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भारत में व्यापारिक चिंताएँ, चीन के बढ़ते शुल्क के बीच आयातों में संभावित वृद्धि का आकलन

वर्तमान व्यापारिक तनावों के बीच, चीन ने डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ के जवाब में सभी अमेरिकी आयातों पर 34% शुल्क लगाने का ऐलान किया है। इस कदम से संबंधित संभावित प्रभावों का आकलन करने के लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने 9 अप्रैल को लागू होने वाले प्रतिकारात्मक शुल्क के बाद आयातों में वृद्धि पर एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की। अधिकारियों का मानना है कि चीन के शुल्कों में वृद्धि के कारण चीनी उत्पादों की अधिक आपूर्ति हो सकती है, खासकर जब अमेरिकी टैरिफ़ में 34% की बढ़ोतरी हो चुकी है, जो पहले 20% था। इस नई स्थिति में, अधिकारियों का ध्यान इस बात पर है कि चीन के अधिशेष उत्पादों का भारतीय बाजार में आना बढ़ सकता है, और यह देश की घरेलू उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है।

चीन से आयातों में वृद्धि की चिंता

अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ़ के असर के कारण भारत के व्यापारिक अधिकारियों में चिंता बढ़ गई है। वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, चीनी उत्पादों की आपूर्ति में और वृद्धि हो सकती है, क्योंकि चीन पहले से ही अपने उत्पादों के अधिक उत्पादन से जूझ रहा है। यही नहीं, ट्रंप द्वारा स्टील और एल्युमिनियम पर 25% शुल्क लगाने के बाद भारतीय स्टील निर्माता भी इस विषय को लेकर सरकार से चिंतित थे। इस मुद्दे पर मंत्रालय ने पहले ही स्टील के आयात पर 12% सुरक्षात्मक शुल्क लगाने का सुझाव दिया था, लेकिन छोटे उद्योगों के लिए यह चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि इससे स्टील की कीमतें बढ़ सकती हैं।

अर्थशास्त्रियों का अनुमान: चीनी माल का अधिक आयात भारत में हो सकता है

एचडीएफसी बैंक के एक हालिया शोध नोट में कहा गया है कि अमेरिकी टैरिफ़ से भारतीय निर्यातों पर सीधा प्रभाव तो पड़ेगा ही, लेकिन चीनी माल की अधिक आपूर्ति भारत के लिए एक और चुनौती बन सकती है। बैंक की प्रमुख अर्थशास्त्री, साक्षी गुप्ता ने इस संबंध में कहा, “चीनी सामानों पर टैरिफ़ की बढ़ोतरी के बाद अब यह संभावना है कि अधिक चीनी उत्पाद अन्य बाजारों में जाएंगे। इससे भारत जैसे देशों के घरेलू निर्माण उद्योगों को सस्ते चीनी माल की अधिक आपूर्ति का सामना करना पड़ सकता है।”

इसके अलावा, क्रिसिल रेटिंग्स ने भी चिंता व्यक्त की है कि चीन के इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और वस्त्र उत्पादों की अधिक आपूर्ति भारत में हो सकती है। भारत सरकार इस खतरे से निपटने के लिए एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने पर विचार कर सकती है ताकि घरेलू उत्पादकों की रक्षा की जा सके।

वैश्विक व्यापार पर असर और चीन के मुकाबले भारत की स्थिति

अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक लोवी इंस्टीट्यूट की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में करीब 80% देशों का व्यापार चीन के साथ अधिक था, जबकि अमेरिका के साथ उनका व्यापार कम हुआ है। हालांकि, अमेरिका अभी भी वैश्विक मांग का प्रमुख चालक बना हुआ है, खासकर जब अमेरिका ने वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों से आयात बढ़ाए हैं, ताकि चीन से निर्भरता कम की जा सके।

वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल (GTRI) के पूर्व प्रमुख अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत को अमेरिकी-चीन व्यापार युद्ध के बीच में आने से बचना चाहिए। उन्होंने बताया कि दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे पर 34% शुल्क लगाने से अमेरिका से चीन के द्वारा आयात किए गए सोयाबीन और मक्का जैसी वस्तुओं का अधिक अधिशेष हो सकता है, जो कि भारत पर दबाव बना सकता है।

भारत का स्टैंड: एंटी-डंपिंग ड्यूटी और संभावित प्रतिक्रिया

भारत सरकार ने हाल ही में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के द्वारा जारी किए गए राष्ट्रीय व्यापार अनुमान रिपोर्ट का भी जिक्र किया है, जिसमें कहा गया है कि भारत इथेनॉल के आयात पर प्रतिबंध लगाता है और इसके लिए लाइसेंस की आवश्यकता होती है। रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि यदि भारत इथेनॉल या मक्का के आयात पर टैरिफ़ कम करता है, तो यह चीन द्वारा गलत रूप में लिया जा सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप, चीन की महत्वपूर्ण निर्यात वस्तुएं जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी की आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है, जैसा कि पिछले महीनों में देखा गया है।

भारत के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वैश्विक व्यापार गतिशीलता तेजी से बदल रही है और ऐसे में उसे संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है ताकि किसी भी व्यापारिक युद्ध का दुष्प्रभाव कम से कम हो सके। यह लेख अब भारतीय संदर्भ में भारतीय नीति, अर्थशास्त्रियों के विचारों और वैश्विक व्यापार के प्रभावों के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि यह अधिक प्राकृतिक और मूल हो।

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