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लोक देवियाँ और छत्तीसगढ़ की शाक्त परम्परा

आचार्य ललित मुनि

छत्तीसगढ़ में शक्ति की उपासना प्रमुख रुप से की जाती है क्योंकि यहाँ का जनमानस इस बात को जानता है कि शक्ति के बिना सृष्टि की उत्पत्ति और विकास तथा सृष्टि के विनाश तक की कल्पना नहीं की जा सकती है। शाक्त परम्परा से संबंधित प्रमाण हमें यहां की मृण्यमयी मूर्तिकला, शिल्प, साहित्य, संस्कृति और जीवन शैली में सहज ही देखे जा सकते हैं।

छत्तीसगढ़ में देवियां ग्रामदेवी और कुलदेवी के रूप में पूजित हुई। राजा-महाराजाओं, जमींदारों और मालगुजार भी शक्ति उपासक हुआ करते थे उन्होंने अपनी राजधानी में देवियों को कुलदेवी के रूप में स्थापना की। बस्तर की दंतेश्वरी माता काकतीय राजवंश की कुलदेवी, सरगुजा की महामाया माता रक्सेल राजवंश की कुलदेवी तथा रतनपुर की महामाया माता हैहयवंशी ककचुरियों की कुलदेवी के रुप में विराजित एवं पूजित हैं। डोंगरगढ़ में स्थित बमलेश्वरी माता भी देवी उपासना का प्राचीन स्थल है।

यहाँ के लोक में देवी उपासना का प्रभाव बस्तर से लेकर सरगुजा तक दिखाई देती है। नवरात्रि के दिनों के अलावा विभिन्न पर्वों एवं त्यौहारों पर सतत पूजनीय हैं। जातीय एवं जनजातीय समाज समान रुप से देवी की उपासना करता है तथा प्राचीन इतिहास में शरभपुरियों से लेकर कल्चुरियों तक तथा फणि नागवंशियों से लेकर छिंदक नागवंशियों तक अपनाए गए शक्ति-उपासना के गूढ़ आयामों को अनुभव किया जा सकता है।

बस्तर की परम्परा में राज मान्यता प्राप्त देवियों में देवियों में केशरपाल की केशरपालीन, बस्तर की गंगादाई, गढ़मधोता की महिषासुर मर्दिनी, आमापाल की आमाबलिन, लोहड़ीगुड़ा की लोहड़ीगुड़ीन, बेड़ागांव की हिंगलाजीन, कोंडागांव की दाबागोसीन, बनियागांव की दुलारदाई प्रमुख है। बारसूर में पीलाबाई, कुरूसपाल में भैरव, दुर्गा, नारायणपुर में मावलीमाता, तेलीनघाट मुंडीन में तेलीन सती, बैलाडीला घाट की बंजारिन, दरभाघाट की बंजारिन माता को वनवासी पूजते हैं।

इसके साथ ही सरई शृंगारिणी माता, बुचीपुर की महामाई, मल्हार की डिडिनेश्वरी, तरेंगा राज की महामाई, चम्पापुर की चम्पई माता, मुंगई माता, पतई माता, छछान माता, सर्वमंगला माई, देवी रमई पाट, तपेश्वरी माता, मड़वा रानी, मोटियारी घाट की बंजारी माता, गरजई माता, करेला भवानी, केरापानी की रानी माई, खल्लारी माता, जटियाई माता, खुड़िया रानी, कुसलाई दाई, त्रिमुर्ति महामाया धमधा, तेलीन सत्ती माई, कुदुरगढ़िन माई, मावली माता सिंगारपुर, घटवारिन दाई अंगार मोती, बिलई माता, निरई माता इत्यादि वनांचल की प्रमुख देवियाँ हैं।

यहाँ के जनजातीय एवं जातीय ग्रामों में ग्राम देवी के रुप में प्रमुख रुप से शीतला माता की पूजा होती है। प्रत्येक ग्रामों में जल स्थान के समीप शीतला माता का स्थान होता है। इसके साथ ही अनुषांगी देवियों की उपासना होती है, जो लोक देवियों के रुप में विराजित हैं। इन लोक देवियों को उनके कार्य एवं मांग के अनुसार भोग चढ़ाया जाता है तथा पूजा की जाती है।

छत्तीसगढ़ के जसगीतों एवं माता सेवा गीतों में सतबहिनियों का जिक्र अवश्य आता है। ये जसगीत या माता सेवा गीत नवरात्रि के पर्व में माता सेवा के रुप में गाये जाते हैं। सतबहिनिया के नाम से पूजित सात प्रमुख देवियाँ होती हैं, जिन्हें अंचल में आस्था और श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। गावों में सतबहिनिया का स्थान भी होता है। इन्हें सात बहनें या “सात देवी” के रूप में पूजा जाता है, जो मुख्य रूप से ग्रामीण और जनजातीय समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं तथा इनका प्रभामंडल बहुत ही विस्तारित है।

सतबहिनिया के नाम से पूजित माता चंडी, माता काली, माता दुर्गा, माता अन्नपूर्णा, माता लक्ष्मी, माता सरस्वती, माता भवानी हैं, जिनकी पूजा एवं आराधना सकल समाज करता है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों और गांवों में इन देवियों की पूजा होती है। खासकर बस्तर, सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़, जशपुर, रायपुर और दुर्ग जैसे जिलों में इनकी विशेष मान्यता है। इनकी पूजा में गाँवों में सामूहिक अनुष्ठानिक रुप में होती है और इन्हें संकटों से मुक्ति और कल्याण की प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

छत्तीसगढ़ में सातबहिनियों से जुड़ी कई लोककथाएँ और आस्थाएँ प्रचलित हैं। यह कहा जाता है कि सातों बहनें विभिन्न शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो संकटों से मुक्ति दिलाती हैं। लोककथाओं में इनके चमत्कारिक कार्यों और देवताओं की सहायता करने की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। ग्रामीण समाज में यह मान्यता है कि ये देवियाँ गाँव और परिवार की रक्षा करती हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन की समस्याओं का समाधान होता है।

यहाँ नवरात्रि के दोनों पक्षों में माता की उपासना तो होती है परन्तु भाई दूज के दिन ‘देवारी पर्व’ से जुड़ा एक और महाआयोजन गाँव गाँव में मातर का आयोजन सम्पन्न होता है इसमें सम्पूर्ण गाँव की सहभागिता दिखाई पड़ती है। वैसे तो राऊत जाति का सामूहिक पर्व है, जिसमें राऊत लोग मातर अर्थात् मातृशक्ति की नृत्य मय आराधना करते हैं। सारा गाँव आबाल-वृद्ध स्त्री-पुरुष दर्शक के रूप में शामिल होता है। मातर का अर्थ है ‘माता’। यादवों द्वारा धरती माता, जन्म देने वाली माता, ग्रामदेवी और गौमाता की पूजा की जाती है। गड़वा बाजा के साथ दोहों का उच्चारण कर काछन चढ़ते है, और मनोहारी नृत्य करते हैं। हाथों में तेंदूसार की लाठी, माथे पर पगड़ी में कलगी तथा रंगीन वेशभूषा मन-प्राण को आनंदित करती है।

छत्तीसगढ़ में शक्ति उपासना एक जीवंत परंपरा है, जो यहाँ की मूर्तिकला, साहित्य, संस्कृति और लोक जीवन में समाई हुई है। बस्तर की दंतेश्वरी से लेकर डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी और सतबहिनिया तक, ये देवियाँ ग्रामदेवी, कुलदेवी और लोक देवियों के रूप में पूजित हैं। यहाँ के प्रमुख देवी स्थल इस राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक हैं। शक्ति पूजा के ये आयाम न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं, बल्कि सामुदायिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान को भी बढ़ावा देते हैं। छत्तीसगढ़ की यह शाक्त परंपरा आज भी जीवंत है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

One thought on “लोक देवियाँ और छत्तीसगढ़ की शाक्त परम्परा

  • April 5, 2025 at 10:34
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    जय जय माँ दुर्गे
    🙏🙏

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