आस्था पर आक्रमण, इतिहास की क्रूरता और पुनर्जागरण का शाश्वत संघर्ष सोमनाथ
इतिहास में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं, जिनका स्मरण मात्र वर्तमान को झकझोर देता है। वे केवल अतीत की घटनाएँ नहीं होतीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और मानवता की कसौटी बन जाती हैं। 8 जनवरी 1026 ऐसी ही एक तिथि है, जब भारत की आध्यात्मिक चेतना के प्रमुख केन्द्र सोमनाथ मंदिर पर ऐसा आक्रमण हुआ, जिसने न केवल एक भव्य मंदिर को ध्वस्त किया, बल्कि हजारों निर्दोष श्रद्धालुओं के जीवन को भी निर्ममता से समाप्त कर दिया। यह घटना केवल लूट या विध्वंस की कथा नहीं है, बल्कि वह क्षण है जहाँ धार्मिक असहिष्णुता, सत्ता का उन्माद और मानवीय क्रूरता अपनी पराकाष्ठा पर दिखाई देती है।
गुजरात के समुद्र तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वोच्च स्थान रखने वाला वह तीर्थ है, जो सदियों तक भारत की आस्था, समृद्धि और वैश्विक आकर्षण का केन्द्र रहा। यही कारण है कि यह मंदिर न केवल श्रद्धालुओं को आकृष्ट करता रहा, बल्कि लुटेरों और आक्रांताओं के लोभ का भी लक्ष्य बना। मध्यकालीन इतिहास का एक बड़ा हिस्सा सोमनाथ के विध्वंस, लूट और पुनर्निर्माण की गाथाओं से भरा पड़ा है।
सोमनाथ मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वाधिक प्राचीन और महत्त्वपूर्ण माना जाता है। परंपराओं के अनुसार इसकी स्थापना चन्द्रदेव ने की थी, जबकि कुछ मान्यताओं में भगवान परशुराम द्वारा इसकी स्थापना का उल्लेख मिलता है। यह मंदिर केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण एशिया, यूनान और रोम तक प्रसिद्ध था। इतिहासकारों के विवरण बताते हैं कि नौवीं शताब्दी से पूर्व तक सोमनाथ विश्वभर के पर्यटकों और श्रद्धालुओं का प्रमुख केन्द्र रहा।
परंतु इसी ख्याति और अपार संपन्नता ने इसे आक्रांताओं के लालच का केन्द्र भी बना दिया। मध्यकाल में सोमनाथ मंदिर पर बार-बार आक्रमण हुए, किंतु 8 जनवरी 1026 को मेहमूद गजनवी द्वारा किया गया आक्रमण क्रूरता की पराकाष्ठा था। उस दिन गजनवी की सेना ने न केवल मंदिर की अकूत संपत्ति लूटी, बल्कि वहां उपस्थित हजारों स्त्री, पुरुष और बच्चों का निर्मम नरसंहार किया। जो जीवित बचे, उन्हें बंदी बनाकर ले जाया गया और बाद में गुलामों के बाजार में बेच दिया गया।
यह सोमनाथ का पहला विध्वंस नहीं था। इससे पूर्व सिंध में तैनात अरब गवर्नर जुनायद ने समुद्री मार्ग से अचानक आक्रमण कर मंदिर को लूटा और विध्वंस किया था। उसके पश्चात गुजरात के शासक नागभट्ट ने मंदिर का पुनरुद्धार कराया। किंतु गजनवी का आक्रमण सबसे अधिक सुनियोजित और भयावह था। उसके इस अभियान का विस्तृत वर्णन अल्बरूनी के लेखन में मिलता है, जो उसके साथ अनेक अभियानों में रहा।
अल्बरूनी के अनुसार गजनवी ने आक्रमण से पहले व्यापक जासूसी तंत्र खड़ा किया था। पुजारी, व्यापारी, यात्री और फकीर के वेश में उसके एजेंट सोमनाथ और आसपास के क्षेत्रों में फैल चुके थे। एक नजूमी को विशेष रूप से भेजा गया, जिसने ज्योतिष में विश्वास रखने वाले गुजरात के राजा भीमदेव को चौबीस घंटे तक युद्ध टालने की सलाह दी। इसी कूटनीति का लाभ उठाकर गजनवी ने बिना किसी बड़े प्रतिरोध के सीधे सोमनाथ पर आक्रमण किया।
उस समय मंदिर में उत्सव चल रहा था और वीरावल के व्यापारियों सहित पचास हजार से अधिक लोग परिसर में शरण लिए हुए थे। गजनवी की सेना ने पहले वीरावल में लूट मचाकर लोगों को मंदिर की ओर भगाया और फिर चारों ओर से घेराबंदी कर कत्लेआम शुरू किया। पहले पुरुषों और बच्चों की हत्या की गई, फिर स्त्रियों को बंदी बनाया गया। इस अमानवीय कृत्य का वर्णन इतिहास के सबसे हृदयविदारक प्रसंगों में गिना जाता है।
इसके बाद भी सोमनाथ को चैन नहीं मिला। 1297 में अलाउद्दीन खिलजी, 1397 में मुजफ्फर शाह, 1442 में अहमद शाह और फिर 1665 तथा 1706 में औरंगजेब द्वारा मंदिर को लूटा और ध्वस्त किया गया। हर बार आस्था को कुचलने का प्रयास हुआ, और हर बार सोमनाथ ने पुनः खड़े होकर इतिहास को चुनौती दी।
आज जो सोमनाथ मंदिर हम देखते हैं, वह केवल पत्थरों से बना एक स्थापत्य नहीं है, बल्कि वह भारत की जीवटता, आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। इस पुनर्निर्माण का श्रेय मुख्य रूप से के.एम. मुंशी और सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है। 1922 में भग्न सोमनाथ के दर्शन के बाद के.एम. मुंशी के मन में जो संकल्प जन्मा, वह 1955 में साकार हुआ। उन्होंने अपनी पुस्तक Pilgrimage to Freedom में इस संघर्ष और तत्कालीन राजनीतिक विरोध का विस्तार से उल्लेख किया है।
यद्यपि उस समय कुछ शीर्ष नेतृत्व ने इस पुनर्निर्माण से दूरी बनाए रखी, किंतु राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के नैतिक समर्थन से यह अभियान सफल हुआ। सोमनाथ का पुनर्निर्माण इस बात का प्रमाण है कि आस्था को बार-बार कुचला जा सकता है, पर नष्ट नहीं किया जा सकता। सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि यह संदेश है कि भारत की आत्मा हर विध्वंस के बाद और अधिक दृढ़ होकर खड़ी होती है।
