खोपड़ी: महापाषाण कालीन सभ्यता का साक्षी

भूगोल में किसी एक प्रदेश या भूखंड में सभ्यताएं स्थाई नहीं रही। प्रकृति के चक्र के साथ नया बनता गया तो पुराना उजड़ता गया। जब आर्यावर्त की सभ्यता डंके सारे विश्व में बजते थे तब आज के शक्तिशाली राज्य अमेरिका नामो निशान भी नहीं था। महाभारत के युद्ध में सब कुछ गंवा देने के बाद आर्यावर्त में नई सभ्यता का उदय हो रहा था। तब इस काल में मिश्र की सभ्यता उत्कर्ष पर थी और हम पुन: विकास की ओर बढ रहे थे। इन सभ्यताओं के उदय एवं पतन के साक्ष्य धरती पर पाए जाते हैं, प्राचीन काल के मानव एवं उसकी सभ्यता को जानने के लिए पुरातत्व पर आश्रित होना पड़ता है। पुरातत्ववेत्ता तकनीकि प्रमाणों के आधार पर प्राचीन सभ्यता को सामने लाते हैं।
माला चा गोटा
अध्ययन की दृष्टि से इतिहास को कई कालखंडों में विभाजित किया गया है। इसमें एक काल खंड मेगालिथिक पीरियड (महापाषाण काल) कहलाता है। भारतवर्ष में विशाल पाषाणखंडों से बनी कुछ समाधियाँ (मृतक स्मृतियाँ) प्राप्त होती हैं जिन्हें महापाषाणीय स्मारक के नाम से सम्बोधित करते हैं। जिस काल में इनका निर्माण हुआ उसे महापाषाण काल कहते हैं। महाराष्ट्र प्रदेश के विदर्भ अंचल में नागपुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर कुही कस्बा है। इस क्षेत्र में महापाषाण कालीन अवशेष पाए जाते हैं। जिसके उत्खनन की जानकारी मुझे डेक्कन कॉलेज के डॉ कांति पवार सहायक प्राध्यापक डेक्कन कॉलेज द्वारा प्राप्त हुई थी। उनके सहयोगियों एवं विद्यार्थियों द्वारा इस उत्खनन कार्य को अंजाम दिया जा रहा था। इस महापाषाण कालीन स्थल पर उत्खनन हो रहे उत्खनन कार्य को मैं देखना चाहता था।
माला चा गोटा
मुंबई से लौटते हुए उत्खनन निदेशक कांति पवार को फ़ोन करने के पश्चात ज्ञात हुआ कि वे कुही में ही हैं। आज गर्मी बहुत अधिक थी, लू भी चल रही थी। पारा सातवें आसमान पर था, परन्तु उत्खनन स्थल पर पहुंचने की ललक ने तपते हुए सूरज का अहसास नहीं होने दिया। नागपुर से उमरेड़ मार्ग पर पाँच गाँव से बाँए हाथ को कुही के लिए रास्ता जाता है। इस रास्ते पर पत्थर की खदाने भी दिखाई देती हैं। जिनमें अभी उत्खनन जारी है। प्रारंभ में तो रास्ता धूल घक्कड़ से भरा हुआ है परन्तु आगे बढने पर ग्रामीण वातावरण की झलक दिखाई देने लगती है। हम लगभग भोजन के समय ही कुही पहुंचे। डॉ कांति पवार भोजन के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने साथ ही भोजन किया और साईड देखने चल पड़े।
महापाषाण कालीन स्मारक
कुही कस्बे से थोड़ी दूर पर “माला च गोटा” नामक महापाषाण कालीन स्थल है। देखने से प्रतीत होता है कभी यह घन घोर वन क्षेत्र रहा होगा। सड़क के बांई तरफ़ बड़े पत्थरों का गोला बना हुआ है। जिसका ब्यास लगभग 15 मीटर होगा। इसे मेगालिथिक सर्कल (महापाषाण कालीन वृत) कहते हैं। इस सर्कल में सफ़ेद पत्थरों का प्रयोग किया गया है। शायद आस पास कहीं इन पत्थरों की उपलब्धता हो। पत्थरों का आकार बड़ा होने से ज्ञात होता है कि इस स्थान पर दफ़्न किया गया व्यक्ति सामाजिक दृष्टि से उच्च स्थान एवं सम्मान का पात्र होगा। अन्य स्थानों पर मेगालिथिक सर्कल मिलते हैं पर बड़े आकार के पत्थर मेंरी दृष्टि में देखने में नहीं आए। अगर इन पत्थरों को ध्यान से देखें तो “स्टोंन हेंज” की संरचना सामने आती है। उसमें गढे हुए पत्थर हैं और ये अनगढ़, बस फ़र्क इतना ही है। स्टोन हेंज एवं माला च गोटा दोनो को बनाने का प्रयोजन एक ही रहा होगा।
उत्खनन कार्य
स्मृति शब्द से ही  स्मरण रखने, करने का अर्थ निकलता है। वर्तमान में भी हम देखते हैं कि किसी की मृत्यू होने के पश्चात उसे याद रखने के लिए लोग मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ, स्कूल एवं प्रतिमाओं का निर्माण करवाते हैं। यही याद रखने वाली एषणा मनुष्य की सभ्यता के साथ चली आ रही है। इस नश्वर लोक में व्यक्ति कुछ ऐसा कर जाना चाहता है कि जिससे उसे युग युगांतर आने वाली पीढियाँ याद कर सकें, स्मृति में संजोकर स्मरण कर सकें।  महापाषाण काल में भी मृतकों के लिए स्मारकों का निर्माण किया जाता था। मृतक के अंतिम यात्रा स्थल पर स्मृति स्वरुप विशालकाय पत्थरों का प्रयोग किया जाता था। किसी कब्र के स्थान पर एक पत्थर प्राप्त होता है किसी स्थान पर स्मृति वृत बना हुआ प्राप्त होता है। मृतक के साथ उसकी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएँ एवं उसकी निजी प्रिय वस्तुओं को भी दफ़नाया जाता था। इस मैगालिथिक सर्कल में मुझे 3 बड़े गड्ढे दिखाई, जाहिर होता है कि “ट्रेजर हंटर्स” ने खजाने की खोज में इसे भी खोद डाला।
उत्खनन में प्राप्त मृदाभांड के टुकड़े
मेगालिथिक सर्कल एक टीले पर बना हुआ है। इसके बांई तरफ़ एक नाला बहता है और नाले के उस तरफ़ भी ऊंचाई वाला स्थान है। यही उत्खनन कार्य चल रहा है। इस स्थल के समीप ही नाग नदी बहती है। हमने स्थल निरीक्षण किया और पाया कि इस स्थान पर अन्य मेगालिथिक प्रमाण भी उपस्थित हैं। उत्खनन स्थल “खोपड़ी” कहलाता है। इसे रीठी गाँव कहते हैं। रीठी गाँव से तात्पर्य है वीरान गाँव, जो कभी आबाद था और उजड़ गया। राजस्व रिकार्ड में खोपड़ी गाँव का नाम दर्ज है और उसका रकबा भी है। परन्तु स्थान पर कोई बसाहट नहीं है। प्राचीन काल में इस स्थान पर मानवों की बड़ी आबादी रही होगी। जिसके अवशेष उत्खनन में प्राप्त हो रहे हैं। 5 वर्ष पूर्व इस स्थान सर्वेक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुराविद डॉ सुभाष खमारी ने किया था तथा वर्तमान में उत्खनन कार्य डेक्कन कॉलेज के उत्खनन निदेशक कांति पवार के निर्देशन में  डॉ गुरुदास शेटे, डॉ रेशमा सांवत के द्वारा किया जा रहा है।
उत्खनन स्थल पर डॉ रेशमा सावंत, ललित शर्मा एवं किसान भाऊ
डॉ कांति पवार ने बताया कि इस स्थान से उत्खन में भूतल के तीन स्तर पाए गए हैं, साथ ही अस्थियाँ, काले एवँ लाल मृदाभांड के टुकड़े एवं चित्रित मृदा भांड अवशेष, खाद्यान्न जमा करने के बड़े भांड, सिल बट्टा, लोहे का चीजल, लोहे की छड़ एवं अन्य सामग्री प्राप्त हुई है। जो इतिहास की नई परतें प्रकाश में ला रही हैं। महापाषाण काल की संस्कृति को लगभग 3500 वर्ष प्राचीन माना जाता है। उत्खनन धीमी गति से पर पुरातात्विय मानकों के आधार पर किया जा रहा है। जिससे की एक भी प्रमाण नष्ट न होने पाए। इस उत्खनन स्थल की 15 हेक्टेयर भूमि पे खेत हैं जिनमें गेंहू की फ़सल बोई गई थी। यह भूमि कुही के किसी जमीदार की है। उन्होने इसे उत्खनन कार्य के लिए सौंप दिया है। किसी को अपनी निजी भूमि पर उत्खनन कार्य कराने के लिए तैयार करना ही बड़ी बात होती है।
डॉ कांति पवार (सहायक प्राध्यापक डेक्कन महाविद्यालय पुणे)
डॉ कांति पवार कहते हैं कि महापाषाण कालीन उपलब्धियों से कुही क्षेत्र समृद्द है। कुही ब्लॉक के 30 किलोमीटर के दायरे में अड़म, मांडल, पचखेड़ी, पोड़ासा, राजोला, लोहरा इत्यादि महापाषाण कालीन स्थल पाए जाते हैं। अड़म में डॉ अमरनाथ ने उत्खनन किया था जहाँ मध्य पाषाणकाल से लेकर सातवाहन काल तक के पुरावशेष प्राप्त हुए। मांडल से वाकाटक नरेश प्रवर सेन का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ। पचखेड़ी से मृतक स्तंभ प्राप्त हुआ है। इस तरह कुही क्षेत्र से पुरासम्पदाएँ प्रकाश में आने के कारण इतिहास की परते उघड़ रही हैं। डेक्कन महाविद्यालय का पुरातत्व विभाग इस क्षेत्र में अग्रणी हो कर कार्य कर रहा है।

Short URL: http://newsexpres.com/?p=794

Posted by on May 6 2014. Filed under कला-संस्कृति, पुरातत्व. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

Leave a Reply

Photo Gallery

Log in | Designed by R.S.Shekhawat