ब्रिटिश प्रभाव बढ़ा। इन घटनाओं के कारण मामंकम जैसे विशाल आयोजन को जारी रखना असंभव हो गया।
आखिरी ज्ञात मामंकम 1755 या 1766 के आसपास हुआ माना जाता है। इसके बाद यह परंपरा धीरे-धीरे इतिहास की स्मृतियों में सिमट गई। कुछ विद्वान आंतरिक संघर्षों को भी इसके पतन का कारण मानते हैं, लेकिन व्यापक रूप से यह हिंदू राजवंशों की पराजय और नए शासकों के उदय से जुड़ा हुआ था।
स्मृति से पुनरुद्धार तक
करीब ढाई सौ वर्षों तक मामंकम केवल पुस्तकों, लोककथाओं और स्मृतियों में जीवित रहा। 20वीं शताब्दी में कुछ सीमित प्रयास हुए, लेकिन व्यापक स्तर पर पुनरुद्धार नहीं हो सका। अब 21वीं शताब्दी में, सनातन चेतना के पुनर्जागरण के साथ, यह परंपरा फिर जीवंत हो रही है।
महामाघ महोत्सव 2026 का आयोजन जूना अखाड़ा, भारतीय धर्म प्रचार सभा और अन्य हिंदू संगठनों के संयुक्त प्रयास से हो रहा है। इसे मामंकम का ही आधुनिक और विस्तारित स्वरूप कहा जा सकता है। उत्तर भारत के कुंभ मेले की तर्ज पर व्यवस्थाएं की गई हैं ध्वजारोहण, अन्नदान, साधु-संतों का आगमन और विशाल स्नान व्यवस्था।
तमिलनाडु से प्रारंभ होकर तिरुनावाया पहुंचने वाली रथ यात्रा इस आयोजन का विशेष आकर्षण है। 5000 से अधिक स्वयंसेवक और लगभग 12,000 भक्त भोजन व्यवस्था में सक्रिय हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संगठनात्मक क्षमता का भी उदाहरण है।
जनसांख्यिकी के पार सनातन चेतना
यह आयोजन ऐसे जिले में हो रहा है, जहां हिंदू आबादी अल्पसंख्यक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, मलप्पुरम जिले में मुस्लिम आबादी लगभग 70 प्रतिशत है, जबकि हिंदू लगभग 27 प्रतिशत। इसके बावजूद, स्थानीय समुदाय की सहभागिता अत्यंत प्रेरक है।
तिरुनावाया के लगभग 1500 घरों ने श्रद्धालुओं के लिए अपने द्वार खोल दिए हैं। लोग प्रतिदिन रंगोली बना रहे हैं, अतिथियों का स्वागत कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि सनातन परंपराएं केवल संख्या पर निर्भर नहीं होतीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और सामूहिक चेतना पर टिकी होती हैं।
प्रशासन, राजनीति और बदलता केरल
इस आयोजन का मार्ग आसान नहीं था। प्रारंभ में पर्यावरणीय कारणों से अस्थायी पुल निर्माण पर रोक लगी। कुछ प्रशासनिक अड़चनें भी सामने आईं। लेकिन 15 जनवरी 2026 को जिला कलेक्टर की अनुमति के बाद आयोजन को हरी झंडी मिली। देवस्वम मंत्री की संरक्षकता ने इसे संस्थागत समर्थन प्रदान किया।
यह आयोजन केरल की बदलती राजनीतिक हवा को भी दर्शाता है। 2018-19 के सबरीमाला विवाद के बाद हिंदू समाज में जागरूकता और एकजुटता बढ़ी है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल अब हिंदू आउटरीच की आवश्यकता को समझने लगे हैं। हालांकि महामाघ महोत्सव किसी राजनीतिक दल का आयोजन नहीं है, लेकिन इसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव व्यापक है।
सनातन संस्कृति की विजय
मामंकम का पुनरुद्धार यह स्पष्ट संदेश देता है कि सनातन परंपराएं कभी समाप्त नहीं होतीं। वे समय के साथ दबाई जा सकती हैं, लेकिन मिटाई नहीं जा सकतीं। तिरुनावाया का यह महामाघ महोत्सव केवल केरल का नहीं, बल्कि पूरे भारत का आयोजन है।
यह उत्सव श्रद्धालुओं को केवल स्नान का अवसर नहीं देगा, बल्कि उन्हें प्राचीन युद्धकला, सांस्कृतिक कार्यक्रम, अन्नदान और सामूहिक साधना का अनुभव कराएगा। यह केरल को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर भी नई पहचान देगा, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन काल में विदेशी यात्री मामंकम की ओर आकर्षित होते थे।
इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, पुनर्जागरण
अंततः, महामाघ महोत्सव 2026 केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की निरंतरता का जीवंत प्रमाण है। यह बताता है कि इतिहास केवल अतीत में नहीं रहता, बल्कि सही समय पर वर्तमान में लौट आता है। तिरुनावाया की यह भूमि एक बार फिर साक्षी बन रही है कि सनातन कभी पराजित नहीं होता—वह केवल विश्राम करता है और फिर और अधिक ऊर्जा के साथ लौटता है।

