सत्ता परिवर्तन के साथ बंगलादेश में हिन्दुओं पर हमलों और बर्बर हत्याओं का दौर
सत्ता परिवर्तन के साथ बंगलादेश में हिन्दुओं पर हमलों और बर्बर हत्याओं का दौर रुक ही नहीं रहा। इसमें हिन्दू स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार का अध्याय भी जुड़ गया है। लेकिन भारत के अधिकांश वे राजनैतिक दल चुप्प हैं, जिन्हें आतंकवादियों के भी मानवाधिकार की चिंता रहती है। वहीं पिछले सप्ताह काँग्रेस नेता जयराम रमेश और के. वेणुगोपाल तो मीडिया से बंगलादेश में हिन्दुओं की हत्या का प्रश्न सुनकर ही भाग निकले।
यह वही बंगलादेश है, जिसके निवासियों को कभी अपनी बंगला संस्कृति पर गर्व होता था और उसे सुरक्षित रखने के लिये संघर्ष किया गया था। उस संघर्ष को सार्थक करने के लिये भारत ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। 1971 का युद्ध भी झेला था। इसमें भारत के लगभग 3900 जवानों का बलिदान हुआ और लगभग दस हजार सैनिक घायल हुए। लाखों करोड़ का वित्तीय भार पड़ा, सो अलग। यदि बंगलादेश अस्तित्व में आया है, तो वह भारत के कारण।
लेकिन अब वही बंगलादेश भारत के विरुद्ध षड्यंत्र रच रहा है और हिन्दुओं का जीना मुश्किल कर रहा है। बंगलादेश में सत्ता परिवर्तन को डेढ़ साल होने आ गया है। सत्ता परिवर्तन के साथ ही हिन्दुओं पर हमले आरंभ हुए, जो रुकने का नाम नहीं ले रहे। बल्कि हमलों की क्रूरता बढ़ती जा रही है।
बंगलादेश अब जिस राह पर है, उसमें तीन बातें बहुत स्पष्ट हैं। पहली, पाकिस्तान के प्रति प्रेम और एकजुटता। दूसरी, भारत के प्रति घृणा। और तीसरी, हिन्दुओं की हत्याएँ। ये तीनों प्राथमिकताएँ पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आईएसआई और कट्टरपंथी संगठन जमायते इस्लामी की हैं।
जमायते इस्लामी अपनी कट्टरता के लिये पूरी दुनिया में कुख्यात है। कई देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। वहीं पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आईएसआई को आतंकवाद की संरक्षक माना जाता है। बंगलादेश में शेख हसीना की सत्ता से विदाई इन दोनों संस्थाओं की रणनीति थी। कहने के लिये वह छात्र आंदोलन था, लेकिन पर्दे के पीछे यही दोनों संगठन सक्रिय थे।
अब बंगलादेश में आईएसआई का कार्यालय खुल चुका है और जमायते इस्लामी खुलकर चुनाव में भाग ले रही है। यही जमायते इस्लामी वह संस्था है, जिसने 1971 में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में चल रहे बंगलादेश आंदोलन का विरोध किया था। वह पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र देश बनाने के पक्ष में कतई नहीं थी।
आईएसआई और जमायते इस्लामी की सक्रियता का ही परिणाम है कि अब बंगलादेश और पाकिस्तान के बीच आने-जाने के लिये वीजा के कई प्रावधान सरल कर दिये गये हैं। बंगलादेश में अब भारत को खुलेआम धमकियाँ दी जाने लगी हैं।
बंगलादेश नेशनल सिटीजन पार्टी के प्रमुख हसनत अब्दुल्लाह ने तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, जिन्हें “सेवन सिस्टर्स” कहा जाता है, को भारत से तोड़ने की धमकी तक दे दी है। इन राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, असम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा शामिल हैं। बंगलादेश के एक अन्य सेवानिवृत्त अधिकारी अब्दुल रहमान ने भी भारत के टुकड़े करने की धमकी दी है।
इन धमकियों को साधारण नहीं समझा जा सकता। जिस प्रकार कट्टरपंथियों के “स्लीपर सेल” भारत में बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाने का षड्यंत्र रच रहे हैं, उससे इन धमकियों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
और तीसरा, बंगलादेश में हिन्दुओं पर हमले और हत्याओं के बढ़ते आँकड़े हैं। जैसे-जैसे आँकड़े बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे क्रूरता भी बढ़ती जा रही है। हिन्दुओं पर हमलों का यह क्रम सत्ता परिवर्तन के पहले दिन से ही शुरू हो गया था।
पिछले दिनों बीबीसी लंदन की एक टीम बंगलादेश गई थी। इस टीम से बातचीत में बंगलादेश के सामाजिक कार्यकर्ता करमाकर ने हमलों की संख्या तीन हजार से अधिक बताई। वहीं भारत सरकार द्वारा 26 दिसंबर को जारी एक आधिकारिक वक्तव्य में हमलों की संख्या 2900 मानी गई है। 130 मंदिर खंडित किए गए हैं। ये आँकड़े वे हैं, जो बंगलादेश पुलिस ने दर्ज किए थे।
सैकड़ों प्रकरण तो पुलिस तक पहुँचे ही नहीं और यदि पहुँचे भी, तो दर्ज नहीं किए गए। उनकी वास्तविक संख्या का अनुमान किसी को नहीं है। बंगलादेश में शायद ही कोई गाँव हो, जहाँ हिन्दुओं के घरों पर हमला न हुआ हो।
अब बंगलादेश सरकार ने ऐसे समाचारों के प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया है। समाचार पत्र ही नहीं, वे सोशल मीडिया अकाउंट भी लॉक किए जा रहे हैं, जो हिन्दुओं पर हमले और उत्पीड़न की जानकारी साझा कर रहे हैं। इसके बावजूद जो समाचार चोरी-छिपे सामने आ रहे हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं।
हिन्दुओं की हत्या में बढ़ती क्रूरता, बलात्कार और महिला अधिकारी को धमकी
बंगलादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार के लिये कट्टरपंथी नित नए तरीके अपना रहे हैं। पहले घरों और मंदिरों पर हमले होते थे, फिर चाकू और गोली से हत्याएँ हुईं। अब क्रूरता के साथ हत्या और ज़िंदा जलाने की घटनाएँ सामने आ रही हैं। यह क्रूरता लगभग वैसी ही है, जैसी सल्तनत काल में देखने को मिलती थी, जहाँ भय फैलाकर धर्मांतरण कराना उद्देश्य होता था।
पिछले चौबीस दिनों में आठ हिन्दुओं की क्रूर हत्याएँ की गईं। इसके अलावा एक हिन्दू स्त्री से सामूहिक बलात्कार और एक हिन्दू महिला अधिकारी को जान से मारने की धमकी देने की घटनाएँ भी सामने आई हैं। इसके अतिरिक्त बारह गाँवों में हिन्दुओं के घरों पर हमलों के समाचार भी आए हैं।
यह नया दौर कट्टरपंथी उस्मान हादी की हत्या के बाद फिर से तेज हुआ। 12 दिसंबर 2025 को ढाका के बिजयनगर क्षेत्र में उस पर हमला किया गया था। उपचार के लिये उसे सिंगापुर ले जाया गया, जहाँ 18 दिसंबर को उसकी मौत हो गई। हादी की मौत से हिन्दुओं का कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन इसे बहाना बनाकर हिन्दुओं को निशाना बनाया गया।
हिन्दुओं के घरों, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों, समाचार पत्र कार्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों पर हमले हुए। इनमें ‘प्रोथोम आलो’, ‘डेली स्टार’, ‘छायानट’ और ‘उदिची शिल्पी’ जैसी संस्थाएँ शामिल हैं।
इसके बाद दीपू चंद्र दास, अमृत मंडल, ब्रजेन्द्र विश्वास, खोकन चंद्र दास, पत्रकार राणा प्रताप वैरागी, व्यवसायी मणि चक्रवर्ती, नेता प्रोलय चाकी और समीर की हत्याएँ हुईं। कई मामलों में पीट-पीटकर, जलाकर और सार्वजनिक रूप से गोली मारकर हत्या की गई। इन घटनाओं के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर फैलाए गए, ताकि हिन्दुओं में भय व्याप्त हो।
झेनैदाह जिले के कालिगंज क्षेत्र में एक चालीस वर्षीय हिन्दू विधवा महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। बाद में उसे पेड़ से बाँधकर उसके बाल काटे गए और इस अमानवीय कृत्य का वीडियो वायरल किया गया।
इसके साथ ही प्रशासन में कार्यरत हिन्दू अधिकारियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। कुरिग्राम जिले में डिप्टी कमिश्नर अन्नपूर्णा देबनाथ को जमायते इस्लामी समर्थकों द्वारा गालियाँ दी गईं और जान से मारने की धमकी दी गई, क्योंकि उन्होंने नियमों के अनुसार एक उम्मीदवार का नामांकन रद्द किया था।
हिन्दुओं पर अत्याचार और भारत की राजनैतिक चुप्पी
भारत में ऐसे अनेक राजनैतिक दल और नेता हैं, जो मानवाधिकारों के लिये सदैव मुखर रहते हैं। वे आतंकवादियों और दंगाइयों में भी मानवीय पहलू खोज लेते हैं। यहाँ तक कि हमास जैसे संगठनों के लिये भी संवेदना व्यक्त की जाती है। लेकिन जब बात हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों की आती है, तो यही वर्ग मौन हो जाता है।
यह चुप्पी पहले कश्मीर में दिखी, फिर मुर्शिदाबाद में और अब बंगलादेश में। हाल ही में काँग्रेस नेता जयराम रमेश और के. वेणुगोपाल का मीडिया से प्रश्न सुनकर मुँह छिपाकर चले जाना इसी मानसिकता का उदाहरण है।
दिल्ली दंगों के आरोपियों की जमानत न मिलने पर आवाज़ उठाने वाले नेता, बंगलादेश में हिन्दुओं के नरसंहार पर चुप हैं। यही दोहरा मापदंड इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष है।
