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छत्तीसघाट : पत्रकार अनिल द्विवेदी की टिप्पणी

हर वह इंसान जो अन्न खाता है, दिन भर में या रात को देश के समाचार चैनलों में प्राइमटाइम जरूर देखता होगा. मुझ जैसों के लिए तो यह बौदिधक खुराक है. हालांकि डिबेट के नाम पर अधिकांश चैनल सुर्खियों के कीमियागर होकर रह गए हैं.
टीआरपी का लालच कह लें जिसके चलते एनडीटीवी सहित कुछ चैनलों ने पिछले सात अगस्त को एक सनसनीखेज आरोप उछाला कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में जो अन्तरराष्ट्रीय पुरातात्विक संगोष्ठी चल रही है, उसका भगवाकरण किया जा रहा है! कहावत है कि घर को लगी आग घर के चिराग से. कुछ अपनों ने भोले-भाले छात्रों को भड़काया तो वे भगवाकरण का गर्दभराग अलापने लगे. हालांकि वे पहले दरजे के गोबर गणेश निकले क्योंकि इसे साबित नही कर सके. हां, आयोजन को पब्लिसिटी जरूर मिल गई.
इसके उलट, थाईलैंड सहित देशभर से आए विदवानों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए समझाया और सिद्ध किया कि मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम को दुनियाभर में आदर्श राजा के तौर पर क्यों देखा जाता है! अंचल के इतिहासकार डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र और राजीव रंजन प्रसाद जी ने आश्चचर्य जताया कि भगवान राम के वनवास का अधिकांश हिस्सा दण्डकारण्य, बस्तर में बीता मगर रिसॅर्च के नाम पर कोई मानेखेज काम नही हो सका. तो ऐसी पुण्यधरा, जहां वनवास के 10 बरस भगवान राम ने बिताए हों या छत्तीसगढ़ जिनका ननिहाल हो, वहां ऐसी पुरातात्विक संगोष्ठी होना तो न्यायपरक ही माना जायेगा?
रिसॅर्च स्कॉलर के नाते मैंने भी शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि आठ हजार साल पुरानी सभ्यता के इतिहास का शिखर वक्तव्य हैं भगवान राम. राम ने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, यहाँ तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा. वाल्मीकि ने तो उनके व्यक्तित्व पर चौबीस हजार श्लोक ही रच दिए. इनका परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है. रामजी ने अच्छा शासन किया इसलिए लोग रामराज्य’ की उपमा देते हैं.
अत: जो राम को जानते-मानते-समझते नही हैं, वे ही ऐसे आधारहीन और अतार्किक सवाल खड़ा करते हैं. उन्हें समझना चाहिए कि जितने ज्यादा सवाल और शंका जाहिर करेंगे, भगवान राम पर आस्था उतनी ही गहराती जाएगी. ये आरोप तो कुछ नही हैं. भारत के एक राजनेता ने तो भगवान राम को शराबी और डरपोक तक कहा था. एक राजनीतिक दल ने तो उनके अस्तित्व को ही नकार दिया. नासा तक ने रामसेतु को प्रमाणित किया परंतु राजनीतिक दल भगवान राम को काल्पनिक बताते हैं. क्या इससे हिन्दु समाज की भावनाएं आहत नही होती होंगी.आश्चर्य कि मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा देकर सत्ता में आए राजनीतिक दल ने भी चुप्पी साधे रखी. अच्छा जरा बताइये कि हमारे देश में राष्ट्रपति से भी बढ़कर कौन है! आप कहेंगे संविधान. कभी खोलकर देखिएगा उसे. पहले पन्ने पर राजा राम और सीता की तस्वीर दिखाई देगी. स्पष्ट है कि देश का शासक या शासन, मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम की तरह होना चाहिए. फिर हिन्दु समाज उतना ही उदार है जितना कि खुद भगवान राम थे. रावण मृत्युशैया पर था तो उन्होंने लक्ष्मण को दशानन से युदध.नीति सीखने को प्रेरित किया. फिर हम जेहादी भी नही हैं जो पैगम्बर का मात्र एक कार्टून बनाने के नाम पर शार्लोआब्दी के संपादक और पत्रकारों को गोलियों से भून देते हैं.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी लोकतंत्र में रामराज्य की वकालत की. आजादी दिलाने के लिए उन्होंने जितने भी आंदोलन किए, सब भगवान राम की पैदल यात्रा से प्रेरित रहे. यंगइंडिया’ में लिखी एक संपादकीय वे कहते हैं : दांडी यात्रा के दौरान भगवान राम मुझे पैदल चलने की प्रेरणा देते हैं.’ हम तो नैमिषारण्यी हैं. ईश्वर के अस्तित्व पर भी खुलकर कहते-सुनते हैं. हम प्रतिक्रिया और प्रतिशोध की कायर हिंसा के बल पर नहीं, अपनी आस्था, अपने विचार, अपनी अहिंसा और अपने धर्म की अक्षुण्ण शक्ति से टिके हुए हैं. करनी के फल से मेरे धर्म ने भगवान के किसी अवतार को भी नहीं छोड़ा. ईश्वर तो कर्म-अकर्म से परे है इसलिए कर्मफल से परे है लेकिन ईश्वर के हर अवतार को अपने किए का फल भुगतना पड़ा. ब्रम्हा ने ही यह सृष्टि रची है लेकिन वे अपनी पुत्री सरस्वती पर आसक्त हो गए थे इसलिए पुष्कर को छोड़ कहीं और उनका मंदिर नही और न ही पूजे जाते हैं. मेरा धर्म मुझे पूरी स्वतंत्रता देता है कि मैं अपना आराध्य, अपनी पूजा या साधना पद्धति और अपनी जीवन शैली अपनी आस्था के अनुसार चुन और तय कर सकूं. जरूरी नहीं कि चोटी रखूं, जनेउं पहनूं, धोती-कुर्ता या अंगवस्त्र धारण करूं. रोज संध्या वंदन करूं या सुबह—शाम मंदिर जाउं, पूजा करूं, आरती उतारूं या तीर्थों में जाकर पवित्र नदियों का स्नान करूं. यह धार्मिक स्वतंत्रता ही मुझे पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक होने का जन्मजात संस्कार देती है. इ​सलिए कल्पना, कलम और कूची के साथ आलोचनारूपी खरदूषणों से लड़ते रहेंगे.

अनिल_द्विवेदी
लेखक पत्रकार हैं