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असम की वीरांगना शहीद कनकलता बरुआ : अल्पायु में महान बलिदान

असम की मूल निवासी क्रांतिकारी कनकलता बरुआ ऐसी वीरांगना थीं, जिन्होंने अपनी आयु के अठारह वर्ष भी पूरे होने से पहले ही स्वाधीनता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ऐसी महान क्रांतिकारी कनकलता बरुआ का जन्म 22 दिसंबर 1924 को असम प्रांत के अंतर्गत ग्राम बोरंगबाड़ी में हुआ था। उनके पिता कृष्णकांत बरुआ स्वाधीनता संग्राम सेनानी थे और स्वदेशी आंदोलन से जुड़े हुए थे। माता कर्णेश्वरी देवी भारतीय परंपराओं में जीवन जीने वाली महिला थीं। लेकिन जब कनकलता मात्र पाँच वर्ष की थीं, तभी माता का निधन हो गया।

माता के निधन के बाद वे नानी के घर गमेरी गाँव आ गईं। कुछ समय बाद पिता कृष्णकांत ने दूसरा विवाह कर लिया, पर कनकलता नानी के घर ही रहीं। जब वे बारह वर्ष की हुईं, तब पिता का भी निधन हो गया। पिता के निधन के केवल छह माह बाद ही सौतेली माँ का भी देहांत हो गया। इस प्रकार किशोरावस्था में ही कनकलता एक तरह से आत्मनिर्भर हो गईं। नानी का घर ही उनका स्थायी निवास बन गया और वे अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने लगीं।

नानी के घर रहते हुए वे घरेलू कार्यों में हाथ बँटाती थीं और साथ-साथ पढ़ाई भी करती थीं। वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि की थीं। बचपन से ही उनका स्वाधीनता संग्राम से संबंधित सभाओं और सम्मेलनों में आना-जाना शुरू हो गया था।

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जब वे केवल सात वर्ष की थीं, तब पहली बार स्वाधीनता संग्राम से जुड़े सामाजिक जागरण कार्यक्रम में शामिल हुईं। यह सभा मई 1931 में गमेरी गाँव में आयोजित हुई थी। कनकलता इस सभा में अपने मामा देवेंद्रनाथ और यदुराम के साथ गई थीं। सभा का आयोजन सुप्रसिद्ध कवि और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ज्योति प्रकाश अग्रवाल ने युवाओं में स्वाधीनता की चेतना जगाने के उद्देश्य से किया था। वे मूलतः राजस्थान के निवासी थे और असम में अपनी कविताओं तथा साहित्य के माध्यम से नवजागरण का अभियान चला रहे थे। असम में उन्हें नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है।

उनकी कविताएँ और गीत असमिया समाज में घर-घर गाए जाते थे। कनकलता को भी उनकी अनेक रचनाएँ कंठस्थ थीं। यह सभा युवाओं में राष्ट्र और सांस्कृतिक चेतना जगाने के लिए आयोजित की गई थी, किंतु इसमें भाग लेने वालों को राष्ट्रद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया गया। इस घटना की समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई और प्रभात फेरियाँ निकलने लगीं। धीरे-धीरे असम में क्रांति की चेतना चारों ओर फैल गई।

असम में सशस्त्र और अहिंसक, दोनों प्रकार के आंदोलनों की सहभागिता दिखाई देती थी। एक ओर सशस्त्र क्रांतिकारियों को सहायता दी जाती थी, तो दूसरी ओर अहिंसक आंदोलन के समर्थन में प्रभात फेरियाँ और सभाएँ आयोजित होती थीं।

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माता-पिता के निधन के बाद नानी के घर का वातावरण भी पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम से जुड़ा हुआ था। उनके दोनों मामा समाज जागरण अभियानों में सक्रिय थे और कनकलता उनके साथ कई बैठकों में जाती थीं। पिता से मिले संस्कार और नानी के घर के वातावरण ने कनकलता को स्वाधीनता संघर्ष की ओर अग्रसर किया। यही कारण था कि वे कम आयु में ही आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।

समय के साथ आंदोलन तेज होता गया। वर्ष 1942 में कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में “अंग्रेजो भारत छोड़ो” आंदोलन का निर्णय लिया गया, जो पूरे देश में फैल गया। असम के अधिकांश प्रमुख नेता मुंबई से लौटते ही गिरफ्तार कर लिए गए। नेतृत्व का संकट उत्पन्न हो गया, किंतु जन-सामान्य में चेतना अत्यंत प्रबल हो चुकी थी। इस स्थिति में ज्योति प्रसाद अग्रवाल ने नेतृत्व संभाला और आंदोलन को नई दिशा दी।

पुलिस दमन बढ़ता गया, गोलियाँ चलीं, जेलें भर गईं, पर स्वतंत्रता सेनानियों का साहस कम नहीं हुआ। युवाओं ने स्वप्रेरणा से आंदोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। एक गुप्त बैठक में थानों और कचहरियों पर तिरंगा फहराने का निर्णय किया गया।

20 सितंबर 1942 को तेजपुर के अंतर्गत गेहपुर थाने पर तिरंगा फहराने का निश्चय किया गया। एक आत्मबलिदानी टोली का गठन हुआ और उसकी कमान कनकलता बरुआ को सौंपी गई। थाना गेहपुर उनके गाँव से लगभग आठ मील दूर था। पुलिस को इस योजना की जानकारी मिल गई और थाने पर अतिरिक्त बल तैनात कर दिया गया।

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20 सितंबर की भोर में यह टोली रवाना हुई। हाथों में तिरंगा लिए कनकलता जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं। ओजस्वी नारों के बीच टोली थाने के द्वार तक पहुँची। थाना प्रभारी पी. एम. सोम ने पहले हवाई फायर किया, लेकिन आंदोलनकारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। कनकलता ने दृढ़ स्वर में कहा, “हमारा रास्ता मत रोकिए। हम तिरंगा फहराए बिना नहीं लौटेंगे।”

इतना कहते हुए वे आगे बढ़ीं। तभी पुलिस ने गोलियों की बौछार कर दी। पहली गोली कनकलता की छाती में लगी और वे वहीं शहीद हो गईं। दूसरी गोली मुकुंद काकोती को लगी, जिनका भी बलिदान हुआ। इसके बावजूद आंदोलनकारी पीछे नहीं हटे और किसी तरह कनकलता का पार्थिव शरीर वहाँ से बाहर लाया गया।

कनकलता का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। एक दिन भारत स्वतंत्र हुआ और उसी गेहपुर थाने पर तिरंगा लहराया गया।

उनके बलिदान की स्मृति में वर्ष 1997 में भारतीय तटरक्षक बल के एक फास्ट पेट्रोल वेसल ICGS का नाम कनकलता बरुआ रखा गया। वर्ष 2011 में गौरीपुर में उनकी आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया गया। उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘एपा फुलिल एपा ज़ोरिल’ भी बनाई गई।