दवा की खुराक ऐसी न हो कि मरीज ही मर जाए

रेल का किराया एकाएक बढा दिया गया, जिससे आम यात्री की जेब पर अचानक बोझ बढ़ गया। मंहगाई वैसे ही कमर तोड़ रही है। अच्छे दिनों की आशा ने मोदी सरकार को आशा से अधिक सीटें देकर संसद में बहुमत प्रदान किया और दिल्ली में सरकार बनवा दी। सरकार बनने के एक महीने के भीतर गैस, पैट्रोल, डीजल, एवं रेलभाड़े के बढने की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी । पिछली सरकार ने भी इन चीजों के दाम बढाने में कोई कमी नहीं रखी। इनके दाम बढने का सीधा असर अन्य आवश्यक वस्तुओं पर भी पड़ता है। परिवहन दर में वृद्धि होने पर खाद्यान्न एवं आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ जाते है।
मोदी सरकार ने कुछ दिनों पूर्व अप्रिय फ़ैसले लेने की बात कही थी। जो जनता को पसंद नही आएंगे, उसकी शुरुआत रेल का किराया बढने से हो गई। रेल का किराया 14 प्रतिशत से अधिक बढा दिया गया और माल भाड़े में भी वृद्धि की गई। सरकार का कहना है कि खजाना खाली हो गया है और उसे भरने के लिए कड़े कदम उठाने होगें। यह कड़ूवी द्वाई पिलाने जैसी बात है, कहीं दवा की खुराक ऐसी न हो कि मरीज ही मर जाए।  साथ ही भाजपा के प्रवक्ता बचकानी दलील दे रहे हैं कि यह फ़ैसला पिछली सरकार का है। अगर पिछली सरकार का फ़ैसला है तो ऐसी कौन सी बाध्यता है कि जो इसे लागु किया जाए। सरकार फ़ैसला बदल भी सकती है।
किराया बढाने के साथ यात्री सुविधा बढाने वाली बात थोड़ी राहत दे सकती है। परन्तु भारतीय रेल के यात्रियों की असुविधाओं को ध्यान में रख कर यात्री सुविधाएँ विकसित की जानी चाहिए। प्रथमत: तो तत्काल के नाम पर घोटाला बंद किया जाना चाहिए। तत्काल कोटा बना कर यात्रियों की जेब पर डाका डाला जा रहा है और इस कोटे में भी वेटिंग टिकिट दी जाती है, जो नान रिफ़ंडेबल होती है। अगर कोई यात्री मजबूरी में तत्काल की वेटिंग टिकिट ले लेता है और कन्फ़र्म नहीं होती तो उसके पैसे भी रेल्वे हजम कर जाती है। पहले तत्काल का अर्थ था कि गाड़ी चलने से पहले जो टिकिट रद्द कराई जाती थी उन्हें करंट टिकिट की खिड़की से बेच दिया जाता था। अभी तो ट्रेन में आधी सीटों को तत्काल कोटे में डाल दिया गया है। जिससे ट्रेन चलने के समय तक सामान्य कोटे के वेटिंग टिकिट धारी की टिकिट कन्फ़र्म नहीं हो पाती।
इसके साथ ही यात्रियों के जानमाल की पूरी सुरक्षा होनी चाहिए। नीतिश कुमार के रेलमंत्री बनने से पहले यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जीआरपी की थी। उसे आर पी एफ़ को दे दिया गया। पहले आर पी एफ़ का काम सिर्फ़ रेल्वे की संपत्ति की रक्षा करना था। अब दोनों सुरक्षा बलों में तालमेल के अभाव के कारण ट्रेन में चोरी डकैती एवं अन्य आपराधिक घटनाएँ होती हैं। आम आदमी कार्यवाही के इंतजार में दोनो सुरक्षा बलों के अहम का शिकार होकर पेंडुलम की तरह इधर-उधर लटकता रहता है। यात्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी एक बल को दी जानी चाहिए।
स्लीपर में जगह न मिलने पर सामान्य कोच में लम्बी दूरी के यात्री को यात्रा करनी पड़ती है, इससे स्थानीय सवारियों को तकलीफ़ होती है। दैनिक यात्रा करने वाले भी परेशान रहते हैं। इसलिए सामान्य कोच में व्यवस्था करनी चाहिए कि सीटों से अधिक टिकिट न बेची जाएं। जिससे यात्री भेड़ बकरी की तरह यात्रा करने से बच पाएगा तथा दुर्घटनाओं में कमी आएगी। चलती हुई ट्रेन पकड़ने के चक्कर में अत्यधिक दुर्घटनाएँ होती हैं। रेल्वे की खान-पान सेवा भी माशा अल्ला है। अगर कोई यात्री पेंट्रीकार में घुस कर खाना बनते हुए देख ले तो जीवन में पैंट्री का खाना नहीं खाएगा। खाने की गुणवत्ता के साथ पैंट्रीकार का स्तर भी सुधरना चाहिए।
पेयजल की समस्या सभी स्टेशनों पर प्राय: दिखाई देती है। इससे यात्रियों को विभिन्न कम्पनियों के पेयजल की बोतल मंहगे में खरीद कर पीनी पड़ती है। इस वर्ष ट्रेनों में लोकल ब्रांड की पानी की बोतलें भी 20 रुपए प्रति बोतल बिकती हुई दिखाई दी। 20 रुपए में तो आधा लीटर दूध आ जाता है। आज रेलयात्री को दूध की कीमत पर पानी खरीदना पड़ रहा है। इसलिए सभी मुख्य स्टेशनों पर शुद्ध पेयजल की व्यवस्था होनी चाहिए। जिससे यात्रा के दौरान जलजनित बीमारियों से बचा जा सके। साथ वेंडरों द्वारा अधिक मूल्य पर खाद्य सामग्री बेचे जाने पर भी लगाम लगनी चाहिए। इसके लिए रेल्वे के वाणिज्य विभाग की जवाबदेही तय की जानी चाही।
यात्रा के दौरान बड़ी अजीब स्थिति हो जाती है जब आप भोजन कर रहे हों और कोई आपसे भोजन मांग ले। यात्रा के दौरान व्यक्ति सीमित भोजन लेकर ही चलता है। भिखारियों के द्वारा रुपया पैसा मांगना यात्री को शर्मिंदा करता है। साथ ही हिजड़ों ने पूरे भारत में रेल के प्रमुख स्टेशनों में अपने अड्डे बना रखे हैं जो यात्रियों की बेईज्जती करके उनसे पैसे वसूल करते हैं। कुछ दिनों पूर्व हिजड़ों द्वारा किसी यात्री को ट्रेन से बाहर धकेलने की भी खबर समाचार पत्रों में आई थी। परिवार के साथ सफ़र कर रहा व्यक्ति इनकी हिंसा का शिकार कब हो जाए इसका पता नहीं चलता। ये टीटी और सुरक्षा बलों की नाक के नीचे जबरिया वसूली करते हैं। ट्रेन का ऐसा कोई भी यात्री नहीं होगा जिसका पाला इनसे नहीं पड़ा होगा। भिखारियों एवं हिजड़ों को ट्रेनों में कड़ाई से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
रेल्वे ने बहुत सारे कार्य ठेके पर दे दिए हैं, जिनमें से ट्रेनों में पानी भरना भी एक है। कई बार ट्रेनों की बोगियों में पानी नहीं भरा जाता और ट्रेन गंतव्य स्थान से रवाना कर दी जाती है। इनकी बदमाशी को यात्री सफ़र के दौरान भुगतते हैं हजार बार शिकायत दर्ज कराने पर भी ट्रेनों में पानी नहीं भरा जाता। यही हाल बोगियों की साफ़ सफ़ाई का भी है। कुछ ट्रेनों में ही सफ़ाई कर्मी दिखाई देते हैं बाकी भगवान भरोसे चल रही हैं। वातानुकूलित बोगियों के यात्रियों को दिए जाने वाले चादर और कंबलों की सफ़ाई नहीं रहती। उन्हें गंदे ही थमा दिए जाते हैं। स्थिति यह हो गई है कि भारतीय रेल समस्याओं एवं असुविधाओं का पिटारा हो गयी है। परिवार लेकर यात्रा में निकला हुआ व्यक्ति किस-किस के साथ पंगा लेगा। इसमें चुप रह कर यात्रा पूरी करने में ही अपनी भलाई समझता है।
दो महीने पहले टिकिट आरक्षण करवाने पर यात्री को उसके जमा के बदले ब्याज के रुप में टिकिट में छूट दी जानी चाहिए। दो महीने तक रेल्वे विभाग उसके पैसों का उपयोग करता है। एक बार ट्रेन चलने के बाद यह टीटीयों के हवाले हो जाती है, जो चाहे करें इनकी मर्जी। क्रमवार प्रतीक्षा सूचि के यात्रियों को सीट नहीं देते, जो इन्हें भेंट चढा देता है उस की सीट कन्फ़र्म कर दी जाती है। ट्रेन में टीटीयों की मनमानी बंद होनी चाहिए।
यदि ट्रेन का किराया बढाया जा रहा है तो सरकार यात्रियों सुविधाओं की विस्तार की ओर ध्यान देना चाहिए। अगर यात्री सुविधाओं को विस्तार दिया जाएगा और यात्री सकुशलता की गारंटी होगी तो बढा हुआ किराया भी तकलीफ़देह नहीं है। भारत एक  विकासशील देश हैं जहां 50 प्रतिशत जनता आज भी दो वक्त की रोटी के लिए कमरतोड़ मेहनत करती है, जब उनकी जेब पर अत्यधिक भार डाला जा रहा है तो उन्हें बढे हुए किराए के साथ सुविधाएं भी मिलनी चाहिए, तभी अच्छे दिन आएगें।

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Posted by on Jun 23 2014. Filed under सम्पादकीय. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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