जल संरक्षण कानूनों का कड़ाई से पालन हो

आज विश्व जल दिवस है, जब विश्व किसी चीज को लेकर दिवस मनाने लग जाता है तब मैं समझता हूँ कि यह खतरे की घंटी है। जिस तरह से मीठे जल का दोहन किया जा रहा है, उससे तो यह तय है कि आगामी पन्द्रह बीस वर्षों के के बाद जल संकट भीषण रुप धारण कर लेगा। इसलिए अभी भी समय है कि हम चेत जाएं। पानी बचाओ के नारे में मैं कुछ संशोधन करना चाहता हूँ, पानी बचाईए अवश्य, पर वर्षा जल का संग्रहण कीजिए, जो नालियों में बहता हुआ व्यर्थ हो जाता है। समझ लीजिए वर्षा जल संग्रहण ही पानी बचाना है।


पानी को लेकर पूरा विश्व चिंतित है, केपटाऊन के हालात देखने के बाद लोगों को लगने लगा है कि अगर जल संग्रहण नहीं किया तो दुनिया दशा और दिशा दोनों खराब हो जाएगी तथा यह पृथ्वी पर बड़े संकट के रुप में सामने आ रहा है। आज से तीस वर्ष पहले हमने सोचा नहीं था कि पानी बोतल में बिकेगा। परन्तु आज हम देख रहे हैं कि पानी भी दूध की कीमत पर बिक रहा है। बीस रुपए का दूध खरीदने की बजाए लोग पानी की एक बोतल खरीदना पसंद करते हैं, जबकि प्यास तो दोनों से ही बुझेगी।
वर्तमान में दुनिया के दस शहरों को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ रहा है, वहाँ त्राहि त्राहि मची हुई है, कई स्थानों पर जल स्रोतों पर बंदुकधारी सुरक्षा बैठा दी गई है। डाऊन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार 400 मिलियन लोग ऐसे शहरों में रहते हैं जहाँ बारहमास पानी की समस्या बनी रहती है, 2050 तक यह संख्या एक अरब पहुंचने वाली है। इस तरह दुनिया भर के 36% शहरों को 2050 तक भीषण जल संकट का सामना करना पड़ेगा। 2050 तक शहरों में 80% जल की मांग बढ़ जाएगी, जो बिना जल संरक्षण के संभव नहीं है।
पत्रिका कहती है कि दुनिया के 200 शहर जल संकट के दायरे में आ चुके हैं तथा विश्व के दस शहर तेजी से निर्जलीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। जिसमें भारत का बेंगलुरु शहर प्रमुख है, इसके साथ चीन का बीजिंग, मैक्सिको का मैक्सिको सिटी, यमन का साना, नैरोबी का केन्या, तुर्की का इस्तांबुल, ब्राजील का साओ पाउलो शहर भीषण जल संकट से जूझने वाला है। इस तरह भविष्य की विभिषिका का आंकलन गंभीरता के साथ करना आवश्यक है।
विगत कुछ दशकों से देख रहे हैं कि ग्रामीण अंचल में प्राकृतिक जल के स्रोतों के साथ मानव निर्मित तालाब एवं कुंए भी सूखते जा रहे हैं। इसके पीछे मानव की अकर्मण्यता ही दिखाई दे रही है। लोगों ने घर घर में बोरिंग खुदवा लिए, इसलिए कुंओं, बावड़ियों का उपयोग खत्म हो गया। प्रत्येक शहर एवं गांव में कुंए तथा बावड़ियाँ कचरे का घुरवा बनती जा रहे हैं। जिससे उनका जल स्रोत भी प्रदूषित हो रहा है। इसके साथ ही बोरिंगों के अत्याधिक खनन से जल का स्रोत काफ़ी नीचे चला गया है।
सबसे पहले सभी कुंओं एवं बावड़ियों की सफ़ाई होनी चाहिए तथा बोरिंग खनन में प्रतिबंध लगाना चाहिए। इसके साथ ही कल कारखानों का निर्माण प्राकृतिक जल स्रोतों के समीप नहीं होना चाहिए। इन कारखानों के अपशिष्ट का वाहन नदियां बन रही हैं जिससे मीठा जल प्रदूषित हो रहा है। कई नदियाँ तो मर चुकी हैं या मृत्यु की कगार पर खड़ी हैं। जल संकट एवं उसकी विभिषिका को ध्यान में रखते हुए, जल संरक्षण के समस्त उपायों को फ़ाईलों एवं नारों से निकाल कर धरातल पर लाना होगा।
ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका नामक स्थानीय निकायों को कुओं एवं बावड़ियों की सफ़ाई तथा जीर्णोद्धार कर उनका उपयोग पुन: प्रारंभ करने के लिए आवश्यक कार्यवाही करनी चाहिए तथा शासन को तालाबों की संख्या बढ़ाने पर जोर देना चाहिए जिससे वर्षा जल का संग्रहण हो सके एवं भूजल का स्तर बढ़ सके।
इसके साथ घर घर में वर्षा जल संरक्षण के लिए वाटर हार्वेस्टिंग के निर्माण का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना चाहिए। अगर जल संकट की भविष्य की चेतावनियों से भी हम न चेते तो भविष्य में मानव सभ्यता विनाश होगा और इसका उत्तरदायी सिर्फ़ वर्तमान का मानव समाज ही होगा। वर्षा जल संरक्षण के समस्त उपाय करना अत्यावश्यक है। कहा गया है कि केरा तबहिं न चेतिया, जग ढिंग लागी बेर……

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Posted by on Mar 22 2018. Filed under सम्पादकीय. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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