जेल की सलाखों के पार भी जीवित रही क्रांति: बारीन्द्रनाथ घोष
अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिए जिन क्राँतिकारियों ने अपने स्वर्णिम सुख-सुविधाओं का परित्याग कर बहुआयामी संघर्ष किए और जेल जीवन स्वीकार किया, उनमें बारीन्द्र घोष का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने प्रत्यक्ष क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया, जन-जागरण के लिए समाचार पत्र निकाले, बैठकों का आयोजन किया और युवाओं को सक्रिय भूमिका के लिए प्रेरित किया।
ऐसे अमर क्राँतिकारी और पत्रकार बारीन्द्रनाथ घोष का जन्म 5 जनवरी 1880 को लंदन के पास क्रॉयडन नामक कस्बे में हुआ था, यद्यपि उनका पैतृक निवास बंगाल के कोन्नगर में था। उनके पिता श्री कृष्णनाथ घोष अपने समय के सुप्रसिद्ध चिकित्सक और जिला सर्जन थे। माता देवी स्वर्णलता, प्रसिद्ध समाज सुधारक और विद्वान राजनारायण बसु की पुत्री थीं। महर्षि अरविन्द घोष, जो पहले क्राँतिकारी और बाद में महान आध्यात्मिक संत बने, उनके बड़े भाई थे। एक अन्य बड़े भाई श्री मनमोहन घोष अंग्रेजी साहित्य के विद्वान और ढाका विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। बारीन्द्रनाथ घोष अपने संक्षिप्त नाम ‘बारिन घोष’ से अधिक प्रसिद्ध थे।
बारिन घोष की प्रारंभिक शिक्षा देवगढ़ में हुई। उच्च शिक्षा के लिए उन्हें वर्ष 1901 में पटना भेजा गया। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने बड़ौदा में सैन्य प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। उन्हीं दिनों उनके बड़े भाई अरविन्द घोष क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े हुए थे, जिनसे प्रभावित होकर बारिन भी क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय हो गए। 1902 में पढ़ाई पूरी कर वे कलकत्ता लौटे, जहाँ उनका संपर्क यतीन्द्रनाथ मुखर्जी से हुआ और संगठित क्रांतिकारी प्रयास प्रारंभ हुए।
1903 में बंगाल में एक व्यायामशाला की स्थापना की गई। औपचारिक रूप से यह व्यायाम का केंद्र था, लेकिन वास्तव में यह क्रांतिकारियों के मिलने और शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण देने का केंद्र था। इस पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी बारिन घोष ने संभाली और अनेक युवकों को प्रशिक्षण दिया। आगे चलकर विभिन्न क्रांतिकारी टोलियों को मिलाकर अनुशीलन समिति का गठन हुआ, जिसमें बारिन घोष की केंद्रीय भूमिका रही। इसके अध्यक्ष प्रमथनाथ मित्र बने, जबकि चित्तरंजन दास और अरविन्द घोष उपाध्यक्ष, तथा सुरेन्द्रनाथ ठाकुर कोषाध्यक्ष बने। कार्यकारिणी में एकमात्र महिला सदस्य सिस्टर निवेदिता थीं।
1906 में अनुशीलन समिति का पहला सम्मेलन कलकत्ता में हुआ, जिसमें युवाओं को क्रांति के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करने का निर्णय लिया गया। संगठन की गतिविधियों के विस्तार के लिए ढाका में एक और कार्यालय खोला गया, जिसका नेतृत्व पुलिनबिहारी दास और पी. मित्रा को सौंपा गया। कुछ ही समय में इस संस्था की लगभग पाँच सौ शाखाएँ स्थापित हो गईं, जिनमें अधिकांश सदस्य स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी थे।
बारीन्द्र घोष ने वर्ष 1905 में क्रांति से संबंधित अपनी पहली पुस्तक ‘भवानी मंदिर’ लिखी। इसमें आनंद मठ की भावना निहित थी और क्रांतिकारियों को संदेश दिया गया था कि स्वतंत्रता प्राप्ति तक सात्त्विक और अनुशासित जीवन अपनाया जाए। 1907 में उन्होंने दूसरी पुस्तक ‘वर्तमान रणनीति’ लिखी, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि भारत की स्वतंत्रता के लिए सैन्य शिक्षा और सशस्त्र संघर्ष अनिवार्य है। इसी काल में बारिन घोष और बाघा जतिन ने बंगाल में बड़ी संख्या में युवाओं को क्रांति के लिए तैयार किया।
30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी द्वारा किंग्सफोर्ड की हत्या के प्रयास के बाद अंग्रेजी शासन ने क्रांतिकारियों की व्यापक धर-पकड़ शुरू कर दी। 2 मई 1908 को बारिन घोष अपने साथियों सहित गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर चर्चित अलीपुर बम कांड चला। प्रारंभ में उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई, किंतु अपील के बाद सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जिसे ‘कालापानी’ कहा जाता था। वे 1920 तक वहाँ कठोर कारावास भोगते रहे।
1920 में प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में अनेक राजनीतिक बंदियों के साथ बारिन घोष को भी रिहा किया गया। रिहा होकर वे कलकत्ता आए और आश्रम जीवन अपनाया। 1923 में वे पांडिचेरी गए, जहाँ उनके बड़े भाई अरविन्द घोष आध्यात्मिक आश्रम में निवास कर रहे थे। वहीं बारिन घोष ने साधना का मार्ग अपनाया और ठाकुर अनुकुलचंद को अपना गुरु माना। इन्हीं के प्रयासों से उनकी रिहाई संभव हो सकी थी।
1929 में बारिन घोष पुनः कलकत्ता लौटे और पत्रकारिता को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। 1933 में उन्होंने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘द डॉन ऑफ इंडिया’ का प्रकाशन शुरू किया। इसके बाद वे प्रतिष्ठित समाचारपत्र द स्टेट्समैन से जुड़े। स्वतंत्रता के बाद वे बांग्ला दैनिक दैनिक बसुमती के संपादक बने और जीवन की अंतिम श्वास तक पत्रकारिता से जुड़े रहे। उनके लेख मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक संतुलन का संदेश देते थे।
अंततः 18 अप्रैल 1959 को बारीन्द्रनाथ घोष इस संसार से विदा हो गए। इस प्रकार एक क्राँतिकारी, विचारक, साधक और पत्रकार का जीवन पूर्ण हुआ। उनकी स्मृतियाँ और कृतियाँ आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
