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सूक्ष्मजीवों की दुनिया और मिट्टी में छिपे जीवन के रहस्य

आचार्य ललित मुनि

जब आप हथेली पर थोड़ी-सी मिट्टी रखते हैं तो क्या सोचा है कि उसके भीतर एक पूरा संसार जीवित रहता है। उसमें अनगिनत छोटे जीव काम करते हैं। कोई पोषक तत्व बनाता है, कोई जड़ों को सहारा देता है, कोई बीमारी रोकता है और कोई मिट्टी को एक साथ बांधकर उसकी ताकत बढ़ाता है। यह अदृश्य दुनिया वैसी ही हलचल से भरी होती है जैसी किसी शहर की गलियों में दिखाई देती है, बस फर्क इतना है कि हम इसे अपनी आँखों से नहीं देख पाते।

मिट्टी को अक्सर निर्जीव समझ लिया जाता है, लेकिन वैज्ञानिक बताते हैं कि एक ग्राम मिट्टी में अरबों सूक्ष्मजीव हो सकते हैं। ये सब मिलकर मिट्टी को चलाते हैं, उसे सांस देते हैं और धरती को उपजाऊ बनाए रखते हैं। बैक्टीरिया, फंगी, प्रोटोजोआ, नेमाटोड, आर्किया और यहाँ तक कि वायरस भी इस संसार का हिस्सा हैं। इनमें से हर एक की अपनी खास भूमिका है।

मिट्टी कोई निर्जीव पदार्थ नहीं। वह एक गतिशील प्रणाली है जिसमें अरबों सूक्ष्मजीव लगातार सक्रिय रहते हैं। एक ग्राम मिट्टी में 10,000 से लेकर 10 करोड़ तक बैक्टीरिया, हजारों फंगी प्रजातियाँ, लाखों प्रोटोजोआ और अनगिनत नेमाटोड छिपे हो सकते हैं। ये सभी मिलकर मिट्टी को सांस देते हैं, उसे पोषक, उपजाऊ और टिकाऊ बनाते हैं।

बैक्टीरिया छोटे होते हैं, पर काम सबसे अधिक करते हैं। वे हवा में मौजूद नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी रूप में बदल देते हैं। दालों की फसलों को जितनी नाइट्रोजन चाहिए, उसका अधिकांश हिस्सा इन्हीं बैक्टीरिया से मिलता है। कुछ बैक्टीरिया मिट्टी में बंद पड़े फॉस्फोरस को खोलकर पौधों तक पहुंचाते हैं, जिससे फसल की पैदावार बढ़ जाती है। ये जड़ों की वृद्धि में भी मदद करते हैं और कई बार बीमारियों से भी रक्षा करते हैं।

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फंगी मिट्टी में अदृश्य जाल बुनती हैं। इनकी लंबी सफेद तंतु-जैसी संरचनाएँ मिट्टी के कणों को एक साथ पकड़ती हैं, जिससे मिट्टी मजबूत बनती है और पानी रोकने की क्षमता बढ़ जाती है। कई फंगी पौधों की जड़ों से जुड़कर खास रिश्ता बनाती हैं। यह रिश्ता दोनों तरफ से लाभ देता है, फंगी पौधे को पानी और पोषक तत्व देती हैं, और पौधा इन्हें भोजन देता है। सूखे की स्थिति में भी ऐसे पौधे ज्यादा अच्छे से टिकते हैं। फंगी जंगलों में पेड़ों को आपस में जोड़कर एक तरह का भूमिगत तंत्र बनाती हैं, जिससे पेड़ एक-दूसरे को संदेश तक भेज सकते हैं। यह प्रकृति की अनोखी व्यवस्था है, जिसे देखकर मन अचरज से भर जाता है।

इसके अलावा प्रोटोजोआ जैसे छोटे जीव मिट्टी में बैक्टीरिया को खाते हैं और इस तरह उनका संतुलन बनाए रखते हैं। जब वे बैक्टीरिया पचाते हैं तो पौधों के लिए उपयोगी अमोनियम छोड़ते हैं। इनके कम होने से मिट्टी का पोषक चक्र धीमा पड़ जाता है। नेमाटोड नाम के छोटे कीड़े भी मिट्टी में पाए जाते हैं। इनमें कुछ नुकसान पहुँचाते हैं, पर कई नेमाटोड ऐसे होते हैं जो हानिकारक जीवों को खाते हैं और फसल को सुरक्षित रखते हैं। ये मिट्टी में पोषक तत्वों की आवाजाही को भी बढ़ाते हैं।

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आर्किया जैसे जीव कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहते हैं। ये मीथेन और नाइट्रोजन जैसी प्रक्रियाओं से जुड़े रहते हैं। वायरस भी मिट्टी में मौजूद होते हैं। ये सीधे पौधों को लाभ नहीं देते, लेकिन मिट्टी के अन्य सूक्ष्मजीवों की संख्या को नियंत्रित करके संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।

इन सभी जीवों की सम्मिलित मेहनत से ही हमारी मिट्टी उपजाऊ रहती है। उर्वरक बनाने में, पोषक तत्व चक्रित करने में, बीमारियाँ रोकने में, मिट्टी को बांधकर रखने में और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम करने में इनकी बहुत अहम भूमिका है। अच्छी मिट्टी में ऐसे जीवों की अधिकता होती है और फसल भी उसी अनुपात में बेहतर होती है।

लेकिन आज की खेती की पद्धतियों ने इस अदृश्य दुनिया को कमजोर कर दिया है। रासायनिक उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल, बार-बार जुताई, कीटनाशकों का दुरुपयोग और बढ़ता तापमान इन जीवों की संख्या कम कर रहा है। शोध बताते हैं कि तापमान बढ़ने से मिट्टी की यह जैव विविधता लगभग एक-तिहाई तक घट सकती है। जब ये जीव कम हो जाते हैं, तो मिट्टी अपनी ताकत खोने लगती है। फसल भी कमजोर होती है और उत्पादन घटता है।

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अगर हमें मिट्टी को फिर से जीवंत बनाना है, तो कुछ सरल उपाय अपनाने होंगे। फसल चक्र बदलना, खेत में जैविक अवशेष छोड़ना, कम जुताई करना, कवर फसलें उगाना और जैविक खाद का उपयोग करना मिट्टी में सूक्ष्मजीवों को बढ़ाता है। राइजोबियम और अन्य बायोफर्टिलाइज़र जैसे पदार्थ भी खेतों में जीवन लौटाते हैं। इन उपायों से न केवल फसल की उपज बढ़ती है, बल्कि उर्वरकों पर होने वाला खर्च भी काफी कम होता है।

मिट्टी का यह अदृश्य संसार धरती का हृदय है। यदि इसे सुरक्षित रखा जाए तो फसलें हरी रहेंगी और पर्यावरण संतुलित रहेगा। किसान जब खेत की मिट्टी को हाथ में लेकर देखता है, तो वह केवल धूल नहीं छूता, बल्कि उन लाखों गृहस्थियों को महसूस करता है जो चुपचाप काम में लगी रहती हैं। विश्व मृदा दिवस हमें यह याद दिलाता है कि धरती को बचाना है तो मिट्टी की इस अदृश्य दुनिया को समझना और संभालना जरूरी है।